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Rakesh Kumar NAGAR

Abstract

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Rakesh Kumar NAGAR

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अविरल कर्म

अविरल कर्म

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अपने एयर कंडीशनर कमरे की जब खोली खिड़की,

मारा गर्म ह↿वा के झोंको ने चेहरे पर करारा थप्पड़ 


आज यक़ीनन बहार कड़ी धुप है, गर्मी है 

सड़क लावा सी पिघल रही है,आकाश अंगार सा तप्त है


अचानक नज़र पड़ी एक प ठेले वाले पर 

खिंच रहा था वाहवाह गाड़ी नंगे पै र इस तपती धुप में


गिरती धारा पर उसके श्रम की बुँदे, धुप के आशीर्वाद से

आग बरसती छाती पर उसके, बदन बना मेघ जैसे 


अचानक बंद हुआ मेरे कमरे का एयर कंडीशनर 

पंखा भी न चला , शायद लोड शेडिंग हो गयी 


नाहा गया पसीने से मैं, जैसे अब निकले प्राण 

चक्कर सा आ गया, अब गिरा, कहाँ अटके प्राण 


सहसा ख्याल आया उस ठेले वाले का 

वह बाहर था और मैं अंदर 

फिर भी वह करता कर्म निरन्तर 


अंतर है सिर्फ भीतर बाहर का 

पर कर्म में वह आगे निरन्तर। 


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