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Manju Saini

Inspirational

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Manju Saini

Inspirational

आधुनिक प्रेमप्रसंग

आधुनिक प्रेमप्रसंग

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मेरे अंदर संचारित हैं

आज का प्रेम अधूरा सा निष्फल

मेरे अंदर धीरे धीरे फ़ैल रहा है सूनापन

साथ दिखता है पर साथ नही होता


प्रेम है शायद मौकापरस्त

मानो हाथों में रेत भरा तो है पर

टिक नही पाता अपनी फिसलन की फितरत से

रेत के सूखे कण में से नेह झलकता प्रतीत होता


प्रेम के नेह से मानो कभी नमी सी दिखती हैं

मानो बारिश की बूंदों से पृथ्वी गीली हुई सी

बारिश की नमीं की गंध मानो फैली हो सब और

गायब हो गई है आज प्रेम की नमी न जाने क्यों

बस रह गया दिखावटी ,छलावा सा प्रेम 


मेरे अंदर संचारित हैं

आज का प्रेम अधूरा सा निष्फल

प्रेम क्यूँ फ़ैलने लगा सभी मे यह प्रश्न है 

मगर सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं होते यही दर्द है


क्योंकि आज प्रेम विशुद्ध नही है 

आज चालाकी के दौर में विशुद्ध प्रेम खो गया है

मात्र दिखावा ही सब ओर नजर आ रहा है 

तुम्हारे आने से ही अहसास था मुझे वापसी का


रेगिस्तान अपना अस्तित्व खो चूका था मानो जल 

वैसे ही प्रेम की मीठी सी झलक तक खो दी गई

रह गया बस विश्वासघात सब तरफ

पुराने हीर रांझा अब मात्र कहानियों में ही बंद है

बस रह गया दिखावटी, छलावा सा प्रेम।


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