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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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अभाव

अभाव

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अभाव में साखी तुझको जीना सीखना है

आंसूओ से प्यास बुझाकर जिंदा रहना है


दर्द है उसे तू बस नासूर बना ले,

अंगारों पर तुझे हरपल कदमों को रखना है


हार हो या फ़िर तेरी जीत हो साखी

सबके दिलों पर तुझे नाम छोड़ना है


अपनी बुराई से तुझे घबराना नहीं है

बुराइयों में ही तुझे अच्छाइयों को ढूंढना है


आइने में ज्यादा तुझे अंतरात्मा में झांकना है

वास्तविक अक्स की तुझे पहचान करना है


लोहे की जंजीर उतनी मजबूत नहीं है

जितनी साखी तेरे मन की दीवारें है


मन की दीवारों पर

तुझे हथौड़ा पीटना है।


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