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बाबा मुझे मत मारो
बाबा मुझे मत मारो
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© Ramkishore Upadhyay

Classics

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“मुझे भूख लगी है, क्या मुझे भोजन मिलेगा? कोई है क्या मेरी सुनने वाला,”वृद्ध कराह उठा | दूर घने जंगल में उसकी आवाज सुनने वाला शायद कोई नहीं था | तभी एक आवाज आई|

‘उठो, बाबा खाना खा लो”

‘कौन हो बेटी?’ वृद्ध  ने प्रश्न किया|

‘आंखे खोलो, बाबा” उत्तर मिला |

वृद्ध भूख और प्यास से पीड़ित था | कई दिनों से भोजन न मिलने के कारण वह निढाल हो गया था| बड़ी मुश्किल से उसने अपनी आँखे खोली तो चौंधिया गयी |

 

‘बेटी,यह तो सोने का ढेर है | खाना कहाँ है ?’वृद्ध ने पूछा |

 

‘बाबा,यही तो आपका भोजन है,खाओ | इसे खाकर शायद आपका पेट भर जाए |’ महिला ने उत्तर दिया |

वृद्ध ने जब गौर से देखा तो लगा मानो प्रकाश का एक विशाल पुंज उस स्त्री के शरीर से निकल रहा हो और जैसे लाखों सूर्य नभ पर एक साथ चमक रहे हो या फिर  अमावस की काली घनी रात में अचानक दिन का उजाला हो गया हो | वह यह प्रकाश देखकर हक्का बक्का रह गया और उसकी आँखे इसको सहन नहीं कर सकी | वह अचंभित हो यह जानने के लिए उत्सुक हो उठा कि आख़िर ये महिला कौन हैI

‘राधा बिटिया तुम?’ वह चौंककर बोला|

“हाँ,पिताजी आपकी राधा ही हूँ”

‘परन्तु मैंने तो तुम्हे मार दिया था”

 

‘हां,मैं मर चुकी हूँ | आपने ठीक कहा पिताजी, आज से ठीक पच्चीस साल पहले आपने मुझे मार दिया था | मैं राधा की आत्मा हूँ | आत्मा तो अजर अमर है ,वह नष्ट कहाँ होती हैंI मरता तो सिर्फ शरीर ही हैं| आप तो जानते है कि मृत्यु के समय मैं रजस्वला नहीं थी और मुझे ईश्वर ने देवी बना दिया | अब मैं इसी स्थान पर रहती हूँ भूखे प्यासे की इस बियाबान में मदद करने के लिए |’’

 

कराहने वाले उस व्यक्ति का नाम रतनलाल था जो इस समय अपनी मृत बेटी को देखकर मूर्छित हो गया,परन्तु कुछ क्षण के बाद उसे होश आया तो अतीत की सभी घटनाएँ उसके सामने चलचित्र के दृश्य के जैसे एक-एक करके आँखों में तैरने लगी | उसे याद आ रहे थे वे दिन जब वह बड़ा ही निर्धन हुआ करता था | बस दसवी तक की पढाई उसने की थी | कई जगह उसने नौकरी की परन्तु उसका मन नहीं लगा | थक हारकर उसने एक जौहरी की दुकान पर सेल्समैन की नौकरी करनी शुरू कर दी थी | सोने और चांदी को बेचते –बेचते उसके मन में सोने –चांदी और धन की चाह भड़क उठी | हर समय उसे यही ख्याल रहने लगा कि कैसे उसे धन प्राप्त हो , सोना मिले या फिर रत्न के भंडार| यद्यपि उसके पास खाने पीने की ईश्वर की ओर से कोई कमी नहीं थी | वहां से कुछ महीने के बाद ही उसने उस नौकरी को भी लात मार दी और घर से गायब हो गया और फिर तीन चार महीने के बाद अपने घर आया | सभी उसे देखकर खुश हो गए और उसकी घरवाली को तब चैन मिला |

 

अभी कुछ ही दिन ही हुए थे कि उसकी बेटी गायब हो गई| काफी ढूंढा परन्तु वह नही मिली | पुलिस ने भी अंतिम रिपोर्ट लगा दी |परन्तु रतनलाल की पत्नी कमला का रो-रोकर बुरा  हाल था | वह संभाले संभल नही रही थी | परन्तु जब उसका कोई अता पता नही चला तो वह भी आखिर शांत हो गई परन्तु वह अक्सर गुमसुम सी रहती | परन्तु रतनलाल के चेहरे पर विषाद का कोई चिन्ह नही था | वह और अधिक प्रफुल्लित नज़र आता था | मजे की बात यह हुई कि पुलिस को भी उसके व्यवहार पर कोई शक नही हुआ | यूँ कहो कि उसने मामले को दबवा दिया |

