अस्थायी मोक्ष
अस्थायी मोक्ष
खुद कुछ नहीं
लेकिन धृष्टता कर रही हूँ
अपनी नजर से देखने समझने की
यह कि कुछ मर्म हृदयी
रचनाकारों को लिखना संभवत:
मोक्ष के मार्ग जैसा
लगता होगा।
अवश्य ही वह
लिखते हुए पन्नो पर
छोड़ते जाते होंगे
अपने पराए सबके हर्ष
और विषाद।
कम होते जाते होंंगे
उनके मन में कस कर बंधे भरे
अहसासों के पुलिंदे।
भार से धीरे धीरे हल्के होते जाते होंगे
उठते भी जाते होंगे ऊपर
जैसे धुंआ उठता है आसमान की ओर ।
उबरती भी होगी
पात्रों के छटपटाते अस्तित्व संग
डुबती हुई सांस
बांध तोड़ती भावनाओं की अथाह
जलराशि से।
साफ एक दम साफ
हो जाता होगा न मन नए पन्ने सा
जो होता होगा गुदा हुआ
बेतरतीब बुरी तरह से गड्डमड्ड हुए
भावों की स्याही से।
हालांकि छुवन में खुरदुरा सा
लेकिन आँखोँ के लिए
सुकून भरा होता होगा न
खाली नीली धारियों
वाला वह नया धवल पन्ना
और होता होगा न ऐसा कि घण्टो दिनों
जी ही नही करता होगा
किसी भी शब्द को उठा कर
उनमे सजाने को।
बहुत देर तक
उस साफ अनछुए पन्ने पर
बिछी रहती होगी अभिव्यक्ति
ढीली ढाली होकर जैसे किसी शरीर को
अभी अभी ही छोड़ कर गयी हो
कैद में पड़ी आत्मा।
लोटते अलसाते
जब समय बीत जाता होगा
तो फिर से जीवन में टटोलता होगा
भावनाओं से नब्ज अपनी,
'अभी भी जीवित हूँ! ' जानकर
वह फिर से झाड़ कर सारे भ्रम
चल देता होगा शब्दों की घाटी से होते हुए
घटित अघटित के बने चलचित्र को देखने
महसूस करने , समेटने नए अतरंगी
बहुरंगी अनुभव उतारने को
अनेकानेक पन्नो पर ।
सही या गलत हूँ
ये कौन जानता होगा ये पता नहीं
लेकिन मेरी समझ से
ऐसे रचनाकार शायद बने नहीं होते
अकेले रहकर जीने के लिए,
वे होते होंगे समुद्र की तलहटी
पर पानी के वजन से दबे लेकिन
तरंगों के साथ झूमते टूट कर
इधर उधर जाकर फिर जमते हाईड्रील्ला से
इसीलिये
गलत हो या सही
यही लगता है मुझे
कुछ मर्म हृदयी रचनाकार
इस तरह हर तरह के विचारों से
बुरी तरह जीत हार कर
कट पिट कर थकने के बाद
जानबूझकर शिकार होते होंगे
अस्थायी मोक्ष के
विचार से।
