2050 की दुनिया
2050 की दुनिया
दो हज़ार पचास 'की दुनिया हम सजाते हैं।
न सोचें गलत कुछ, ऐसी दुनिया बसाते हैं।
उनके लिए प्यार की, एक सीख़ छोड़ जाते हैं।
ज्यादा तो नहीं, विश्वास की पूंजी छोड़ जाते हैं।
''दो हजार पचास ''की दुनिया हम सजाते हैं।
बंधी रहे, विश्वास प्रेम की डोर ऐसी डोर बनाते हैं।
हम न रहें उस दुनिया में, अपनी सोच बसाते हैं।
कलयुग अपने चरम पर,उसका तोड़ ढूंढ़ लाते हैं।
भविष्य नहीं वश में अभी,वर्तमान ही संवारते हैं।
न सोचें गलत कुछ,ऐसी दुनिया बसाते हैं।
जुडी रहे रिश्तों की डोर,ऐसा कोई बीज लगाते हैं।
प्रेम का सुनहरा वृक्ष,अपनी कविताओं में बो जाते हैं।
कलयुग कितना भी चरम पर हो,संस्कार छोड़ जाते हैं।
गर्व करे, दुनिया हम पर, ऐसा इतिहास छोड़ जाते हैं।
आओ ! मिलकर कोई ऐसा संसार,संवारते हैं।
