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प्रतिशोध (पार्ट-1)
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© Unknown Writer

Drama Tragedy

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क्षितिज अपने ऑफिस में बैठा किसी केस की फाइल का गम्भीरता से अध्ययन कर रहा था। इसी बीच किसी ने गेट पर हल्की-सी दस्तक दी तो वह फाइल से नजरें हटाकर गेट की ओर नजर देखते हुए शांत स्वर में बोला- "कम इन।"

पल भर बाद लगभग उसी की उम्र का एक युवक गेट पुश करके अंदर दाखिल हुआ।

"बैठिए।" क्षितिज ने काफी गौर से उसका सिर से पाँव तक मुआयना करने के बाद सामने मौजूद चेयर की ओर इशारा करते हुए कहा।

आगन्तुक युवक चेयर खींचकर बैठ गया।

"कहिए, मैं आपकी क्या हेल्प कर सकता हूँ ?" क्षितिज ने अपने सामने रखी फाइल बंद करते हुए पूछा।

"एक्चुअली, मैं यहाँ एडवोकेट क्षितिज राठौर को अपने खिलाफ कोर्ट में चल रहे एक क्रिमिनल केस की फाइल दिखाने आया हूँ।" उसने ऑफिस का सरसरी निगाहों से मुआयना करने के बाद जवाब दिया।

"तो इसके लिए इतना सोच-विचार करने की क्या जरूरत हैं ? लाइए, दिखा दीजिए फाइल।"

"लेकिन मैं ये फाइल एडवोकेट क्षितिज......।"

"ओह ! तो आप भी मुझे देखकर इस गलतफहमी का शिकार हो गए कि मैं एडवोकेट क्षितिज राठौर न होकर उनका कोई जूनियर हूँ।"

"इसका मतलब ये हुआ कि.....।"

"मैं ही एडवोकेट क्षितिज हूँ।"

"सॉरी सर, एक्चुअली......।"

"आपके बारे में मैंने जैसा सुना, आपकी पर्सनेल्टी वैसी नहीं लगी, इसलिए मैं इस गलतफहमी का शिकार हो गया, यही कहना चाह रहे थे न आप ?"

"नहीं सर, मैं ये कहना चाह रहा था कि आपकी उम्र देखकर कोई भी यकीन नहीं कर सकता कि आप ही इस शहर के चंद अच्छे क्रिमिनल लायर्स में गिने जाने वाले एडवोकेट क्षितिज राठौर हैं, क्योंकि वकालत के फील्ड के बारे में कहा जाता हैं कि इस फील्ड में अपनी पहचान बनाने के लिए काफी सालों तक स्ट्रगल करना पड़ता हैं।"

"इस फील्ड के बारे में जो कहा जाता हैं, वह काफी हद तक सही हैं लेकिन पूरी तरह सही नहीं हैं। इंसान के अंदर टेलेन्ट हो, थोड़ी रिस्क लेने की हिम्मत हो और कड़ी मेहनत करने की क्षमता हो तो वह इस फील्ड में भी कम समय में अपनी पहचान बना सकता हैं। चलिए, इस चर्चा यहीं छोड़कर आप जिस काम के लिए मेरे पास आए हैं, उस पर चर्चा करते हैं। लाइए, केस की फाइल दिखाइए।"

"इस केस में मुझे कोर्ट से बेल मिल चुकी है और केस की चार्जशीट भी कोर्ट में पेश की जा चुकी है। फिलहाल इस केस में मेरी ओर से हमारी कालोनी में रहने वाले एडवोकेट विनोद मिश्रा पैरवी कर रहे हैं।" आगंतुक युवक ने अपने साथ लेकर आए थैले में से फाइल निकालकर क्षितिज के हवाले करने के बाद बताया।

"ये तीनों बातें तो मैं चार्जशीट की कॉपी इस फाइल में देखते ही जान गया हूँ क्योंकि चार्जशीट कोर्ट में दाखिल होने के बाद ही उसकी कॉपी आरोपी को दी जाती गई और चार्जशीट कोर्ट में दाखिल होने के बाद आरोपी के बाहर आजाद घूमने का मतलब हैं कि उसे कोर्ट बेल पर रिहा कर चुकी हैं और जनरली बेल की कार्रवाई बिना कोई लायर अपाइन्ट किये नहीं होती हैं। आप मुझे ये बताइए कि आप पर कोर्ट ने चार्जेज फिक्स कर दिए या नहीं ?" क्षितिज ने फाइल के पन्ने पलटते हुए कहा।

