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Hasmukh Mehta

Abstract

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Hasmukh Mehta

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अपनी मंजिल

अपनी मंजिल

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मंजिल मुझे मिलती नहीं

ख्वाहिश मेरी पूरी होती नहीं

कहाँ ढूँढू मैं अपनी मंजिल

वो तो होती जाती ओझिल।


अपनों का अनुभव हो गया

पसीने से बदन तर हो गया

ना जाना वो कैसे पराये हो गए!

आँखों का कतराना छोड़ गए।


दुनिया मुझे भाती नहीं

किसी से अच्छी पटती नहीं

मन की इच्छा मन में धरी की धरी

लोगो ने सुना दी मुझे खोटी खरी।


सुना था मैंने पहले भी

लोग कहते हैं अभी भी

मुझे नहीं भाता दोहरा आचरण

लोग गुस्से में आ जाते अकारण।


नहीं चाहिए मुझे कोई सवलत

लगती है उसे कोई खोटी लत

मन मेरा मौजी और तबियत हरी

भजता रहूँ में तेरा नाम हरी।


तेरी बनायी हर चीज भाए

आँखों को भाए मन को सुहाए

मन नाच उठे और दिल को छुए

अपने लगे सब भले हो पराए।


मेरी एक इच्छा

रह ना जाए मन की महेच्छा

क्योंना बन जाए मन पावन?

सब लग ने लगे प्यारे और लुभावन।


संसार है एक विशाल दरिया

जो मिटा सकता है गमगीनी की दूरिया

यही तो विनती है एक सावरिया

मन की मन में रह ना जाए जिया।


संसार गहरा और उसपर पहरा

लगे मन को प्यारा और हरा 

जंग यदि जीता, फिर भी हारा

अपनाने मिलकर अपनों को ही मारा।


ऐसा नतीजा सुखद नहीं 

मेरे मन में चिंता सताती यही

ना जाने कौन सा फल हमने खाया

अपनो ने हमको कर दिया पराया।


हमने ना जाना उनकी करतूत

रहे अनजान और ना जानी हकीकत

वो करते रहे अपना काम तरीके से

बरत ते गए दुश्मन सरीखे से।



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