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मन्दिर  (भाग 2)
मन्दिर (भाग 2)
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© Sharatchandar Chatopadhyay

Classics

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इसी अंतर्वेदना के चलते वह एक दिन बीमार पड़ गया। बीमारी की ख़बर मिलते ही उसके माँ-बाबा कलकत्ता आगए, पर अपर्णा को साथ न लाए। ऐसा नहीं कि अमरनाथ को ऐसी आशा थी, फिर भी उसका दिल बैठ गया। बीमारी सतत बढ़ती गई। ऐसे में शायद उसे अपर्णा को देखने की इच्छा होती, किन्तु अपने मुँह से वह यह बात बोल न सका। माँ-बाबा भी समझ न पाए। केवल परहेज़ और डाक्टर-वैद्य। अंत में उसने इन सब के हाथ से मुक्ति पा ली--एकं दिन उसका देहांत हो गयविधवा होकर अपर्णा सन्न रह गई। उसके सारे शरीर में रोमांच हुआ और एक भीषण संभावना उसके मन में पैदा हुई कि शायद यह सब उसी की कामना का फल है। शायद, इतने दिनों से वह मन ही मन यही चाहती थी---अन्तर्यामी ने इतने दिनों के बाद उसकी कामना पूरी की है! बाहर उसे अपने पिता के ज़ोर-ज़ोर से रोने का स्वर सुनाई दिया। क्या यह सपना है? वे कब आए?अपर्णा ने मकान की खिड़की खोली और झांककर देखा, सचमुच ही राजनारायण बाबू बच्चों की तरह ज़मीन पर पड़े रो रहे हैं। पिता की देखा-देखी अब वह भी घर के अंदर ज़मीन पर लोट गई और आंसुओं से ज़मीन भिगोनेसंध्या होने में ज़्यादा देर नहीं थी। अपर्णा के पिता ने उसे छाती से लगाते हुए कहा, "बेटी अपर्णा!" अपर्णा ने भी रोते-रोते जवाब दिया, "पिता जी!""तेरे मदनमोहन ने तुझे बुलाया है बिटिया?" 

"चलो बाबू जी, वहीँ चलें।"

"चलो बिटिया, चलो!" कहते हुए राजनारायण बाबू ने स्नेह से अपनी बेटी का माथा चूमा, और इसके साथ ही छाती से सारा दुःख पौंछ कर मिटा दिया और फिर बेटी का हाथ थामे दूसरे दिन अपने घर गए। उंगली के इशारे से दिखाते हुए बोले, "वह है बिटिया, तेरा मंदिर!

वे हैं तेरे मदनमोहन!"

निर्लिप्त भाव अपर्णा वैधव्य-वेश में कुछ और ही तरह की दिखाई दी। जैसे सफ़ेद कपड़ों और रूखे बालों में वह और भी अच्छी दिखने लगी। उसने पिता की बात पर बहुत विश्वास किया, सोचने लगी, देवता के आह्वान से ही वापस आई है। मानो इसीलिए भगवान के मुँह पर हंसी है, मंदिर में सौगुना सौरभ। उसे लगने लगा मानो वह इस धरा से कहीं ऊंचे पहुँच गई है।जो पति अपने मरने से उसे धरा से इतना ऊँचा रख गया है, उन मृत पति को सौ-सौ बार वंदन करके अपर्णा ने उसके लिए अक्षय स्वर्ग की कामना की। 

शक्तिनाथ एकाग्रचित्त से मूर्तियां बना रहा था। पूजा करने की बजाय उसे मूर्तियां बनाना कहीं अच्छा लगता था। कैसा रूप, कैसी नाक, कैसे कान और कैसी आँखे होनी चाहिए, कौन-सा रंग अधिक खिलेगा -यही, उसकी विवेचना का विषय होता। किस चीज़ से पूजा करनी चाहिए,और किस मन्त्र का जाप इन सब छोटे विषयों पर उसका ध्यान ही न था। विषय में वह अपने आपको आगे बढ़ाकर सेवक के स्थान पर आ गया। फिर भी उसके पिता ने उसे आदेश दिया, "शक्तिनाथ, आज मुझे बहुत ज़ोर का बुख़ार है, ज़मीदार के घर जाकर तुम ही पूजा कर आशक्तिनाथ ने कहा, "अभी मूर्ती बना रहा हूँ।" 

बूढ़े असहाय पिता ने गुस्से से कहा, "लड़कों वाला खेल अभी रहने दो, बेटा! पहले पूजा का काम कर आओ।पूजा के मन्त्र पढने में उसका मन ज़रा भी न लगता था, उसे जाना ही पड़ा। पिता के आदेश से नहा कर,चद्दर और अँगोछा कंधे पर डाल वह देव-मंदिर में आ खड़ा हुआ। इसके पहले भी वह कई बार इस मंदिर में पूजा करने आया है, किन्तु ऐसी अनोखी बात उसने कभी नहीं देखी। फूलों की इतनी सुगंध,इतना धूप-सुगंध का आडम्बर, इतना ज़्यादा भांग और नेवैद्य,! उसे बड़ी चिंता हुई,कि इतना सब लेकर वह क्या करेगा? किस तरह किस किस की पूजा करेगा? सबसे ज़्यादा हैरानी उसे अपर्णा को देखकर हुई! यह कौन,कहाँ से आई? इतने दिनों तक कहाँ थअपर्णा ने पूछा, "तुम भट्टाचार्य के बेटे हो?"

शक्तिनाथ ने कहा, "हाँ!" " तो पैर धोकर पूजा करने बैठो!" 

बैठा तो शक्तिनाथ शुरू में ही भूल गया। एक भी मन्त्र उसे याद न रहा । इसमें उसका मन भी नहीं और विश्वास नहीं-सिर्फ़ यही सोच में रहा कि यह कौन है,क्यों इतना रूप है,किसलिए यहाँ बैठी है आदि-आदि। पूजा की पद्धति में उलटफेर होने लगा- विज्ञ निरीक्षक की तरह पीछे बैठी अपर्णा सब समझ गई कि कभो घंटी बजा कर, कभी फूल चढ़ाकर, कभी नेवैद्य पर जल छिड़ककर यह अनाड़ी पुरोहित पूजा का मात्र ढोंग कर रहा है। इन बातों को सतत देखते-देखते अपर्णा इन्हे अच्छी तरह समझती थी। शक्तिनाथ भला उसे कहीं घोखा दे सकता था। पूजा समाप्त होने पर अपर्णा ने कठोर वाणी में कहा, "तुम ब्राह्मण के बेटे हो, पूजा करना भी नहीं जानते?" शक्तिनाथ ने कहा, "जानता हूँ।" 

"ख़ाक जानते हो।"शक्तिनाथ ने विह्वल होकर उसके मुंह की ओर देखा, फिर वह चलने को तैयार हुआ। अपर्णा ने उसे रोका और कहा, "महाराज, यह सब सामग्री बाँध कर ले जाओ--पर कल फिर न आना। तुम्हारे पिता अच्छे हो जाएँ, तो वे ही आएँ।"

अपने हाथ से सारी सामग्री उसकी चादर-अंगोछे में बंधवा कर उसे विदा कर दिया। मंदिर के बाहर आकर शक्तिनाथ को बार-बार कंपकंपी लगी। इधर अपर्णा ने फिर से नए सिरे से पूजा का आयोजन करके दूसरे ब्राह्मण को बुला कर पूजा करवाई। 

एक महीना बीत गया। आचार्य यदुनाथ ज़मींदार राजनारायण बाबू को समझाकर कहने लगे, "आप तो सब कुछ समझते हैं, बड़े मंदिर की यह वृहद पूजा मधु भट्टाचार्य के बेटे से किसी प्रकार भी नहीं हो सकती।" राजनारायण बाबू ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा, "बहुत दिन हुए, अपर्णा ने भी यही बात कही थी।आचार्य ने अपने चेहरे को गंभीर बनाकर कहा, "सो तो कहा ही होगा। वह ठहरी साक्षात लक्ष्मीस्वरूपा। उनसे कुछ छिपा थोड़े ही रह सकता है।"  ज़मीदार बाबू का ठीक ऐसा ही विश्वास है। आचार्य कहने लगे, "पूजा चाहे मैं करूँ, या कोई और करे, उत्तम आदमी होना चाहिए। मधु भट्टाचार्य जब तक जीवित थे, तब तक उन्होंने पूजा की, अब उनके पुत्र का पुरोहिताई करना सही है, किन्तु वह तो उत्तम व्यक्ति नहीं। वह सिर्फ पेंट रंगना जानता है, खिलौने बना सकता है, पूजा-पाठ करना कुछ नहीं जानता।"