"चार्जेज तो पुलिस ही लगा चुकी हैं।"

"भाई, कोर्ट पुलिस के लगाए चार्जेज के आधार पर केस का ट्रायल नहीं करती, प्रासिक्यूशन और डिफेंस की आर्गुमेन्ट्स सुनने के बाद केस की स्टडी करके खुद चार्जेज लगाती हैं। इस प्रोसिजर में कुछ कैसेज में पुलिस के लगाए चार्जेज एज इट इज रहते हैं, कुछ में बढ़ जाते हैं, कुछ में घट जाते हैं और कुछ मामलों में आरोपी के खिलाफ कोई विश्वसनीय साक्ष्य नजर नहीं आने पर इसी स्टेज डिस्चार्ज भी कर दिए जाते हैं। बात समझ में आ गई ?"

"जी हाँ, पर मेरे केस अभी ऐसी कोई प्रोसिजर नहीं हुई।"

"ठीक हैं। अब मेरी बात ध्यान से सुनिए, इस चार्जशीट के अनुसार आप दिनांक 14/02/2017 को दिन के करीब साढ़े बारह बजे एम एल बी गर्ल्स कॉलेज के सामने पहुँचे और कालेज के गेट के सामने खड़ी उसी कालेज में पढ़ने वाली आभा नाम की लड़की को प्रपोज करके रेड रोज थमाने का प्रयास करने लगे और जब आभा ने आपसे रोज लेने से मना कर दिया तो आपने उसे जबरन अपनी ओर खींचकर अपनी बाहो में कैद कर लिया और उसकी इच्छा के विरूद्ध उसे चूमना शुरू कर दिया।

उसी समय आभा का भाई विक्रम उसे लेने घटनास्थल पहुँचा और अपनी बहन के साथ आपको जोर-जबरदस्ती करता देख आपके चंगुल से अपनी बहन को छुड़ाने का प्रयास करने लगा, जिसके बाद आपने विक्रम की बहन को तो छोड़ दिया, पर विक्रम को अपनी बाइक में बंधी हाकी स्टिक से बेदर्दी से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया और घटनास्थल से अपनी बाइक लेकर भाग गए। आपके द्वारा विक्रम के साथ की गई मारपीट में उसके दाहिने हाथ की हड्डी फैक्चर हो गई और उसके शरीर के कई भागों में गम्भीर चोटें आई। बताइए, आप पर आभा के साथ सरे आम छेड़छाड़ करने और विक्रम के साथ गम्भीर रूप से मारपीट कर उसका हाथ तोड़ देने के जो गम्भीर आरोप लगे हैं, उनमें कितनी सच्चाई हैं ?"

"सर, पूरी घटना में सिर्फ इतनी-सी सच्चाई हैं कि उस दिन मैंने विक्रम के साथ मारपीट की थी, लेकिन हाकी स्टिक से नहीं बल्कि अपने लात-घूसो से की थी और वो भी इतनी ज्यादा नहीं की कि सामने वाला अधमरा हो जाए या उसके हाथ-पैर टूट जाए। जहाँ तक छेड़छाड़ की घटना का सवाल है तो उस दिन गर्ल्स कालेज सामने छेड़छाड़ की घटना भी हुई थी लेकिन छेड़छाड़ मैंने विक्रम की बहन के साथ नहीं की थी, बल्कि विक्रम ने मेरी कजिन आँचल के साथ की थी और विक्रम वहाँ अपनी बहन को लेने नहीं गया था, वेलेनटाइन डे पर आँचल को रेड रोज देकर प्रपोज करने गया था।