 

एक दिन उसने अपनी पत्नी को बताया की उसे एक स्वप्न दिखाईं दिया और कोई शक्ति बार–बार उसे कह रही है कि मै लक्ष्मी हूँ तेरे घर के आँगन में दबी हूँ मुझे निकाल ले | उसकी पत्नी पहले ही अर्धविक्षिप्त सी हो गयी थी, कुछ नहीं बोली | वह उसके स्वप्न के अनुसार उस जगह को खोजने लगा | आँगन में थोड़ी देर बाद ही उसकी खुदाल एक जगह किसी वस्तु से जाकर टकराई | उसका दिल उछलने लगा | मिटटी हटाई तो एक मटकी निकली  जो सोने,चांदी की मोहरों  और हीरों से भरी थी | वह ख़ुशी से झूमने लगा | उन मुग़ल काल की सोने और चांदी तथा जवाहरात की कीमत उस समय तीन करोड़ रुपये के लगभग थी | उसने पुलिस को सूचित नहीं किया और अगले दिन भोर में अपने पुराने मालिक के पास शहर पहुँच गया |पहुँचते –पहुँचते रात हो गई जो इस कार्य के लिए जरूरी थी | व्यापारी ने तीन करोड़ की सोने चांदी की मोहरों की  कीमत मात्र  करोड़ रुपये लगाई | रतनलाल को वह राशी  भी बहुत अधिक लग रही थी | किसी को कोई शक न हो इसलिए उसने बाजार से एक पुराना संदूक खरीदा और  रात को ही हज़ार-२ के लाल नोटों की  गड्डियां उसमें  लेकर शाम तक घर आ गया |

 

शहर से आने के बाद उसने अपना कारोबार शुरू किया | अपने जाति के गरीब लोगों को वह कम ब्याज दरों पर रूपया उधार देता था, दूसरों से ब्याज की  दर ऊँची रखता था | लोग उसके अचानक अमीर बनने का रहस्य समझ नहीं पाये | ज्यादातर लोग यही समझते थे  कि रतनलाल शहर मे सोने चांदी की व्यापारी के यहाँ नौकरी करता था और  किसी  लूट  के माल को रहस्य खुलने के डर से व्यापारी ने इसे कुछ हिस्सा दे दिया होगा | जिससे वह अब अपना कारोबार कर रहा है | उसने भी अपनी अमीरी का रहस्य किसी को बताया नही था | उसने उस पैसे से अपने गाँव छपार में, जो हरिद्वार जिले में पड़ता है ,काफ़ी जमीन खरीद ली थी | उसने एक शानदार महलनुमा घर बनवाया थाI गाय, बैल  घोडा गाड़ी सब कुछ था उसके पास, फिर भी उसे धन की एक अनन्त ओर असंतुष्ट प्यास थी और हर समय पैसे की उधेड़बुन में लगा रहता था |लोग उसे बुरी दृष्टि से देखने लगे थे परन्तु पुलिस से रसूख और पैसे के कारण उसे कुछ नहीं कहते थे |

 

समय का रथ अपनी गति से गुजरता रहा और रतनलाल के दोनों पुत्र जवान हो गये | पत्नी अर्ध्विक्षिप्ता थी और अचानक एक दिन स्वर्गवासी हो गई | पुत्रों की पत्नियां जिन घरों  से आयी थी उनके संस्कार अच्छे नही  थेI  रतनलाल को समय पर न तो नाश्ता और न ही भोजन मिलता था | वह दुनिया भर की दौलत का स्वामी होकर भी कई बार भूखा ही सो जाता था | एक दिन हद हो गई जब उसकी पतोहू ने कहा कि  पिताजी, अब आप बूढ़े हो गये है और घर / व्यापार आपके पुत्र संभाल ही  रहे है| आपकी आयु 70 वर्ष की हो गई | अब आपको  वानप्रस्थ  में चले जाना चाहिए | आपका सामान हमने तैयार कर दिया है| यह कार आपको सीधे हरिद्वार के आश्रम में ले जाएगी जहाँ आपका कमरा पहले से हमने खरीद लिया है | आप वहां जाकर रहे और पूजापाठ और अपना अगला जीवन सुधारे |

 