राजनारायण ने स्वीकृति दे दी, "पूजा आप करें।" फिर एकदम बोले, "पर अपर्णा से एक बार पूछ कर देखूं।"

अपने पिता के मुंह से शब्द निकलते ही अपर्णा ने सिर हिलाया और बोली, "ऐसा भी कहीं होता है? ब्राह्मण का बेटा बेसहारा ठहरा, उसे कहाँ भेज दिया जाए? जैसे जानता है, वैसे ही पूजा करेगा। भगवान उसी से सन्तुष्ट होंगे।"

बेटी की बात सुनकर राजनारायण बाबू की सचेतनता जागी वे बोले, "मैंने इतना तो सोच कर देखा ही नहीं। बेटी तुम्हारा मंदिर है, तुम्हारी ही पूजा है, तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो! जिसे चाहो, यह काम उसी को सौंप दो।" 

इतना कह कर राजनारायण बाबू चले गए। अपर्णा ने शक्तिनाथ को बुलाकर उसी को पूजा का भार सौंप दिया। अपर्णा की फटकार खाने के बाद वह फिर इधर नहीं आया था। इस बीच में उसके पिता की मृत्यु हो गई और इस समय वह भी बीमार-सा था। सूखे चेहरे पर दुःख व अवसाद के चिह्न देखकर अपर्णा को दया आ गई, वह बोली, "तुम पूजा करना, जैसे जानते हो वैसे ही करना, उसी से भगवान तृप्त होंगे।"

अपर्णा के स्नेह-सिक्त शब्द सुनकर उसमें हिम्मत आ गई वह मन लगाकर सावधानीपूर्वक पूजा करने लगा। समाप्त होने पर अपर्णा ने जितना वह खा सकता था उतना खुद ही बाँध कर कहा, "अच्छी पूजा की है। महाराज, तुम क्या अपने हाथ से भोजन बनाते हो?" 

"किसी दिन बना लेता हूँ, किसी दिन--जब बुख़ार आ जाता है, उस दिन नहीं बना सकता।""तुम्हारे यहाँ क्या कोई और नहीं है?"

"नहीं।"

शक्तिनाथ के चले जाने पर अपर्णा ने उसके प्रति कहा, "अहा बेचारा!" इसके बाद देवता के सामने हाथ जोड़कर उसके लिए प्रार्थना की, "भगवान इनकी पूजा से तुम संतुष्ट होना, यह अभी लड़का है, इसकी त्रुटियों पर ध्यान न देना।"उस दिन से अपर्णा रोज़ दासी को भेजकर उसकी जानकारी लेती रहती--वह क्या खाता है, क्या करता है या उसे किस चीज़ की ज़रुरत है। उस बेसहारा ब्राह्मणकुमार को परोक्ष रूप से आश्रय देकर उसने उसका भार स्वेच्छा से अपने ऊपर ले लिया। और उसी दिन से इन दोनों किशोर-किशोरी ने अपनी भक्ति, स्नेह व भूल-भ्रान्ति सभी एक करके इस मंदिर का आश्रय लेकर जीवन के शेष कामों को अपने से पूरी तरह छोड़ दिया। जब शक्तिनाथ पूजा करता, अपर्णा मन ही मन उसका सहज अर्थ देवता को समझा देती। शक्तिनाथ सुगन्धित फूल हाथसे उठाता, अपर्णा उंगली से दिखाकर बताती जाती। वह कहती, "महाराज, ऐसे सिंहासन सजाओ तो देखो बहुत सुन्दर लगेगा। इस तरह इस विशाल मंदिर का वृहद काम चलने लगा। यह देख-सुन कर आचार्य ने कहा, "बच्चों का खिलवाड़ हो रहा बूढ़े राजनारायण बाबू ने कहा, किसी भी तरह से हो, बेटी अपनी बात को भूली रहे तो अच्छा है।"रंगमंच पर जैसे पहाड़-पर्वत, एक ही क्षण में गायब होकर वहाँ राजमहल कहीं से आकर खड़ा कर जाता है और लोगों की सुख-सम्पदा में दुःख-दैन्य तक के निशान मिट जाते हैं, वैसे ही शक्तिनाथ के जीवन में भी हुआ। पहले तो उसे पता ही न चला की वह जाग रहा था और कब सोकर सुख-स्वप्न देख रहा है या नींद में दुःस्वप्न देख रहा था और अब सहसा जाग उठा है, फिर भी, उसके पहले वाले विक्षिप्त खिलौने बीच-बीच में उसे उसे यह बात याद दिला कर कहते कि इस दायित्वहीन देव-सेवा की सोने की कड़ी ने उसके पूरे शरीर को जकड़ लिया है और रह-रह कर वह झनझना उठती है। वह अपने स्वर्गीय पिता को याद किया करता और अपनी स्वच्छंदता की बात सोचा करता। उसे लगता मानो वह बिक गया हो, अपर्णा ने उसे ख़रीद लिया हो। इस प्रकार अपर्णा के स्नेह ने क्रमशः मोह की तरह धीरे-धीरे उसे आछन्न कर दिया । 