विक्रम की बहन आभा उस कालेज में पढ़ती जरूर हैं लेकिन वो अपनी खुद की कार से कालेज आती-जाती है इसलिए विक्रम को उसे लेने या छोड़ने जाने की जरूरत ही नहीं हैं। फिर भी वो पिछले डेढ़-दो साल से पहली शिफ्ट की लड़कियों के कालेज आने-जाने के टाइम पर अक्सर उस कालेज के गेट के सामने खड़ा रहता है और आँचल पर आते-जाते समय भद्दे कमेन्ट्स करता रहता है। उस दिन वह आँचल को कालेज के गेट पर रोककर उसे जबरदस्ती रोज थमाने की कोशिश करते हुए नजर आ गया तो मैंने उसकी लात-घूसों से थोड़ी-सी मरम्मत कर दी। उसकी बहन बीच-बचाव करने आई तो मैंने उसे ये चेतावनी देकर छोड़ दिया कि वो अगली बार आँचल के आस पास भी नजर आया तो हाथ-पैर तोड़ दूँगा और आँचल को अपनी बाइक पर बैठाकर घर चला गया।

दो दिन बाद जब पुलिस मुझे गिरफ्तार करने मेरे घर आई, तब मुझे पता चला कि विक्रम ने अपनी बहन की मदद से छोटी-सी घटना को तोड़-मरोड़कर और उसमें मिर्च-मसाला लगाकर इतनी बड़ी बनाकर मेरे खिलाफ एफ आर आई की हैं। उन दोनों भाई-बहन की इस रिपोर्ट की वजह से मुझे पूरे इक्कीस दिन जेल में बिताने के बाद बेल मिली और अभी भी केस का फंदा मेरे गले में लटक रहा है। यदि इस केस में मुझे ढंग से डिफेंड नहीं किया गया तो काफी लम्बे समय के लिए जेल जाना पड़ जाएगा और मैं दुबारा जेल गया तो मेरी माँ ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, क्योंकि उनका इस दुनिया मेरे अलावा कोई नहीं है। मेरे पिता की जब मैं ढाई-तीन साल का था, तभी उनके एक कमीने दोस्त ने हत्या कर दी थी।

मेरे कोई भाई-बहन भी नहीं हैं। मेरी माँ मुझे अपना एकमात्र सहारा समझकर जैसे-तैसे जी रही है। उन्होंने इस बार मेरे जेल जाने पर मुझे बेल मिल जाने और अदालत में निर्दोष सिद्ध हो जाने की उम्मीदों केे भरोसे खुुुद को सम्भाल लिया, लेकिन मुझे सजा हो जाने पर तो कोई ऐसी उम्मीद भी नहीं बचेगी, जिसके सहारे मेरी माँ खुद को सम्भाल ले। मेरे सामने एक समस्या ये भी है कि मैं खुद को बचाने के लिए कोई बड़ा काबिल क्रिमिनल लायर भी नहीं लगा सकता, क्योंकि मेरे पास किसी बड़े लायर की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए मिश्रा जी से ही काम चला रहा था, लेकिन परसो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि इस केस से मुझे बरी कराना उनके बस की बात नहीं हैं, यदि मैं बरी होने की उम्मीद जिंदा रखना चाहता हूँ तो मुझे शहर के चार काबिल क्रिमिनल लायर्स में किसी से अपने केस पैरवी करवाना होगा।

उन्होंने जो चार नाम मुझे सजेस्ट किए थे, उनमें से तीन से मैं मिल चुका हूँ। उनमें से किसी की भी फीस दे पाना मेरे लिए नामुमकिन हैं। अब मेरी सारी उम्मीदें आप पर टिकी हुई हैं क्योंकि मिश्रा जी के बताये चार काबिल लोगों में से आप चौथे और लास्ट व्यक्ति हैं। आपको रिजनेबल फीस में मेरा केस भी लड़ना हैं और मुझे बरी भी करवाना हैं।"

"आकाश भाई, मैं आपकी कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए अपनी फीस तो कम कर सकता हूँ लेकिन इस केस से बरी करवाने की गारंटी नहीं दे सकता। आप कह रहे हैं कि आपने विक्रम के साथ जिस तरह की मारपीट की, उसमें उसकी हाथ की हड्डी फैक्चर नहीं हो सकती, लेकिन उसकी मेडिकल रिपोर्ट में उसके हाथ की हड्डी फैक्चर होना......।"

