आस्था और संस्कृति
आस्था और संस्कृति
हमारी सनातन संस्कृति और हमारी सभ्यता
क्या कहती है एक दूसरे से सुनिए ज़रा
दोनों साथ-साथ चलते हैं एक दूसरे के पूरक हैं
एक दूसरे के बिना हम बिल्कुल अकेले हैं
साथ दोनों का रहता है सदा हरा भरा
हम जब एक कदम बढ़ाते हैं तो दूसरा देता है उसको ठहराव
कुछ पुराना और कुछ नया लेकर
दोनों चलते हैं
न पुराने को भूलते हैं और न नये को छोड़ते हैं
दोनों साथ-साथ चलते हैं एक दूसरे का सम्मान करते हैं
इसमें वांछित होती है साहित्यकार एवं कवियों की कला
जागृत करें नई पीढ़ी को बड़े प्यार से समझाते हुए बढ़े आगे
नयेपन को अपनायें पर अपनी संस्कृति को न त्यागें।