अचानक एक दिन शक्तिनाथ का ममेरा भाई वहां अाया। उसकी बहन की शादी थी। मामा कलकत्ता रहते हैं। अभी समय अच्छा है, तो सुख के समय भांजे की याद आई है। जाना होगा। शक्तिनाथ को यह बात अच्छी लगी कि कलकत्ता जाना होगा। सारी रात वह भैय्या के पास बैठा-बैठा कलकत्ते की कहानी, शोभा की बातें, समृद्धि का वर्णन सुनता रहा और सुनते-सुनते मुग्ध हो गया । दूसरे दिन मंदिर जाने की उसकी इच्छा नहीं हुई। सवेरा होते देख अपर्णा ने उसे बुलवाया। शक्तिनाथ ने जा कर कहा, "आज मैं कलकत्ता जाऊँगा - मामा ने बुलाया है।"

इतना कह कर वह संकुचित हो कर खड़ा हो गया। अपर्णा कुछ देर चुप रही, फिर बोली, "कब तक वापिस आओगे?" शक्तिनाथ ने डरते हुए कहा, "मामा कह देंगे तभी चला आऊंगा।"

इसके बाद अपर्णा ने कुछ नहीं पूछा। फिर वही यदुनाथ आचार्य आकर पूजा करने लगे और उसी तरह अपर्णा पूजा देखने लगी किन्तु कोई बात कहने की ज़रुरत नहीं हुई और न ही कुछ कहने की इच्छा भी थी। कलकत्ते की चहल-पहल देखकर शक्तिनाथ बड़ा खुश हुआ। कुछ दिन हंसी-ख़ुशी में बीत जाने पर फिर उसका मन घर जाने के लिए बैचैन हो गया। लम्बे और आलसी दिन अब उससे बिताये नहीं बीतते। वह सपने देखने लगा, अपर्णा उसे बुला रही है, और उत्तर न पा कर नाराज़ भी हो रही है। आखिर एक दिन उसने अपने मामा से कहा, "मैं घर जाऊँगा।"

मामा नें मना किया, "वहां जंगल जाकर क्या करोगे? यहीं रह कर पढ़ो-लिखो, मैं तुम्हारी नौकरी लगवा दूंगा।"शक्तिनाथ सिर हिलाकर चुप हो गया। मामा ने कहा,"तो जाओ।"

बड़ी बहू ने शक्तिनाथ को बुलाकर कहा, "बाबू! क्या कल घर चले जाओगे?"शक्तिनाथ ने उत्तर दिया, " हाँ, जाऊंगा।"

"अर्पणा के लिए मन तड़फड़ा रहा है न?शक्तिनाथ ने कहा, "हाँ!"

कुछ देर बाद उसने सिर झुकाते हुए कहा, "ख़ूब सेवा करती है।"बड़ी बहू मन ही मन मुस्काई,अर्पणा की बातें उसने पहले ही सुन रखी थी और शक्तिनाथ ने स्वयं ही बताई थी। वह बोली, "तो बाबू साहब, ये दो चीज़ें लेते जाओ, उसे देना, वह और भी प्यार करेगी।"                 