"वकील साहब, ये मेडिकल रिपोर्ट झूठी है। विक्रम का बाप इस स्टेट की रूलिन्ग पार्टी का एम एल ए है। वो सोनगढ़ नाम के एक गाँव में रहता है पर उसकी पहुँच इस शहर तक है। जरूर उस कमीने विक्रम ने अपने बाप की राजनीतिक पहुँच का गलत इस्तेमाल करके या अपने बाप की बेहिसाब दौलत का दुरूपयोग करके ये झूठी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करवाई होगी।"

"चलो, मैं मान लेता हूँ कि ये मेडिकल रिपोर्ट झूठी हैं लेकिन हम इस मेडिकल रिपोर्ट को झूठी सिद्ध कैसे करेंगे ? ये तो एक समस्या है। इस केस में ऐसी और भी कई समस्याएँ है, जैसे एक समस्या ये है कि हम आपके विक्रम के साथ झगड़ा होने की वास्तविक वजह सिद्ध नहीं कर पाए तो कोर्ट उनकी ये बात आसानी से मान लेगी कि विक्रम के साथ आपका झगड़ा आपके द्वारा उसकी बहन को छेड़ने की वजह से हुआ, जिससे आपके विरुद्ध छेड़छाड़ का आरोप आटोमेटिक प्रूव हो जाएगा। इसके तोड़ के रूप में हम यदि कोर्ट के सामने ये बात लाने की कोशिश करते हैं कि आपका विक्रम के साथ झगड़ा उसके द्वारा आपकी कजिन को छेड़ने की वजह से हुआ था तो इस बात कोर्ट यकीन नहीं करेगी, क्योंकि आप लोगों ने विक्रम के खिलाफ छेड़छाड़ की कोई कम्पलेन ही नहीं की है, जो कि आप लोगों को तत्काल करनी चाहिए थी।"

"सर, हम लोग उसी दिन विक्रम के खिलाफ कम्प्लेन करना चाहते थे, पर हम लोगों ने आँचल की पढ़ाई छूट जाने के डर से कम्प्लेन् नहीं की। एक्चुअली, मेरे मामाजी यानी आँचल के पिता विक्रम और उसके बाप से बहुत डरते हैं। दो साल पहले जब आँचल अपने छोटे-से शहर राघवपुर में पढ़ती थी, तब ये कमीना विक्रम वहाँ भी ऐसे ही उसके पीछे पड़ा रहता था। एक दिन ये बात मेरे मामाजी को पता चली तो उन्होंने आँचल की पढ़ाई बंद कराकर उसका घर से निकलना बंद करा दिया था।

ये बात मेरी माँ को पता चली तो उन्होंने मेरे मामाजी से कहकर आँचल को पढ़ने के लिए यहाँ बुला लिया। यदि मेरे मामाजी को पता चलेगा कि वो कमीना आँचल के पीछे-पीछे यहाँ भी आ गया हैं और यहाँ भी आँचल के साथ छेड़छाड़ करता रहता है तो वे आँचल को फौरन वापस लेकर चले जायेंगे और यदि मैं उस दिन या और कभी आँचल से उस कमीने के खिलाफ कम्प्लेन करवाकर उसे जेल की हवा खिला देता तो उसके नेता के बेटे होने की वजह से उसके जेल जाने की बात उसके गाँव सोनगढ़ तक जरूर पहुँचती और फिर धीरे-धीरे फैलती हुई राघवपुर भी पहुँच जाती, क्योंकि सोनगढ़ से राघवपुर से ज्यादा दूर नहीं हैं और सोनगढ़ की तरह ही राघवपुर में भी इस कमीने और इसके बाप को बच्चा-बच्चा जानता हैं, इस..........।"

"समझ गया, मैं आप लोगों के कम्पलेन न करने की वजह पूरी तरह से समझ गया। आप ऐसा कीजिए, शाम को करीब साढ़े आठ बजे आइए। अभी तो मेरे कोर्ट जाने का टाइम हो गया, इसलिए बाकि का डिस्कस शाम को ही हो पायेगा। ठीक हैं ?"

"ठीक है सर, थैंक्यू वेरी मच।" कहकर आकाश उठा और बाहर निकल गया।

क्षितिज ने भी फाइल बंद की और ऑफिस से निकलकर अपने घर के लिए रवाना हो गया।

छेङ़छाङ धोखा मुकदमा

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