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लिव इन की कहानी
लिव इन की कहानी
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© Anuradha Sharma

Inspirational

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' लिव इन ' की कहानी

मेरी दीन स्थिति से उसे कोई लेना देना ना था । मैं अक्सर अपने कपड़े जूते तक को तरस जाया करता..। .कितने दिन तक दो कमीज दो पैंट में ही गुजारा करता.. जबकि मुझे भी अच्छे कपड़े पहनने का शौक था ।पर उसे मेरी इस दशा से कुछ लेना देना नहीं था । उसे तो अपने ऐशो-आराम ,पार्लर ,बढिया ब्रांडेड कपड़ो के लिए पैसे चाहिए ही थे । असल में पहले मैंने ही उसके ऊपर खूब खर्च करके उसकी आदत खराब की थी । प्यार के नशे में मैं उसकी हर जायज नाजायज इच्छाओं की पूर्ति करता रहा  । मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी वैसे भी इतनी आसानी से नौकरी मिलती कहाँ है आजकल .. वो भी इतने बड़े शहर में । मैं तो वैसे ही कुछ झगड़े टंटे के कारण  अपने हिस्से की गांव की थोड़ी सी जमीन बेच शहर भाग आया था । गांव का मौहम्मद रफी था मैं ..  ।लेकिन वहाँ इस हुनर को कौन पूछता ...बस कुछ इस झौंक में भी गाँव को त्याग शहर चला आया एक दोस्त के साथ । सोचा शहर में भी इसी हुनर से कमा खा लूंगा। इसी कारण एक दिन एक दोस्त ने एक की लड़की से मुझे मिलवाया , उसका एक रिश्तेदार यहां गिटार बजाता था ।वो भी गाती थी । धीरे धीरे मुलाकात बढ़ती गयी  और मुलाकात होते होते ही हम साथ रहने लगे ... न जाने कब पता ही ना चला । साथ रहने का सबसे बड़ा फायदा हुआ बस एक साथ मिला वह भी अपनी ही बिरादरी यानि संगीत का .. नुकसान ये हुआ कि खर्चा बहुत बढ़ गया .. कमाई तो थी नहीं खास.. हमारी स्थिति 'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपय्या ' वाली थी । फिर भी जिन्दगी ठीक ठाक लग रही थी ।
दो चार ट्यूशन मिले ..खाने पीने का काम चल जाता । बाकी जमीन का थोड़ा बहुत पैसा था ही जिससे मैं उसके शौक पूरे कर देता । फिर भी मैं खुश था  .. वो  भी ।
लेकिन धीरे धीरे उसका व्यवहार थोड़ा दूसरे टाइप का होने लगा । मुझे पता चला कि उसे तो एक ऐसा गुलाम चाहिए जो रात दिन उस महान कलाकार की सेवा करे । वह एक बड़ी कलाकार की तरह अपने प्रोग्राम करे.. खूब पैसा और शोहरत कमाए ..ठाठ से रहे ..। एक दो लोग उसके आगे पीछे रहें खिदमत के लिए ..। यूँ कोई बुराई भी ना थी इसमें । पर मुझे तब बुरा लगता जब वह ऐसा मुझसे अलग होकर सोचती मेरे साथ नहीं , ये कैसा अपनापन था । खैर ..लेकिन किस्मत ने उसका  उतना साथ ना दिया । कई साल के संघर्ष के बाद बस कुछ छोटे मोटे प्रोग्राम ही मिले ...। वैसे वो चाहती तो हम दोनों मिलकर इस काम को ज्यादा अच्छा अंजाम दे सकते थे लेकिन ना जाने क्यूँ वो मुझे अपने से हमेशा ही कमतर मानती और इसका कारण था मेरा गाँव देहात का होना । सच कहूँ तो यह इन्फीरियर कॉम्पलैक्स मुझमें खुद भी था अपने को लेकर । उसमें एक तरह का सुपीरियर कॉम्पलैक्स था क्योंकि वह जिस जगह से आई थी वहाँ उसका अच्छा खासा नाम था अपने गाने के कारण और इसी धुन में वह और बड़ा और नामी बनने के लिए बड़शहर चली आई थी ।
उसे मुझसे हमेशा ही शिकायत रहती । मैं जिस माहौल से आया था वहाँ बस औरते ही काम करती थी घर का सारा । मैंने घर मैं कभी पानी लेकर भी ना पिया था ,माँ करती या बहनें .. लेकिन यहाँ सब उल्टा हो गया । मुझे यहाँ सब कुछ करना पड़ता .. हमारा अक्सर झगड़ा होता खूब पर उसे नहीं करना था तो नहीं करना था ।इस लड़ाई में अक्सर मैं हारता क्योंकि वो अक्सर कहती ," तू किसी काम का नही।"
