STORYMIRROR

Manu Sweta

Abstract

3  

Manu Sweta

Abstract

आज शाम

आज शाम

1 min
351

पर्वतों की आवाज़ बनकर

ये वृक्ष बोलते हैं

नदियों की धारा बनकर

ये बादल डोलते हैं


पत्तो की सरसराहट लेकर

ये पक्षी बोलते हैं

इंद्रधनुषी रंगों से ये

धरा देखो सज गयी।


आज दुल्हन सी शरमाये

देखो धरा भी बोलती है

सूरज को अपनी चुनरी में

आसमा आज छिपा बैठा है।


दूर से ही धानी रंग ले

आज शाम झूलती है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract