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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

ऐसे ना डराया करो

ऐसे ना डराया करो

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सुनो प्रिये 

बहुत डरते हैं हम 

तुम्हारे इन काले काले केशों से 

जो काले नाग से लगते हैं 

ये हरदम मेरी ओर ही तकते हैं 

ना जाने कब डस लें निगोड़े 

इसलिए पास आने से 

डरते हैं हम थोड़े थोड़े । 


और तुम्हारी इन नीली नीली

नशीली आंखों से भी डरते हैं  

बहुत कातिलाना नजर है तुम्हारी 

तुम्हें क्या बतायें कि 

अब क्या हालत हो गई है हमारी ? 

हरदम नजरों में रहतीं हैं 

ना जीने देती हैं 

और ना मरने देती हैं ।


लाल सुर्ख होंठों से भी 

हमें बहुत डर लगता है 

इनको देखकर ही हमारा 

हलक सूखने लगता है 

प्यास बढ़ाकर तड़पाते हैं ये 

अपने नजदीक बुलाते हैं ये 

कितने बेचैन रहते हैं इनके लिए हम

क्या क्या जतन करते हैं 

इन्हें पाने के लिए हम

ये तुम क्या जानो ? 

तुम तो बस , आग लगाना जानती हो 

मगर , उस आग में तो हम ही जलते हैं न ।


और तुम्हारी मोरनी सी चाल !

पूरे शहर में कत्लेआम हो रहा है 

तुम्हें पाने के लिए 

हर कोई बावला हो रहा है । 

मुझे बहुत डर लग रहा है 

कि कोई तुम्हें छीन कर ना ले जाए 

और ज़िंदगी भर की दर्दे जुदाई 

कहीं मुझे सौगात में ना दे जाए ?


इतना क्यों डराती हो 

ऐसे क्यों तरसाती हो 

कभी नर्मो नाजुक बांहों का हार 

पहना दो ना हमें , ऐ हसीना 

यूं हलाल कर करके 

क्यों हमें मरवाती हो ? 



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