अस्तित्व मेरा !
अस्तित्व मेरा !
धुंधलाता रहा अस्तित्व मेरा
और मैं ख़्वाब तेरे सजाती रही।
सिमटकर रह गई,
मैं रंग- बिरंगे लिबाज़ में,
और तू आज़ाद
पंछियों सा उड़ता रहा।
इक कतरा उन्मुक्त
आसमान तो मैंने भी चाहा था,
पर तुमने घर की दहलीज़ को
मेरा मुक़द्दर बना दिया !

