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Vikas Bhanti

Action Inspirational


4.6  

Vikas Bhanti

Action Inspirational


एक सैनिक की वीडियो डायरी

एक सैनिक की वीडियो डायरी

8 mins 323 8 mins 323

बहुत नफ़रत थी सूरज को इंडियन आर्मी से, आखिर उसके पिता को छीना था उसने। पुलवामा में लेफ्टिनेन्ट के पद पर तैनात सूरज के पिता सुयश ठाकुर, एक आतंकवादी हमले में शहीद हो गए थे। एक हफ्ते का मज़्मा रहा घर पर, नेता, अभिनेता, मीडिया दर्शक सब आये पर वो पिता नहीं आया जिसकी गोद में बैठ कर और उँगलियां टटोल टटोल कर गिनती सीखी थी उसने।


अपने पिता की मौत का ज़िम्मेदार वो पूरी तरह से आर्मी को ही मानता था। माँ के चेहरे पर भी यदा कदा शिकन देख लिया करता था सूरज। पिता के एवज में आयकर विभाग में नौकरी तो मिल गई थी माँ को पर अक्सर पिता की तस्वीर देखती रहती थी। सूरज पूछ्ता तो बोलती कि वक़्त आने पर बताउंगी।


पिता की मौत के वक़्त 6 साल का था सूरज, उस वक़्त तो उसे लगता था कि शायद किसी दिन दरवाज़ा खटकेगा और वो भाग के खोलेगा और वर्दी में उसके पिता सामने खड़े होंगे, पर इंतज़ार बढ़ता गया और वो दिन कभी न आया।


स्कूल में हर 26 जनवरी और 15 अगस्त उसे सामने बुला कर एक मिसाल की तरह पेश किया जाता था और उसे यह रिवाज़ नागवार ही गुज़रती थी, उसे यह रिवाज़ नहीं बल्कि पिता चाहिये थे। दोस्तों और उनके पिताओं के बीच की केमिस्ट्री उसे बहुत खलती थी और साथ साथ माँ के रिश्तेदारों की सलाहें कि उसे शादी कर लेनी चाहिये, पर सूरज के पिता की जगह कोई और कैसे ले सकता था। उसे चिढ़ सी होने लगी थी रिश्तेदारों से और पड़ोसियों से।


साल बीतने के साथ उसकी नफ़रत बढ़ती ही जा रही थी, जहां कहीं भी वर्दी में किसी जवान को देखता तो उसका खून खौल उठता। उसका 18वां जन्मदिन आने में 2 दिन बाकी थे। स्कूल से जैसे ही लौटा तो पता चला माँ किसी काम से 2 दिन के लिए बाहर गयी हैं और एक सन्देश कि, "अलमारी में लाल लिफाफे में तेरे लिए कुछ है।"


सूरज भागा और लाल लिफाफा खोल कर देखा उसमें 3 वीडियो डीवीडी रखी हुईं थीं जिन पर 1 से 3 तक नंबर लिखे थे। सूरज ने पहली डीवीडी लगाई। वीडियो में कई सारे स्कूल के छात्र दिख रहे थे, वीडियो काफी पुराना और धुंधला था पर एक चेहरा उसकी पहचान का था वो उसके पिता का था।


एक लड़का बारी बारी से सबसे इंटरव्यू सा ले रहा था कि आज स्कूल का आखिरी दिन है और आगे जाकर कौन क्या क्या बनेगा... किसी ने डॉक्टर बोला, किसी ने इंजीनियर, किसी ने मैनेजर पर जब उसके पिता की बारी आई तो उन्होंने कहा आर्मी, क्योंकि देश के लिए काम करने से ज्यादा अच्छा पेशा कोई हो ही नहीं सकता। इसके बाद वीडियो कटा और अगला वीडियो शुरू हो गया।


वीडियो में पापा बाबा दादी को एनडीए में सेलेक्शन की खबर दे रहे थे। वो पल वास्तव में बहुत खूबसूरत लग रहा था। बाबा और दादी की आँखों में आंसू थे और नज़रों में एक फक्र साफ़ दिख रहा था। चाचा सेल्युट कर के पापा के चक्कर लगा रहे थे। ऐसा माहौल था जिस को जी कर देखने की इच्छा सूरज को होने लगी थी।