उसने एक शीशी का ढक्क्न खोलकर थोड़ा-सा 'दिलखुश सैंट' उसपर छिड़क दिया। उसकी सुगन्ध से शक्तिनाथ पुलकित हो उठा और दोनों शीशियों को चादर के किनारे बांधकर दूसरे दिन ही वापस आ गया।शक्तिनाथ आकर मंदिर में पहुंचा। पूजा समाप्त हो चुकी थी। एसेंस की शीशियाँ चादर में बंधी थी, पर इन कई दिनों में अपर्णा की निकटता उससे इतनी कम हो गई थी कि शीशियां देने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। वह इनके लिए मुंह खोल कर न कह पाया कि ये तुम्हारे लिय कलकत्ते से बड़ी इच्छा से लाया हूँ। सुगंध से तुम्हारे देवता तृप्त होते हैं, तुम भी हो जाओगी। सात दिन बीत गए। हर रोज़ वह अपनी चादर में शीशियां बाँध कर ले जाता और वापस ले आता। बाद में बड़े करीने से उठा कर रख देता। अगर अपर्णा पहले की तरह उसे बुला कर कुछ पूछती तो शायद वह अपना उपहार उसे दे देता किन्तु ऐसा कोई अवसर न आयआज दो दिन से उसे बुख़ार है, फिर भी डरते-डरते पूजा करने आ जाता है। किसी अनजानी आशंका से वह अपनी पीड़ा की बात भी न कह सका। किन्तु अपर्णा ने पता करवा लिया कि दो दिन से शक्तिनाथ ने कुछ नहीं खाया फिर भी वह आता है। अपर्णा ने पूछा, "महाराज, तुमने दो दिन से कुछ खाया नहीं।शक्तिनाथ ने शुष्क मुँह से जवाब दिया, "रात को रोज़ बुख़ार चढ़ जाता है"बुख़ार आता है? फिर नहा-धोकर पूजा करने क्यों आते हो?"शक्तिनाथ की आँखे नम हो गई। क्षण भर में वह सब बातें भूल गया। चददर के छोर से गांठ खोल दोनों शीशियाँ निकाल कर बोला, "तुम्हारे लिए लाया हूँ।"

"मेरे लिए?"

"हाँ तुम्हें सुगंध पसन्द है न?"

जैसे गर्म दूध आग की ज़रा-सी गर्मी पाकर खौलने लगता है, ठीक वैसे ही अपर्णा के शरीर का लहु खौल उठा। शीशियां देख कर वह पहचान गई थी। उसने कठोर आवाज़ में कहा, "दो!और उन्हें हाथ में ले कर मंदिर के बाहर, जहाँ पूजा पर चढ़े बासी फूल पड़े रहते थे वहाँ जाकर फैंक दी। डर के मारे शक्तिनाथ का ख़ून जम गया। कड़क आवाज़ में अपर्णा ने कहा, "महाराज, तुम्हारे अन्दर इतना कुछ भरा है। अब मेरे सामने न आना, मंदिर की परछाई भी न लांघना।" इसके बाद अपर्णा ने अपनी तर्जनी के इशारे से बाहर का रास्ता दिखाते हुए कहा, "जशक्तिनाथ को गए आज तीन दिन हो गए। यदुनाथ सरकार फिर से पूजा करने लगे। अर्पणा फिर मलिन चेहरे से पूजा देखने लगी, जैसे यह पूजा किसी और की हो और कोई दूसरा उसे संपन्न कर रहा हो। पूजा समाप्त करके अंगोछे में नेवैद्य बांधते हुए आचार्य जी ने गहरी सांस भरते हुए कहा, "लड़का बिना इलाज के मर गया।"आचार्य के चेहरे की और देखकर अपर्णा ने पूछा, "कौन मर गया?"

"तुमने नहीं सुना क्या? कई दिनों से बुख़ार में पड़ा, वही मधुभट्टाचार्य का बेटा आज सवेरे मर गया।अपर्णा फिर भी उसका मुँह ताकती रही। आचार्य ने दरवाज़े से बाहर आकर कहा, "आजकल पाप के परिणामस्वरूप मृत्यु हो रही है। देवता के साथ क्या दिल्लगी चल सकती है बेटी!"आचार्य चले गए। अपर्णा दरवाज़े बन्द कर ज़मीन पर माथा पटक-पटक कर रोने लगी। हज़ार बार रोकर पूछने लगी, "भगवान! किसके पाप से?"

 बड़ी देर बाद अपर्णा उठ कर आँखे पौंछ बाहर गई, उन बासी फूलों में से स्नेह के दान को उठा माथे से लगा लिया। इसके बाद मंदिर में आकर उसे भगवान के पास रख कर बोली, "भगवान! जिसे मैं न ले सकी उसे तुम ले लो! मैंने कभी अपने हाथ से पूजा नहीं की, आज कर रही हूँ। तुम मेरी पूजा स्वीकार करो और तृप्त हो जाओ। मेरे मन में अब और कोई भी कामना नहीं है।"  

शरतचंद्र चटोपाध्याय उत्कृष्ट रचना मन्दिर

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