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© poonam jaiswal

Tragedy

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अनीता २७ वर्ष की उम्र की पड़ाव पर है, आज सुबह जब वह उठी तो पति को बताया की वह माँ बनने वाली है । यह खबर सुनकर घर के लोग बहुत खुश हुए, आज जब गीता अपने माँ के घर गई तो सबने कहा, "गीता को तो बेटा होने वाला है।" अब गीता जब किसी से मिलती तो सब उसे यही कहते अपना ध्यान देना नहीं तो बेटा कमजोर पैदा होगा। गीता हमेशा सोचती आखिर कोई ऐसा क्यों नहीं कहता तुझे बेटी होने वाली है अपना ध्यान रखना , यह सोचकर गीता का मन आक्रोश करने लगता क्या एक बेटी को जन्म देना पाप है ? क्यों लोग लड़की के पैदा होने पर दुखी होते है और लड़के के पैदा होने पर ख़ुशियाँ मनाते है। कहने को तो हमारा देश प्रगति को ओर अग्रसर है फिर हमारे देश में पुरुष और स्त्री को लेकर इतनी असमानता क्यों है?

गीता को अपने बचपन के दिन याद आते है किस तरह उसकी दूसरी बहन के पैदा होने पर घर के सभी लोगों ने उसके माता से बात -चित करना बंद किया था। इतना ही नहीं गीता जब पांच वर्ष की हुई तो उसके पाठशाला जाने की उम्र हो गई हर माँ की इच्छा होती है की उसकी संतान अच्छे से अच्छे स्कूल में जाएँ, गीता यह सोचकर बहुत खुश थी की बड़े पिता जी के बेटे की तरह वह भी टैगोर निकेतन इस अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ेगी पर जब माँ ने दादी जी से विद्यालय में दाखिले की बात की तो उनका गुस्सा आसमान छूने लगा। दादी आग बबूला होकर कहने लगी ,"गीता को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा कर क्या फायदा यह तो पराया धन है कितना भी पढ़ लिख क्यों ना ले घर का चुल्हा चौका ही करना है।" यह सुनकर गीता के माँ के आँखों में आँसू झरने की तरह बहने लगे बिचारी मन मानकर गीता का दाख़िला सरकारी स्कूल में करवा दिया। जब गीता ने माँ से कहा , "पता है माँ आज हम बहुत खुश है " माँ ने पूछा गीता तुम्हारी ख़ुशी का कारण क्या है बताओ तो जरा ? तब गीता ने कहा माँ आप नहीं जानती, अरे हम भी कल से सूरज भाई के साथ पाठशाला जायेंगे ना इसलिए हम खुश है। गीता के मुंह से यह शब्द सुनकर माँ के आँखों से आँसू आ गए माँ ने गीता को गले लगा लिया और समझाते हुए कहा,"बिटिया यदी आदमी बुद्धिमान हो और वह किसी भी विद्यालय में पढ़े कोई फर्क नहीं पढ़ता वैसे भी हमारी रानी बिटिया तो काफी समझदार इसलिए हमने सोचा है हमारी बिटिया रानी सरकारी विद्यालय में पढ़ेगी और एक बड़ा अफसर बनेगी। " माँ के मुँह से ऐसी बात सुनकर गीता को बहुत दुःख हुआ पुरे दिन ना उसने कुछ न खाया न पिया, छत पर जाकर बस सुबक -सुबक कर रोते का रही थी। शाम को जब माँ थाली में खाना लेकर गीता को खिलाने के लिए पहुंची तो गुस्सा होकर गीता ने मुंह फेरते हुए कहा' " सूरज भईया जो भी मांगते है उन्हें सब मिल जाता है और मुझे तो एक लेमनचूस तब तक नहीं मिलता जब तक मेरे आँखों में आँसू ना आ जाएँ। गीता ने माँ को झकझोर कर कहा तो माँ रोने लगी माँ को रोता देख गीता भी रोने लगी और रोते हुए कहने लगी, " माँ ना रोओ हम सरकारी स्कूल में ही जाएँगे हम किसी चीज की ज़िद नहीं करेंगे हमें माफ़ कर दो, जैसे -जैसे गीता बड़ी होने लगी उसे एहसास होने लगा यह असमानता सिर्फ लड़की होने का ही कारण है। पर गीता ने मन ही मन निश्चय किया मैं खूब पढूंगी और मेरे माता - पिता का नाम रोशन करूंगी गीता पढ़ लिखकर बड़ा अफसर बनना चाहती थी, एम् ए सी की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास होकर तो उसने अपनी माँ का सीना चौड़ा कर दिया। और सूरज भईया अब भी १२ बी की परीक्षा में तीन बार फेल हो चुके थे फिर भी ख़ातिरदारी ऐसे होती की जैसे कहीं के राजा। कई बार तो जब गीता पढ़ने बैठती तो दादी और ताऊ जी बल्ब बंद कर देते पर गीता भी कहाँ हार मानने वाली थी वह भी लालटेन जला कर पढ़ने बैठ जाती, यह देख माँ के आँखों में आँसू आ जाते पर बेचारी मजबूर थी कुछ बोले तो घर में लोग ताने देते बेटी जनी है बेटा नही।

पढ़ाई खत्म होते ही घर के लोगो ने विवाह के लिए ज़िद पकड़ ली तब गीता ने कहा, " हमें विवाह अभी नहीं करना अभी तो हमे और पढ़ना है और बड़ा अफसर बनना है " गीता के मुंह से ऐसी बात सुनकर दादी ने माँ को बहुत सुनाया और तब माँ गीता के पैरों पर गिर गई और कहा बेटी आज मेरी लाज तेरे हाथों में है। माँ को गीता मना न कर सकी और १२ बी फेल लड़के से विवाह कर लिया, आज गीता के सपने चूर -चूर हो गए लड़की होने की इतनी बड़ी सजा क्यों ? अब तो अफसर बनने का ख़्वाब चूर हो चुका था, सुबह -शाम सिर्फ रसोई में ही बीतता।

पलंग पर बैठी गीता का आक्रोश मन आज इस समाज से यही सवाल पूछ रहा है आखिर ऐसा क्यों ? यदि मैंने बेटी जनी तो उसके साथ भी ऐसा ही होगा, नहीं मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा ना होने दूंगी मैं उसके लिए इस समाज से लड़ जाउंगी और उसे उसका हक दिला कर ही रहूँगी।

लड़का लड़की समाज

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