अवसरवादी
अवसरवादी
आज लगा झूठ का हर जगह देखो मेला,
सियासत में होता जंग बहुत कैसा ये खेला !
हजारों की जो बात करते रहते है हरदम,
जेब में उनके नहीं दिखता कोई एक धेला !
हक़ीक़त नहीं है यहाँ जानता आज कोई,
बदलते जा रहे हैं चाहे गुरु हो या हो चेला !
जमा हुई चौकड़ी खूब आज स्वार्थियों की,
सभी बाँध रहे झूठ का अपने सिर पे सेला !
अवसरवादी से हो गए आज सब नेतागण,
हज़म कर गये सब मिलक़र रिश्वत का भेला !
गये न्याय को माँगने लोग दर पर भी जिनके,
मिला नहीं न्याय, और ऊपर से डंडों को झेला !