वीडियो बदला और वो दिन आ गया जब पापा को अकेडमी जाना था पर कोई दुखी नहीं था सबके चेहरे पर मुस्कान थी। उनका बेटा अफसर बनने जा रहा था। 9 घंटे की उस वीडियो सीडी में वीडियो आते रहे और सूरज बिना पलक झपकाये उसे देखता गया। रात के 3 बज गए थे। सूरज जैसे पिता की ट्रेनिंग के हर पल को खुद में जी रहा था। वो परेड, वो ट्रेनिंग, वो मस्तियां, वो दोस्ती जिसमें सजा लेने के लिए भी हर कोई तैयार रहा करता था।


छोटे छोटे हज़ारों वीडियोज से बनी वो सीडी सूरज को किसी भी एक्शन फिल्म से ज्यादा रोमांचक लग रही थी। सबसे मज़ेदार वो पल था जब हैंड ग्रेनेड फेन्कने की ट्रेनिंग थी और बोध प्रकाश बस ग्रेनेड की पिन खींच कर बस खड़ा हो गया ये तो भला था राजपुरोहित सर का कि तेज़ी से कूदे और ग्रेनेड को दूर फेंका और उसके बाद बोध प्रकाश पूरे ग्राउंड का चक्कर कुलमुन्डी लगा कर पूरा कर रहे थे। बन्दूक, टैंक, बम, मशीन गन और न जाने क्या क्या!


वीडियो ख़त्म होते ही सूरज को नींद आने लगी और वो सो गया। अगले दिन की शुरूआत होते ही उसने दूसरी सीडी लगाई। वीडियो की शुरूआत ग्रेजुएशन सेरेमनी से हुई। सभी कैडेट्स ने देश सेवा की शपथ ली और फिर हवा में उछलती टोपियां। सूरज के रोंगटे खड़े हो रहे थे और उसकी आर्मी के लिए नफ़रत कुछ हद तक कम हो रही थी।


पापा को पहली पोस्टिंग बरेली में मिली थी। 3 रूममेट्स के साथ पापा को रूम नंबर 111 मिला था। अक्सर तीनों दोस्तों के बीच देश और हालातों को लेकर बातें हुआ करतीं थी और तीनों ही किसी भी हद तक देश सेवा करने को तैयार दिखा करते थे।


पापा की पहली 26 जनवरी की परेड बड़ी स्पेशल थी, जिसमे बाबा, दादी भी शामिल हुए थे। दोनों ही बहुत खुश नज़र आ रहे थे और पापा भी, जैसे एक सपना पूरा हो चुका हो। ऐसी और भी कई परेड्स शामिल थी उस वीडियो में और हर परेड में पापा का उत्साह बढ़ता ही जा रहा था।


एक वीडियो आया और उसमे पापा अपने बरेली के कई दोस्तों से गले मिल रहे थे उनको ईस्टर्न फ्रंट पर लड़ाई के लिए अपॉइंट किया गया था और उनके साथ 80 और जवान भी थे उस कैम्प से। सब ट्रेन में देशभक्ति के गाने गाते हुए जा रहे थे जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई हो। किसी के चेहरे पर लड़ाई का डर या शिकन मौजूद नहीं थी बल्कि ख़ुशी और गर्व था।


लड़ाई के कुछ एक वीडियो और जीत के जश्न में नाचते सैनिकों को देखना सूरज को रोमान्चित कर रहा था। सब अपने अपने बेस वापस लौट आये थे और एक दूसरे को लड़ाई के अपने अनुभव सुना रहे थे। पापा की जब बारी आई तो उन्होंने भी बोलना शुरू किया,"यारा बल्ली ने बचा लिया मुझे वरना उस दिन ही तमन्ना पूरी हो जाती मेरी देश पर शहीद होने की पर यार मज़ा बहुत आया। मेरी ज़िन्दगी की पहली लड़ाई थी ये और मैंने जी लिया वो पल। काश 100 जानें मिलें और हर जान लुटा दूँ भारत माता पर।"


सूरज को भी पिता की इन बातों पर गर्व अनुभव हो रहा था। एक ज़ज़्बा सा जागने लगा था मन में। वीडियो के आखिर में उसके पैदा होने के बाद पापा की गोद में जाने का वीडियो था। पापा ने उसे उठाते ही बोला, "मेरा बेटा मेजर बनेगा।" वीडियो ख़त्म हो गया था और सूरज की आँखों से आन्सुओ की धार बहे जा रही थी।


