अहम
अहम
अहम आ गया जिस दिल में,
वो जन मानेगा इक दिन हार,
अहम भरे इस संसार को देख,
मिलता नहीं जन जन का प्यार।
अहम खत्म कर देता जन को,
मरने पर भी न आता है याद,
निष्ठुर मिलता ऐसा जन सदा,
चाहे विनति कर लेना हजार।
अहम से बढ़कर कठोर नहीं,
जगत का कोई पत्थर, पहान,
वो समझे नष्ट कभी नहीं हूंगा,
जग खो देता पल में पहचान।
भृगु ऋषि हुये जग अहंकारी,
विष्णु को भी जड़ी थी लात,
समय बदलते देर लगी नहीं,
सुदामा ने सहे थे बदहालात।
अहम करो कभी नहीं प्यारे,
दो दिन की जिंदगी का मेला,
कहीं भीड़ में नहीं खो बैठेगा,
रह सकता है निरा अकेला।।
