STORYMIRROR

Suryakant Tripathi Nirala

Classics

0  

Suryakant Tripathi Nirala

Classics

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

1 min
706


बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,

वह कभी नहाती थी धँसकर,

आँखें रह जाती थीं फँसकर,

कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,

फिर भी अपने में रहती थी,

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

सबकी सुनती थी, सहती थी,

देती थी सबके दाँव, बंधु!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics