STORYMIRROR

Modern Meera

Abstract

4  

Modern Meera

Abstract

बस रौशनी

बस रौशनी

1 min
41

कौन कहता है 

झरोखे से उम्मीदें आएंगी 

कौन कहता है 

किस्मत, आके जगायेगी 

कौन कहता है 

की, बनेगी तकदीर अपने आप 

कौन कहता है 

जो जानो, खबर करना जनाब 


हम तो लपेटे बदन से ख्वाब के चीथड़े 

शर्मशार से, खुद को बचाये बैठे हैं 

ये लम्बी रात जब तलक न कटेगी 

सुबह की देहरि पे, जां लुटाये बैठे है 


लगाकर टकटकी, करते है इंतज़ार की 

एक सुबह आये 

उसके आने से पहले, न कहीं आँख 

ये छलक जाए 


बस रौशनी देखनी है 

मुझको जी भर के खुदा 

अब तो सबकुछ 

गंवाए बैठे हैं ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract