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Suryakant Tripathi Nirala

Classics

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Suryakant Tripathi Nirala

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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,

वह कभी नहाती थी धँसकर,

आँखें रह जाती थीं फँसकर,

कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,

फिर भी अपने में रहती थी,

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

सबकी सुनती थी, सहती थी,

देती थी सबके दाँव, बंधु!


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