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मेहनताना
मेहनताना
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© Rajveer Singh Prajapati

Classics Inspirational Tragedy

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लोग कहते हैं कि जिंदगी को जब बदलना होता हैं तो बस एक पल कि जरूरत होती हैं और ये पल जो कि हर वक़्त का सबसे छोटा हिस्सा होता हैं इस पल के आगे काफी लम्बा होता है. सतबीर भी इसी पल कि तलाश में था जो उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दे और जिसकी खातिर नौकरी के सिलसिले में उसने सैकड़ो इंटरव्यू दिये थे. लेकिन कोई भी नौकरी में तब्दील ना हो सका. तकरीबन तीन साल गुजर चुके थे जब तालीम पूरी करके कॉलेज के बाद सतबीर ने नौकरी की जद्दोजहद शुरू की थी. अब तो उम्मीद भी उससे अपना दामन छुड़ा रही थी.

हालाँकि, एक आखिरी इंटरव्यू का बुलावा सपनो के शहर बम्बई से उसके हाथ में था, जिसकी खातिर सतबीर एक रात पहले ही सैकड़ो मील का सफर तय करके पंहुचा था और एक सस्ते से सराय में ठहरा था | अगली सुबह ठंडे पानी से नहाकर, तैयार होकर, एक फाइल को हाथ में लेकर निकला जिसमे कुछ दस्तावेज़ थे जो दुनिया कि नज़रो में उसके लायक और पढ़े-लिखे होने का सबूत थे | चलते-चलते उसने अपना बटवा निकला, उसमे दो दस रूपए के नोट थे, एक माँ-बाप की तस्वीर और एक उस रब की जिसमे वो यकीन रखता था | बहरहाल, रेलवे स्टेशन पहुचने से पहले उसने अपने रब कि तस्वीर को किसी कूड़े के टोकरे के हवाले कर खुद को काफ़िर मुश्तहिर कर दिया था | स्टेशन पहुंचकर दस-दस के नोट से उसने तयशुदा जगह पर जाने और लौटने कि टिकट खरीदी | कुछ पैदल पूल चढ़ने और उतरने के बाद गाडी पकड़ने के लिए वो सही प्लेटफार्म पर हाजिर हुआ | इसी दौरान सतबीर ने लोगो को तेज़ी से चलते, भागते, बिना माफ़ी मांगे धक्का देकर निकलते देखा | उसके लिए यह दुनिया का वो हिस्सा था जहाँ जिंदगी जीने कि बजाय जिंदगी को गुजरना ज्यादा जरूरी होता है | प्लेटफार्म पर हर जानिब लोगो के हुजूम थे जिनके हाथो में अखबार, कांधो पर बैग और निगाहो में बैचैनी जिसे वो छत पर टंगी घडी कि जानिब उछाल रहे थे इस फ़िराक में कि वो झूलकर उसकी सूइयों पर वक़्त कि मियाद को कम कर देगी |

इन सब के बीच एक खट-खट कि आवाज़ सतबीर को परेशान कर रही थी | उसने पलटकर देखा तो मालूम हुआ कि प्लेटफार्म पर बैठे जूते पॉलिश करने वाले मुमकिन ग्राहक की  तवज्जो हासिल करने के लिए ब्रश को जूते रखने वाली तख्ती पर ठोक रहे थे | जिनके पास ग्राहक थे वो पूरी शिद्दत से जूते चमका रहे थे | उनकी तेज़ी को देखकर महसूस होता था कि गाडी के छूटने कि फ़िक्र मुसाफिर से ज्यादा उन्हें थी |

सतबीर कि नज़रो को एक बूढ़े बूट पॉलिशर ने कैद कर लिया था, जो उसकी जानिब देखते हुए खट-खट कि आवाज़ कर रहा था |

"इन जूतो के साथ तुम्हे वो नौकरी हासिल नहीं होगी जिसके लिए तुम जा रहे हो," बूढ़े ने सतबीर के निहायत ही बदहाल जूतो कि जानिब इशारा करते हुए कहा |

"बाबा, तुम्हे किसने कहा कि मै नौकरी के लिए जा रहा हूँ |" सतबीर ने ताज्जुब भरी निगाहो से बूढ़े से पूछा |

 "बेटा 30 बरस से इस प्लेटफार्म पर जूते पॉलिश कर रहा हूँ, मै मुसाफिर कि शक्ल देखकर बता सकता हूँ कि वो कौनसा मुकाम हासिल करने निकला है| " बूढ़े ने जवाब दिया और काफी इसरार किया की सतबीर अपने बदहाल जूतो की मरम्मत और पॉलिश दोनों ही करवा ले|

इस पर सतबीर उसके पास गया और दबी हुई आवाज़ में बोला, "मेरे पास इन जूतो को ठीक करवाने के लिए पैसे नहीं है बाबा|"

बूढ़े बूट पॉलिशर ने जवाबन कहा,"फ़िक्र कि कोई बात नहीं है इसमें, मैंने तुमसे पैसे मांगे ही कहाँ हैं| अगर तुम्हे ये नौकरी मिल जाये तो वापस लौटकर मिठाई के साथ मेरा मेहनताना दे देना और अगर खुदा न करे कि तुम्हे ये नौकरी नहीं मिलती है तो उदास मत होना, लौटकर फिर आना मैं तुम्हारे जूते अगली नौकरी के इंटरव्यू के लिए मुफ्त में पॉलिश करके दूंगा, जब तक कि तुम्हे नौकरी नहीं मिल जाती |

"इक अजनबी कि खातिर इतनी दरियादिली क्यों? सतबीर ने हैरान नज़रो से पूछा |

"ये जहान फकीरो कि फकीरी से नहीं अलबत्ता होशियारो कि होशियारी से है, एक सबक दे रहा हूँ तुम्हे, जो मैंने ताउम्र गुज़ार कर सीखा है - कुछ बनने के लिए पहले उस जैसा दिखना ज़रूरी होता हैं और आज के ज़माने में जूते ख्वाहिश मंद इंसान कि सबसे बड़ी जरूरत हैं | यही हैं जो उन्हें उनकी ख्वाहिशो के पीछे हर वक़्त भागते रहते हैं और मुश्किल वक़्त में किसी चट्टान कि तरह खड़ा भी रखते हैं | यही वजह है कि इंसान कि पहचान बावजूद उसकी अच्छी सूरत के उसके जूतो से होती हैं |

आखिरकार, सतबीर राजी हो गया | बूढ़े बूट पॉलिशर से जूतो कि मरम्मत करवाई और लौटकर जरूर आऊंगा इस वादे के साथ अलविदा कहके रेलगाड़ी पकड़ कर मुकाम कि सिम्त बढ़ गया |

बहरहाल जब वो सुबह निकला था तो उम्मीद को जिंदगी से जुदा करके निकला था | सोचकर कि नौकरी मिली तो ठीक वरना डूबकर फनाह होने के लिए बम्बई के समंदर कि गहराई काफी होगी | जब शाम को नौकरी हासिल करके सतबीर उसी प्लेटफार्म पर लौटा तो बूढ़े बूट पॉलिशर को वहां ना पाकर मायूस हो गया | हर गोशा तलाशने और कुछ वक़्त इंतज़ार करने के बाद वो अपने सस्ते से सराय लौट गया इस उम्मीद में कि अब कल मुलाक़ात होगी|

अगली सुबह वो फिर उसी प्लेटफार्म पर खड़ा था | आज नौकरी का पहला दिन था | वो भी अपनी बैचैनी उछाल रहा था - कभी छत से लटकी घडी कि जानिब तो कभी वहां बैठे हर बूट पॉलिशर कि | वो जगह खाली थी जहाँ वो बूढ़ा बूट पॉलिशर कल बैठा था|

शाम हुई और सतबीर ने खुद को वापिस उसी प्लेटफार्म पर फिर पाया | वो बूढ़ा वहां नहीं था | मुलाक़ात ना हो पाने कि सूरत में सतबीर को खुद पर खीज आ रही थी | उसने फैसला किया कि वो रात उसी प्लेटफार्म पर गुजरेगा ताकि सुबह जल्दी मुलाक़ात मुमकिन हो सके | वो वहीं एक किताबो की दुकान के नीचे सो गया |

"उठो, यह मेरी दुकान है किसी भिखारी के सोने की जगह नहीं | चलो जाओ यहां से | " सुबह जब दुकान के मालिक ने उसे वहां सोता पाया उसे नींद से जागते हुए कहा |

"तकलीफ के लिए माफ़ी, मै कोई भिखारी नहीं हूँ, मै यहां बूढ़े बूट पॉलिशर का इंतज़ार कर रहा हूँ जो आपकी दुकान के पास बैठता है | " सतबीर ने दुकानदार से कहा|

"तुमने उस मरे हुए बूढ़े के लिए यहां खुले मे रात गुजारी है, क्या लगता था वो तुम्हारा? " दुकानदार ने जवाबन पूछा |

"माफ़ कीजिए, क्या अपने कहा मरे हुए? " सतबीर ने हैरनियत से दुकानदार कि जानिब देखा |

"हाँ, कल दोपहर के वक़्त उसे दौरा पड़ा और किसी के मदद करने से पहले ही वो मर गया था| "

"क्या वो बहुत बीमार थे ? "

"बहुत ज्यादा, कइ मर्तबा मैंने उसे पैसे देने की कोशिश कि ताकि वो डॉक्टर से अपना इलाज़ करवा सके, लेकिन उसने हमेशा लेने से इंकार किया | बड़ा ही ज़िद्दी और खुद्दार बूढ़ा था |

सतबीर की पलकों का झपकना यका यक बंद हो गया था और एक सन्नाटा कानो मे गूंजने लगा, उसे सिर्फ उस बूढ़े बूट पॉलिशर का मुस्कुराता चेहरा नज़र आ रहा था | उसने अपनी पतलून की बाईं जेब मे हाथ डाला और रुपये निकले जो वो बूढ़े को देना चाहता था उसका मेहनताना, जो कि अब सतबीर की रूह पर जिंदगी का उधार बनकर चढ़ चूका था |

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