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Hasmukh Mehta

Others

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Hasmukh Mehta

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तेरी चाहत

तेरी चाहत

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बस तेरी चाहत

मुझे देती थी राहत

होती थी कभी कोई आहट

मेरे दिल में हो जाती थी घबराहट।


तू तो बस छा गया था

सब के दिलों में बस गया था

ना तूने रखा किसी से बैर

और ना समझा तूने किसी को गैर।


तू चलता गया अपनी मंजिल

हम भी होते गए धीरे-धीरे बोझिल

हम नहीं चाहते थे फालतू की बवाल

नहीं फेंक पाए हम हमारी जाल।


हम ने सोचा हम ही है शिकारी 

उसने तो गलत साबित कर दिया थियरी

उसने नहीं दी थी किसी को भी तवज्जो

हम ही बस मन में समाए हुए थे एक आरजू


हमारी दृष्टि सिमित थी

हमारे मन में सिर्फ लालसा ही थी

हम उसे अपनी और खींचना चाहते थे

पर वो तो सबके दिल पर पकड़ बनाए हुए थे।


प्यार पर किसी का जोर नहीं  

जलन और सितम की कोई जगह नहीं

जब मन ही ने मना कर दिया दूर से

तो मन दूसरे पर कैसे बरसे?


प्यार का एक मतलब है

उसकी इच्छा और तड़प सभी में है

प्यार रंग तो तभी लाता है

जब प्यार का मेघ-धनुष अपने रंग बिखराता है 



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