अनकही बोलती ख्वाहिशें
अनकही बोलती ख्वाहिशें
कुछ तो ख्वाहिशें रही होंगी,
सीमा पर जाते उस सैनिक के मन में।
वो अपने दोस्तों के जैसे माँ के प्यार भरे आँचल में रहने की,
वो पापा के गुस्से के पीछे के प्यार को रोज महसूस करने की।
वो बहन की चोटी खींच तंग करने की,
गली के नुक्कड़ पर ठहाके लगाने की।
टीवी पर क्रिकेट देख घर पर कमेंट्री करने की,
कुछ तो ख्वाहिशें रही होंगी।
बदलते मौसम का आनंद अपनों के साथ लेने की,
उनकी हर परेशानी में आगे खड़े रहने की।
वो हर शाम पत्नी के साथ चाय पर,
घर - बाहर पर चर्चा करने की,
अपनी बेटी की हँसी में दुनिया ढूंढने की।
बेटे के बचपन में खुद को तलाशने की,
कुछ तो ख्वाहिशें रही होंगी।
मैदान में कफ़न बांधे उतरने से पहले,
वो आखिरी बात में पूरी जिंदगी जी लेने की।
अपने साथियों को जी भर के गले लगाने की,
अपनी धरा को बार - बार चूमने की।
वो दुश्मनों का खात्मा कर,
भारत माँ की गोद में सो जाने की,
कुछ तो ख्वाहिशें रही होंगी।
