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चुड़ैल वाला मोड़ पार्ट 7
चुड़ैल वाला मोड़ पार्ट 7
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© Vikas Bhanti

Drama Tragedy

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"डॉक्टर साब, क्या मैं बगल के वार्ड में जा सकता हूँ।" संकेत ने डॉक्टर शर्मा से पूछा।

"क्यों, वहाँ क्या काम है तुमको ? बस, एक हफ्ते की बात और है, उसके बाद जहाँ चाहो वहाँ जाना, पर कुछ हिदायतें हैं, उनका ध्यान रखना संकेत, नो बाइक राइडिंग, नो रनिंग, नो स्विमिग एंड नो आउटर स्पोर्ट्स टिल वन इयर। ओके !" डॉक्टर ने कड़क शिक्षक सी सीख सुना दी।

"याह, ओके।" संकेत भी अच्छे स्टूडेंट की तरह बोला।

पर कसक तो रह-रह कर उमड़ रही थी संकेत के मन में। माँ से तो कहने का कोई सवाल था नहीं और पापा कभी अकेले साथ होते नहीं थे। पापा से आम हर बच्चे की तरह एक दूरी सी थी संकेत की। घर में उनकी पदवी भी किसी पूजनीय देवता सरीखी थी जिनकी पूजा तो की जा सकती है, जिनसे आशीर्वाद तो लिया जा सकता है पर दोस्ती नहीं की जा सकती ।

पर आज सिचुएशन कुछ बदल सी गई थी। माँ बड़े दिनों बाद आज आराम करने घर पर थी और पापा अस्पताल में। बड़ी देर की खामोशी पापा ने खुद तोड़ी, "बेटा, तेरे साथ गाडी़ में कोई बैठा था क्या उस रात ?"

पापा का इतना सटीक असेस्मेन्ट सुनकर अचम्भित रह गया संकेत। सिर घबराहट में हाँ में हिल गया पर मुँह से नहीं निकला।

"बेटा, घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है। मुझे पता है तुम यंग हो, इच्छाएँ भी होंगी। जो कुछ भी है मुझे सच-सच बताओ।" पापा बोले।

"पापा.........., वो ...एक ..चुड़ैल थी।" संकेत हिचकिचाते हुए बोला।

"व्हाट रब्बिश !" पापा के मुँह से बस इतना ही निकला।

"पापा, मैं चुड़ैल वाले मोड़ पर था। एक बेसहारा सी लड़की ने मुझसे मदद माँगी। मैंने उसे बैठा लिया और एक किलोमीटर के भीतर ही मेरा एक्सीडेंट हो गया। पापा वो चुड़ैल ही थी तभी तो गायब हो गई।" संकेत बोलते-बोलते चुप हुआ पर फिर कुछ सोचते हुए बोला, "पर आपको कैसे पता चला कि कोई बैठा था ?"

"बाप हूँ तेरा। तूने इतने दिन सस्पेन्स बनाया है, थोड़ा सा हक़ तो मेरा भी बनता है। तू घर आ, तुझे तेरे केस की हर परत उतार के बताऊँगा।" पापा किसी डिटेक्टिव की तरह बातें कर रहे थे।

बाप-बेटे की बातें ख़त्म ही हुईं थीं कि दरवाजे पर सुशान्त खड़ा था। पहले से थका, दुबला, आँख के नीचे काले घेरे पर होठों पर वही शरारती मुस्कान।

"क्या बे, मेरे एक्सीडेंट के गम में नस काट ली तूने। इधर आ....बैठ यहाँ, मुझे कुछ बातें करनी है तुझसे।" संकेत, सुशान्त को देखते ही बोला और सुशान्त चुपचाप सिरहाने पड़ी बेंच पर बैठ गया।

"तुम लोग बात करो, मैं ज़रा हवा लेकर आया।" पापा भॉंप गए थे कि संकेत, सुशान्त से कुछ पर्सनल बातें करना चाहता है।

पापा के जाते ही संकेत तैश से बोला, "अबे, ऐसा क्या हो गया तेरे साथ कि सुसाइड अटेम्पट कर डाला तूने। बात क्या है मुझे तो बता।"

"वो मुझे छोड़ गई। हमेशा के लिए.....।" सुशान्त इतना बोल फफक के रो पड़ा।

"कौन छोड़ गई ? तू पहेली मत बुझा पूरी बात बता।" संकेत ने सुशान्त से पूछा।

"रश्मि नाम था उसका, लास्ट यीअर मिली थी मुझसे कार्निवल के दौरान। बस, मुलाकातें बढ़ी, बातें हुईं और हम प्यार कर बैठे। मासूम सी उसकी मुस्कराहट और समझदारी वाली बातें। मैं उसके प्यार में घिरता ही चला गया। पर पिछले दो महीनों से उसका कुछ पता नहीं है। मैं नहीं रह सकता उसके बिना संकेत, प्लीज मेरी रश्मि को ढूंढ़ दो....प्लीज मेरी रश्मि......" और सुशान्त बिलख-बिलख कर रोने लगा।

अब कहानी में एक नयी करैक्टर भी थी रश्मि, पर यह कौन थी और कहाँ थी, यह जानना भी संकेत के लिए बहुत ज़रूरी हो गया था।

शेष अगले अंक में ......

दुर्घटना दुविधा चुङैल

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