न जाने क्यूँ मैं भी मान लेता ।
उसे पैसे चाहिये थे । चाहे वो कैसे भी आयें । मानो तुम मरते हो तो मरो ,पर मरने से पहले मुझे इतना पैसा दो कि मेरे सारे बड़े बड़े सपने पूरे हो जाएं। मर जाना मिट जाना एक पुरुष प्रेमी के लिए इतना बड़ा गुनाह नहीं है। वैसे भी तुम गांव देहात के एक मू्र्ख व्यक्ति हो ,तुम्हारा मूर्ख होना भी कोई इतना बड़ा गुनाह नहीं है। यदि तुम अपने लिए कुछ करते हो या नहीं मेरी बला से ..बस मुझे पैसे लाकर दो ,बस यही सबसे बड़ा पुण्य कार्य है तुम्हार लिए। तुम्हें यदि अपने आपको भी बेचना पड़े  मेरे लिए तो कोई बात नहीं ... इस लालच में कभी कभी वह बहुत खुंखार की तरह बिहेव करती .. इतनी.. कि मैं डर जाता ।
यद्यपि वो मेरी ब्याहता नहीं थी लेकिन उसकी मांग एक असली पत्नी से ज्यादा थी ,हमें कई साल जो हो गये थे साथ रहते रहते लिव इन में ।
जब हमने साथ रहना शुरू किया था तब तक मुझे नहीं पता था कि ऐसे साथ रहने को 'लिव इन रिलेशनशिप' कहते हैं ।मैं तो शहर में रहने के लिए एक साथी ढूंढ रहा था कोई लड़का.. , संयोग से मुझे लड़की मिल गयी ..इतनी आसानी से .. वोभी किसी दूर प्रदेश की इससे बढिया और क्या हो सकता था मै साथ मजे के लिए रह लिया सोचा जब लड़की को कोई फर्क नहीं पड़ रहा तब मुझे क्या ... ,ना किसी और का डर ..गांव की तरह ना किसी आस पड़ौस का डर.. ना किसी बड़े छोटे का लिहाज ..।ना कोई रिश्तेदारी ..। ना उसकी ना मेरी .. उन्मुक्त ..स्वछन्द..। लेकिन ये स्वच्छन्दता .. उन्मुक्तता  .. आवारी पंछी की तरह.. रहना इतना मंहगा पड़ेगा और इतना दमघोटू .. ये तो मुझे बहुत बाद में पता चला .. इतना बाद में कि जब मेरे हाथ में कुछ ना बचा ।  लेकिन मजबूरी थी ।
एक दिन खबर आई कि देवेन के बेटा हुआ है ।
मैंने कहा ," ले तू बुआ बन गयी!"
उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखा ।
"अरे तुझे नहीं पता देवेन के बेटा हुआ है ?"
अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मैंने कहा ।
देवेन इसके रिश्ते का चाचा का लड़का था ,शुरु में दोंनो साथ साथ ही इम्फाल से आकर अपने म्यूजिक के प्रोग्राम करते । बाद में आदतन दोंनो एक दूसरे की तरक्की ,सफलता से चिढ़ने लगे तथा अलग अलग रहने लगे । ये मेरे साथ रहने लगी । देवेन ने भी शादी कर ली और आज ये खुशी का समाचार आया । मैं ये तो जानता था कि अब ये एक दूसरे से बहुत चिढ़ते हैं पर इतना चिढ़ते हैं ये तो मुझे आज ही पता चला जब इस खुशी के समाचार को सुनकर उसका  चेहरा ईर्ष्या से काला पड़ गया । बिना कुछ कहे वह वहाँ से उठकर चली गयी ।
वो जो अक्सर मेरी उपेक्षा करके अपनी शान समझती ,मेरे साथ गुलामों जैसा व्यवहार करके मन ही मन खुश होती वही उस समाचार के दिन से कोई भी बात मुझे इतने प्यार से कहती कि मुझे कुछ समझ नहीं आता । मैं समझता स्त्री जात है होगा कुछ मन में । वैसे भी समय के साथ व्यवहार बदलने में वह माहिर थी खासतौर से पैसे के नाम पर उसकी लार टपकती थी ,मुझे लगा कुछ पैसा वैसा चाहिए होगा ।
पर एक दिन मैं समझ गया कि इसने अपने लिए भगवान से कुछ माँगा है जब वह खुद ही अभिसारिका सी मेरे आस पास मंडराती रही कईं दिन ..मैं भी खुश था ।एक दिन उसने कहा मुझे उसी हॉस्पिटल में जाना है जिसमें देवेन के बेटा हुआ है ।

