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Sonia Chetan kanoongo

Abstract Inspirational

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Sonia Chetan kanoongo

Abstract Inspirational

अब ये डर मुझसे डर जाता है

अब ये डर मुझसे डर जाता है

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है ये डर मुझे डराता है।

हाँ मेरा हौसला गिराता है।

कल सवेरा ना हुआ मेरा तो क्या।

यही सोच का दायरा मुझे समेट ले जाता है।


हाँ ये डर मुझे डराता है।

ख्वाहिशों का जो क़िला मैंने बनाया है।

आकर उसे तोड़ जाता है।

मैं सहम जाऊँ उससे 

इस हद तक मुझे सताता है।

कल के चाँद से मैं रूबरू ना हो पाई तो

ये सवाल मेरे होठों पर छोड़ जाता हैं।


कौन कहता है अंधेरा निगल जाता है।

एक लौ अपने हाथों से जला के तो देखो।

चाँद और सूरज तो रोज निकलते है।

अपने दिल को समझा के तो देखो।

बस ये ख़्याल मुझे फिर से जिंदा कर जाता है।


कल क्या होगा वो सोच के आज क्यों मरना।

सोच कर देखो बस इतना।

ये आपके आज को जिंदा कर जाता है।

आज के ही नही, कल के लिए भी सपने बुनों।

यही रास्ता ताउम्र मंजिल बन जाता है।

अब ये डर मुझसे डर जाता है।


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