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Aarti Sirsat

Abstract

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Aarti Sirsat

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"बावरा मन"

"बावरा मन"

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मन ये बावरा 

उडता ही जाए...!

काटों की गलियां 

कैसे इसे भाएं...!!


हर दिन क्यों ये 

आशा की लौ जलाएं...!

टूटकर भी फिर 

वही राह दोहराएं...!!


मानें ना यह 

तो बात हमरी...!

बात बात पर हमें 

ही ये समझाए..!!


टोकने से ये तो 

हम से रूठ जाएं...!

मनाना हमकों आए

ना कैसे इसे मनाएं...!!


कछु तो कारण होई जो ये 

हमसें बार बार झगडाएं...!

चूर चूर हो जाएं फिर भी

इसका मन ना भर पाएं...!!


मन तो हमरा है,

बात ये किसी ओर की ही सुनाएं...!

सुनकर आहट किसी 

की हमें भी यह डराएं...!!


खुद रहकर अकेला

मुझे मुस्कुराना सिखाएं...!

आखिर है तो मेरा ही 

भटकर सारी दुनिया,

फिर ये मेरे ही पास आ जाएं...!!



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