भारत: एक आशा
भारत: एक आशा
शहर टूट रहे मेरे, गाँव बिखर रहा मेरा,
प्रगति, विकास के नाम पर हर घर डर से सिहर रहा मेरा।
ना जाने किसकी जीत हुई, पर लगता है मैं हूँ हार रहा,
ज़मीन की भूख की खातिर, हर कोई मुझको बाँट रहा।
कोई कहता मुझको जंगल दो, कोई कहता खेत खलिहान,
देंगे तुमको नौकरी, पैसा और एक पक्का मकान।
दुनिया की हर सुख सुविधा होगी, स्वर्ग सा होगा घर वहाँ,
पर यह बताना भूल गये, ना होंगे जंगल, हरियाली और फसल,
तो जियोगे कैसे तुम वहाँ ?
महँगाई, भूख और बीमारी से मुश्किल हुआ जीवन,
चाहे अनचाहे कर रहे तुम, लालच और वहशीपान,
तुम सोते रहे इसलिए है पनपता कहीं अवसरवाद कहीं,
तो कहीं नक्सलवाद।
अगर जागते तुम, तो ना होता एक घर आबाद दूजा बर्बाद,
ना जाने वो कहाँ गये जिसने क़सम खाई थी आज़ादी की,
बाँधे मुझे ज़ंजीरों में, बेबसी की बर्बादी की।
लूट रहे, नोच रहे हो मुझे कुछ हैवान अपने हाथों से,
क्यूँकी तुम चुप रहकर देख रहे नित भ्रष्टाचार रूपी बलात्कार मेरा,
अपनी इन्ही दो आँखों से।
बचा सको मुझे तो बचा लो, कुछ अंतिम साँसें हैं मेरी,
जवाब ढूँढने को इस सवाल का तो पढ़ लो,
कुछ कही हुई पंक्तियाँ मेरी।
लहलाएँगे जीवन से भरपूर फिर इंसान, जंगल, खेत खलिहान मेरे,
इसी आस में लिखता हूँ, कुछ करना बंधु तुम मेरे,
कुछ करना बंधु तुम मेरे।
