STORYMIRROR

AVINASH KUMAR

Abstract

4  

AVINASH KUMAR

Abstract

बिना पंखो के भी उड़ान भरी जाय

बिना पंखो के भी उड़ान भरी जाय

1 min
299

आखिर क्यूँ निराश हुआ जाए

हरपल ही बस खुश रहा जाए

दिन के बाद है आती रात 

बस बदलते मौसम के जज्बात 

आखिर क्यूँ हताश हुआ जाए

समग्र जी के चलो अनुभव ही लिया जाए

कैसे कहूं कि मैं क्या हूँ 

मैं कुछ नहीं बस एक उत्साह हूं 

क्यूँ ना फिर खुद को ही जगाया जाए

आखिर क्यूँ निराश हुआ जाए

करे हरदम हृदय से काम 

भीतर ही है अंतरिक्ष विद्मान

क्यूँ ना भीतर से ही उड़ान भरी जाए

आत्मविश्वास से हृदय को भर लिया जाए

आखिर क्यूँ निराश हुआ जाए

जो होना है होकर रहेगा 

बस कर्मवीर ही कर्म करेगा

आखिर क्यूँ ना कर्मवीर बना जाए

न्यूटन का तीसरा नियम याद किया जाए

क्रिया प्रतिक्रिया जो कहलाए

जो अंतरिक्ष में राकेट उड़ाए

यही नियम जीवन में भी लगाए

कर्म करते रहेंगे अच्छा 

भरोसा रखें लौटेगा दुगुना 

फिर आखिर क्यूँ हताश हुआ जाए

बिना पंखो के भी उड़ान भरी जाय

बड़ी ना सही बौनी ही सही

एक एक कदम आगे बढ़ा जाय

बढ़ते बढ़ते क्या पता एक दिन

मनचाही मंजिल मिल ही जाय



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract