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नमिता गुप्ता 'मनसी'

Abstract

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नमिता गुप्ता 'मनसी'

Abstract

भीतर की आग..

भीतर की आग..

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ये भीतर की आग ही है न

कभी शब्दों में सिमटती है

कभी..

पिघलती है आंसुओं में,


फिर भी

रह जाती है कहीं

सुलगती सी

..राख में ,

न जाने क्यों !!



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