रतनलाल हैरान ओर परेशान हो गया | वह  करता भी क्या |भूखा प्यासा  रतनलाल आखिरी बार अपने महलनुमा घर को निहारने लगा तो  उसकी आँखों से आंसू की झड़ी लग गई | गाँव से बाहर  निकलते ही उसे उसके कर्म याद आने लगे | करीब 100 किमी. चले ही थे कि ड्राइवर ने कहा कि मालिक गाड़ी ख़राब हो गई आपको धक्का देना पड़ेगा |वह गाड़ी से उतरकर धक्का देने लगा I गाड़ी खराब थी नहीI ड्राइवर उस रात के निपट सुनसान में उसे पीछे छोड़कर गाड़ी घुमाकर भाग गया | वह ड्राइवर को आवाज़ लगाता रह गयाI उसकी आवाज़ अब चीखो में बदल गयी | परन्तु अब वहा कौन सुनने वाला था |यह सब उसके बेटे और बहुओं की योजना थी उसे घर से निकालने की | वह थककर वही बैठ गया था |

 

‘क्या हुआ ?’ राधा ने पूछा 

 

“ यह कौन सी जगह है?” रतनलाल ने पूछा |

“ यह वही स्थान है बाबा, जहाँ आपने मुझे पच्चीस वर्ष पूर्व एक तलवार से मार सिर धड़ से अलग कर दिया था “, यह वही जगह है जहाँ से मेरा सिर काटकर आप सुनसान जंगल मे तांत्रिक के स्थान पर ले गए थे, जहाँ उसे आपने पूजा करने के लिए बुलाया था | उसी तांत्रिक ने तुम्हे कहा था कि रतनलाल तुम्हे अमीर बनना है तो एक पूजा करूँगा उसमे तुम्हारी बेटी का शीश चढ़ाना पड़ेगा , तभी देव प्रसन्न होंगे और इच्छा पूरी होगीI और तुमने जब माँ कमला सोयी थी , चुपके से मुझे उठाया , मुह पर क्लोरोफोर्म रखकर बेहोश किया ओर बिना सोचे समझे मुझे इसी स्थान पर ले आये | तब तक मुझे होश आ गया था | मैंने आपसे विनती की थी “बाबा मुझे मत मारो | परन्तु तुमने कहाँ था मुझे दौलत चाहिए और तुम तो मेरा सबसे बड़ा कर्ज हो | बड़ी होकर तुम्हारे ब्याह के लिए पैसा कहाँ से लाऊंगा | तुझे मरना ही होगा और तेरे मरे बिना कल्याण नहीं होगा |

 

“ बाबा मुझे मत मारना,मै आपके सारे अरमान पूरे करुँगी | आपके पांव पड़ती हूँ |…बाबा आपने फिर भी नहीं सुना मै बहुत गिडगिडाई थी | आपके सिर पर भूत जैसे सवार हो गया था |आपको याद न हो तो अपने एक –एक शब्द फिर सुना देती हूँ,सुनो |’’

“ बाबा, मुझ जैसे लड़की ही झाँसी की रानी बनी ,झलकारी बाई भी लड़की ही थी |अगर इनके माँ बाप ने भी इन्हें भी बोझ समझा होता तो क्या ये अंग्रेजो की खिलाफ आज़ादी की लड़ाई लड़ पाती | माना मैं राजवंश में नही  पैदा हुयी तो ऐसा सपना नहीं देख सकती हूँ तो  क्या कल्पना चावला ,मार्गरेट थेचर और गोल्डा मायर भी नहीं बन सकती हूँ | चलो इन्हें भी  छोडो ,पढ़ –लिखकर क्या बड़ी अधिकारी या कर्मचारी भी न बन पाऊँगी |सेना ,पुलिस,प्राइवेट कम्पनियों में अब लडकियां खूब काम करती है और अपने परिवार का नाम रोशन कर रही हैI मैं बड़ी होकर आपके लिए परिवार के लिए पैसा कमाउंगी और आप पर बोझ नही बनूँगी | घर की तरक्की होगी |”

 

“तुमने बार-बार कहा कि मुझे तुम्हारी वकीलों वाली दलीले पसंद नहीं है और जब नही माने आखिर में मैंने यह भी कहा था यह तो तुम्हे याद होगा ही |”

 