ओह्! ...मेरे दिमाग के कलपुर्जे जो एक हफ्ते से बिल्कुल जाम हो गये थे आज ग्रीस लगे से चिकने हो गये .. सारी कहानी दिमागी पुर्जों ने एक दूसरे को समझा दी शतप्रतिशत..।
बात ये हुई कि अब उसे भी बच्चा पैदा करना था .. वह कहीं भी अपने आप को अपने एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी से नीचे नहीं रहना चाहती थी .. । उसे अपना रुतबा ऊंचा करना था ।
ये वो जालिम स्त्री थी जिसने चार साल पहले मिली इसी खुशी को नेस्नाबूद कर दिया था जबरदस्ती अपने हाथों से .. ये कहकर कि मैं कोई बच्चा वच्चा पैदा नहीं करूंगी कभी .. कितनी दिक्कत हुई थी मुझे उसकी इस जिद को पूरा करने में .. यूँ मैं खुद भी इस स्थिति के लिए तैयार नहीं था.. बिना शादी के साथ रहना दूसरी बात है लेकिन बच्चा..। पर दोस्तों के कहने पर मैंने उसे समझाने की कोशिश की .. वैसे भी इस रहने को अब काफी दुनिया जान चुकी थी .. मेरे घर वाले और उसके घर वाले भी ... फिर भी साथ रहने के अलावा गृहस्थ जैसी जिम्मेदारी निभाना हम दोंनों के ही वश में नहीं था ,और ना ही इच्छा .. हाँ बड़ा कलाकार बनने की चाहा दोंनो में ही कहीं ना कहीं पल रही थी । सो वही हुआ जो उसने चाहा .. परोक्ष रूप से मैंने भी .. लेकिन अब इसकी इस सनक और चाह को समझकर मुझे हैरानी हो रही थी .. । वैसे मुझे उसने अपनी तरफ से कोई बात नहीं बताई थी ...वो जरूरी भी नहीं समझती थी ।
डॉ० रूपल ने जाँच के बाद बताया कि वह माँ बनने वाली है । हम दोनों आज खुश थे । बरसों बाद जीवन में कुछ नया हुआ था ।
बहुत दिन बाद उसने आज मुझसे ठीक से बात की । बातों ही बातों में बताया कि एक बार बच्चे को लेकर ही देवेन की पत्नी और इसमें काफी झगड़ा हो गया था तथा दोंनों ने एक दूसरे को शापित किया था कि
" तेरे चूहें का बच्चा भी हो जाए तो देख लेना ...।"
अब आपको समझ ही आ गया होगा ये सारा स्वाँग।एक दो दिन नये मेहमान के आने की खुशी घर पर हावी रही । घर घर सा लगा ।
लिव इन में भी पति पत्नी का अहसास जगा । जिम्मेदारियों के अहसास ने एक सदग्रहस्थ की तरह घर चलाने के लिए प्रेरित किया ।
उसने एक दिन मेरी तरफ मुखातिब होकर कहा," सुनो! तुम्हें क्या चाहिए .. लड़का या लड़की । "
मुझे थोड़ा अटपटा लगा ।
फिर भी मैंने कहा ," मैं तो लड़का ही चाहूंगा , लड़की की तो बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ।"
उसने कहा ," हाँ ! मुझे भी ।"
मैं उसके भय को जानता था । यदि लड़की हो गयी तो वो फिर एक कदम पीछे रह जाएगी देवेन की पत्नी से .. उसका अहंकारी और ईर्ष्यालू मन अभी उसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था ।

 

रिश्तों का संसार

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