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पहले प्यार का झोंका
पहले प्यार का झोंका
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© Meenakshi Kilawat

Romance

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पहला प्यार कहाँ, कैसे, कब होता है, यह कोई नहीं बता सकता। यह अनुभूती नाजूक फुलो की तरह होती है। कोमल पंखुड़ियाँ जैसे-जैसे खिलती है उसी तरह ह्रदयकमल पर किसी का एहसास भावना बनकर धड़कनों को बढाता है। इस प्रेम बंधन को अपने निजी जिंदगी पर हावी होने में ज़रा भी देर नहीं लगती है। वह पवित्र प्यार का नशा इंसान तो क्या प्रकृती के सभी एक-दुसरे के प्रती माया मोह में उलझा कर अपने आग़ोश में ले लेता है।

'निरामय श्वासोपर अप्रगट रहकर घुलमिल जाता है।' यह अंतरात्मा की महागुफ़ा प्रेम के उपज से नये रंग में रंग जाता है।

मैंने देखा है एक ऐसे ही प्रेमी को उसकी हर बात से मैं वाकिफ थी। वह शर्मिला नौजवान कोई बीस इक्कीस वर्ष का होगा, एकदम सरल स्वभाव सादगी, एव नम्रता से लिप्त था। हर वक़्त कार्य में मगन रहता था लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ वह सजिला जवां एकाएक बुझा-बुझा, अस्तव्यस्त दिखने लगा। उस युवक का नाम मधुर था। वह अपनी कॉलेज का होनहार विद्यार्थी था। वह सभी का का लाड़ला था। कॉलेज की लड़कियां मधुर को पसंद करती लेकिन उसने कभी किसी लड़की से दोस्ती नहीं की। हाय, हलो तक ही सिमीत रहता था। मेरे समझ में ही नहीं आ रहा था क्या बात है जो कि आजकल मधूर कुछ थका थका सा निस्तेज दिखाई दे रहा था।

एक हवा का झोंका आया और मधूर की सारी खुशियों को उड़ाकर ले गया। उस हवा ने मधुर के सारे सपनो को रौंद कर तहस-नहस कर दीया था। ऐसा कुछ दिल पर घना कोहरा छाया कि वह ना तड़प दिखा सकता था ना सागर में तैर सकता ना कोहरे से झाँक सकता था। वह बिना डोर की पंतग बनकर बादलो से टकरा-टकरा कर जख्मी हो चूका था। उसके अंतरात्मा में घनघोर घटाओ ने अपना स्थान बनाया था। वह टूटकर बिखरता जा रहा था।

कॉलेज लायब्रेरी में ज्यादा से ज्यादा समय बिताकर वह घर के लिए जा ही रहा था की किसी लडकी से टक्कर हो गई ,जैसे ही उसे मुड़कर देखा एक लड़की की छवी वहां से निकलकर दुर चली गई। वह सन्न खडा देखता ही रह गया लेकिन एक पल में कोई बोहत ही मोहक भीनी-भीनी महक उसके दिल में समां गई। कुछ देर वह उस महक को अपने में भरकर वैसे ही ठहर गया लेकिन वह कुछ इस तरह की खुशबू थी जिससे मधूर को कुछ देर मंत्रमुग्ध विमूढ कर दिया था। उस हवा में भरी मधुर खुशबू मधुर की सोचने समझने की क्रिया को शिथील कर सारी धड़कनों को जकड़ कर रह गई। जब बेहोशी टूटी तो उस खुशबू को ढूंढ़ने लगा। वह तो वहां से काफुर हो गई थी। थक हारकर मधुर अपने घर पहुँच गया।

वह हर दिन कॉलेज कुछ जल्दी ही चला जाता और निराशा से घिरकर घर लोटता। कई दिन बीत गये, मंजील दुर होकर भी एक आशा का दिया हमेंशा जल रहा था और फिर एक दिन उसी महक ने मधूर को जगाया। फिर से वही महक उसके आसपास मंडराने लगी। उस नवयौवना का नाम मयुरी था। वह सुंदरता की मिसाल थी। संगमरमर की तरह श्वेतरंग, खिलीखिली मुस्कान, सुनहरे घने बाल, गुलाबी गुलाब की तरह होंठ थे, चाँद भी शरमा जाये उसे देखकर इतनी खुबसुरत मयुरी, पागलों की तरह उस महक को ढूंढ रही थी। उसे जो चाह थी वह उसका सच्चा प्यार था। खुबसुरती से उसे को कोई लेना देना नहीं था। शायद उसे भी मधुर के तड़पने की आवाज गई होगी। उसे भी उस सुगंध की खोज थी। वह कई महिनो बाद गाँव से लौटी थी और चातक की तरह महक सुंघते हुये उसी लायब्रेरी में आई थी। जब दोनों का आमना-सामना हुआ तो दोनों एक-दुसरे की महक में खो गये। उस वक़्त एहसास ने नई अंगडाई ली। दोनों में कोई अपरिचीत नहीं था। जैसे बरसो से दोनों एक-दुसरे को जानते हो, कुछ झिझक थी। वह भी प्यार भरी आँखों में खो गई। मधुर को एक नई ज़िंदगी मिली, मयुरी को भी जैसे अपनी मंजिल मिल गई थी। दोनों के दिल में प्रेम का सैलाब उमड़ रहा था।

जब यौवन की दहलीज पर 'पहला प्यार' होता है, कितने वादे ,कसमें खाई जाती है। ह्रदय में कई कई कमल खिलते है। वह क्षण किसी सुहावने मौसम की तरह झरझर झरने की तरह मन को प्रेम से ओतप्रोत भर देती है। सब कुछ नया-नया सा लगता है।

जिसमें सिर्फ कोमल कमल खिलते है। बिना पिए एक नशा सा छा जाता है। सारी कायनात में अपना प्रितम प्रिय लगता है। प्रकृती की रचना भी बड़ी निराली है।सभी को एक अनोखे बंधन में बांधे रखती है। यह प्यार का पौधा कभी नहीं मुरझाता। यह प्रेम दिवानगी भी कहलाता है। इसमें डूबने उबरने की कोई चिंता नहीं होती। यह प्रकृती की बेहतरीन सौगात है।

मिलकर दो दिल खिले और आने वाले सपनो में खो गये। ईश्वर उनकी चाहत को बरकरार रखे।

प्यार पहला अपरिचित

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