STORYMIRROR

Nalanda Satish

Abstract

3  

Nalanda Satish

Abstract

बारी

बारी

1 min
202

पता नहीं अब आनेवाली किसकी बारी

किसकी सवारी में कौन जनाजे के बगैर जाते


इतना जिद्दी होना भी ठीक नहीं होता है

परिंदो से पूछ लो अदना से घोंसले बनाना भी आसान नहीं होते


इतने बन्दिशों में रहने की आदत नहीं है किसीको

रंजिशें गर पाल ली हो तो सीधा आके टकरा जाते 


काल के गाल में समा गये हजारो लाल

जिनसे वफ़ा की उम्मीद थी वही बेवफाई कर जाते 


तकनीक का शहशांह होने का खुप दम भरा हमने

इंसानो का दुख समझने में खाई से फिसल जाते 


ममतामयी माँ ने उजागर कर दी इंसानियत  ' नालन्दा'

वर्ना तिलिस्म की हकीकत को कहाँ हम जान पाते ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nalanda Satish

Similar hindi poem from Abstract