कुछ खाने के बाद उसने तीसरी सीडी लगाई। वीडियो की शुरूआत पापा के कश्मीर ट्रांसफर से हुई। पापा बहुत खुश थे, माँ को गले लगा कर वो निकल गए। कश्मीर पहुँच कर उनका स्वागत पत्थरों से हुआ। कई कश्मीरी उनके ट्रूप पर पत्थर बरसा रहे थे और पापा अपने साथियों के साथ बस बचाव करते आगे बढ़ते रहे।


एक सिपाही ने सवाल किया, "साब आपने ज़वाब क्यों नहीं दिया?" तो पापा ने ज़वाब दिया, "शर्मा नफ़रत नफ़रत से ख़त्म नहीं होती।" वीडियो में उन्ही कश्मीरियों के लिए कई अच्छे काम करते हुए पापा और उनके साथी कई बार दिखे। 7 घंटे के उस आखिरी वीडियो में बहुत सी ऐसी चीज़ें शामिल थीं जो सूरज को रोमान्चित कर रहीं थी।


कश्मीर की वादियां, वहां के खूबसूरत लोग, छोटे मोटे ऑपरेशन और फिर 26 जुलाई 2009 का वो दिन जब कैम्प पर फिदायीन हमला हुआ था। लोग बैरक में बैठे गाने गा रहे थे, तभी ज़ोर का धमाका हुआ और अलर्ट फ़ैल गया। वीडियो चालू था पर सिर्फ एक दीवार दिख रही थी। शायद पापा कैमरा छोड़ कर चले गए थे। चिल्लाने की सी आवाज़े आ रही थी फिर सन्नाटा हुआ और थोड़ी थोड़ी देर में गोलियों की आवाज़ें आती रही।


एक घंटे तक कैमरा यूहीं वीरान पड़ा रहा और फिर एक ज़वान ने आकर उसे उठाया और ज़ोर की गर्ज़ना हुई, "भारत माता की जय।" अगले कुछ पलों में उसके पिता स्क्रीन पर थे। एक सवाल हुआ,"लेफ्टिनेन्ट सुयश ठाकुर, क्या इरादा है।"


पापा मुस्कुराये और बोले,"सालों को नानी याद दिला देंगे...” और फिर कई गोलियां दाग दीं। वीडियो बंद हुआ और जब चला तो पापा बोल रहे थे, "अगर मैं आगे जाऊं तो हमारा अच्छा चांस है।"


"पर उसमे जान का खतरा है ठाकुर।" वीडियो के पीछे से आवाज़ आई।


"इसी दिन का तो इंतज़ार था सर। गिव मी कवर, आई एम गोइंग।" पापा के इतना कहते ही वीडियो खामोश हो गया था कि अचानक पापा फिर स्क्रीन पर उभरे, खून से लथपत, स्ट्रेचर पर लेटे हुए जैसे हज़ारों गोलियों ने छलनी कर दिया हो उनको।


वीडियो शुरू होते ही पापा बोले, "रश्मि, माय लव, मैं हमेशा साथ हूँ तुम्हारे। चिन्ता मत करना, आज के दिन को ध्यान रख कर ही पढ़ी लिखी सी.ए. बीवी लाया था कि मेरे जाने के बाद खुद को और बच्चे को पाल सके। कभी न तो रोना और न कभी हार मानना। सूरज माय चैम्प, अभी तुम केवल 6 साल के हो, आई नो कि अभी तुम नहीं समझोगे पर एक दिन ज़रूर जानोगे देश के लिए मरने का प्राइड। आई एम स्पेशल, गॉड हैज़ सेलेक्टेड अस टू सर्व दिस मैन काइंड। सोचा था 30 साल देश की सेवा करूँगा पर 16 साल में ही रिटायर होना पड़ रहा है मेरे बाकी के 14 साल तुम पूरे करोगे।"


वीडियो बदल कर पिता की अन्त्येष्टी पर पहुंचा, कोई भी रो नहीं रहा था। सबके चेहरे पर गर्व की रेखाएं थी। इसके बाद वीडियो बंद हो गया। कुछ देर तो सूरज बैठा सोचता रहा फिर माँ आ गई। रात के 12 बजे केक काटा गया और माँ ने सूरज को एक खाकी रंग की टोपी गिफ्ट की। यह उसके पिता की टोपी थी। अगले दिन जब सूरज स्कूल से लौटा तो उसके हाथ में एक लिफाफा था।


माँ ने सवाल किया,"सूरज ये क्या है?"


सूरज बोला,"माँ एन डी ए का फॉर्म..."


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