‘कुदरत ने मुझे स्त्री बनाया है | कुछ नही बन सकती तो एक माँ तो बन सकती हूँ | कुदरत ने मुझे इस संसार को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौपी है | मैं कुदरत की सबसे अद्वितीय कृति हूँ | मैं वो जमीन हूँ जिससे मानवता का उद्गम होता है | मानव ,महामानव और शैतान सब माँ की कोख से जन्म लते है और आप उस स्त्री का क़त्ल करने पर तुले हो जो प्रकृति का श्रृंगार करती है, इसे रहने योग्य बनाती है | स्वर्ग इसे ही तो कहते है | आप मत भूलो कि अगर दादी न होती तो आप कहाँ से आते और माँ को ब्याह कर न लाते तो मेरे प्यारे दो भाई और मैं खुद कहाँ से पैदा होती | माँ कमला और सुनहरी दादी औरत ही थी ,क्या आप यह भी भूल रहे है और आपको मुझपर जरा भी दया नहीं आ रही है | बाबा मुझे जीने का मौका दो |मुझे मेरे अरमान पूरा करने दो | मुझे स्त्री के रूप में पूर्णता प्राप्त करने दो | बाबा ,मुझे मत मारो’’ |

 

‘’ पहले तो लड़कियों का गला घोंटकर मार दिया जाता था | कई गाँवों में तो बारात अभी तक नहीं आती है | तूने पैदा होकर अबतक इस दुनिया को बहुत देख लिया |और मुझे अपने तर्कों में मत उलझा| मुझे मेरा काम करने दे” यही आपके आखिरी शब्द थे,याद है न’ |

 

और रतनलाल को उस समय के विचार भी याद आ गए जब वाह सोच रहा था कि कब यह लड़की पढ़लिखकर कमाएगी और उसकी गरीबी दूर होगी | फिर नौकरी मिलना कौन सा आसान काम है,बड़े बड़े पढ़ लिखे लोग बेरोजगार घूम रहे है | फिर किसने देखा कल ,जो है तो आज और अभी ,शेष कुछ नही |कितना कुछ घ्रणित उसकी सोच पर हावी हो गया था परन्तु वह तांत्रिक के प्रभाव में था |

 

“नहीं तुझे मरना ही होगा”कहकर उसने उसे तांत्रिक हवाले किया | वह क्लोरोफोर्म के असर से बेसुध हो गयी थी | लहू की धार बह निकली | तांत्रिक ने पूजा की और वह सुबह होने से पहले घर लौट आया | गाँव में शोर मचा दिया कि राधा रात में गायब हो गयी अचानक | तांत्रिक की पूजा अपना प्रभाव दिखा चुकी थी और उसको घर में  गड़ा धन मिल गया था| और उसे चाहिए भी क्या था !

 

इसी के साथ रतनलाल की आँखों के सामने का दृश्य हट गया | तभी बिजली कड़की और उसने अपने विस्मित नैनों से देखा तो न वहां सोना था और न ही राधा और न ही कोई देवी जैसी चीज ही | उसे लगा कि यह उसका अतीत था जो उसी स्थान पर आकर उसकी स्मृति से निकलकर उसके सामने खड़ा था उससे दो-दो हाथ करने के लिए | यह प्रकृति का उसको उत्तर भी  था कि जीव के कर्म उसका अंतिम समय तक साथ नही छोड़ते और याद आ-आकर उसे चिढाते है और रुलाते भी है | यह सोचते-सोचते उसका शरीर एक तरफ लुढ़क गया | किसी ने देहरादून की पुलिस को सूचित किया कि पहाड़ी के नीचे एक लगभग सत्तरवर्षीय वृद्ध की लाश पड़ी है जो कई दिन से सड़ रही है | पुलिस ने पंचनामा किया और पोस्टमार्टम कराकर सरकारी शव गृह में रखवा दिया |उसके गुम होने की कोई रिपोर्ट किसी थाने में नहीं लिखी गयी थी | फिर लिखी जाती भी क्यों ? कौन चाहता था उसे ? न बेटा , न बहु और पत्नी तो पहले ही स्वर्ग सिधार गयी थी और बेटी को अपने हाथों से क़त्ल वह कर ही चुका था पच्चीस साल पहले | धन जिसके लिए उसने कितने कुकर्म किये वह भी उसके साथ नहीं, उसे भी बेटे और बहुओं ने छीन लिया |जब उसकी जेब में कोई पता भी नहीं निकला तो पुलिस  ने अख़बार और रेडियों में विज्ञापन दिया परन्तु जब कोई उसकी लाश को लेने नहीं आया तो निश्चित क़ानूनी समय के बाद लाश को लावारिस समझकर दाहसंस्कार कर दिया | गाँव में उसकी हवेली के आसपास उसकी आत्मा अभी भी रात में घूमती है,किसी ने कहा,परन्तु देखा किसी ने नही |

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”बाबा मुझे मत मारो” * -रामकिशोर उपाध्याय

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