Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

अपराध बोध

अपराध बोध

1 min 449 1 min 449

क्यूँ होता है तुम्हें हर बात का ही अपराध बोध

क्यूँ करती हो स्वयं तुम अपनी ही हर बात का विरोध l


तो क्या हुआ अगर किसी दिन देर से तेरी नींद खुली ?

नहीं बना पायी अगर तुम नाश्ते में सब्ज़ी कोई l


ब्रेड, उपमा, पोहा, आमलेट, ये भी तो खा सकते हैं सभी 

क्यूँ भला इस बात पर चढ़ना पर जाये तुम्हें सूली ?


एक त्रेता की सीता थी, एक आज की नारी है

अंतर कहाँ दोनों में कोई, दोनों में आत्म ग्लानि है।


नहीं सिखाना हमें बेटी को, त्याग की मूरत बनना

जितना माँ को सहते देखा, बेटी को नहीं सहने देना l


Rate this content
Log in

More hindi poem from Dr Shikha Tejswi ‘dhwani’

Similar hindi poem from Abstract