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Prafulla Kumar Tripathi

Drama

4  

Prafulla Kumar Tripathi

Drama

इश्क़ फिफ्टी फिफ्टी !

इश्क़ फिफ्टी फिफ्टी !

6 mins
346

समीरा उम्र के अठारहवीं बरस की कमसिन पायदान पर थी और अनहद अपनी जवानी के उठान पर। अनहद ने अब तक की अपनी स्कूली शिक्षा में और चाहे कुछ हासिल किये हों या नहीं उसने ढेर सारी लड़कियों की नजदीकियां ज़रूर हासिल कर ली थीं। कमबख्त था ही इतना सुन्दर और सम्मोहक ! उस स्कूल में उसका पहला ईयर था और समीरा ने वहीँ से हाई स्कूल किया था और अब इंटर बायो की स्टूडेंट थी।छोटे से शहर में उस स्कूल के खुलेपन से सभी परिचित थे और युवा लड़के लडकियों के झुण्ड जब कुसुम्ही जंगल के उस वीरान रिसार्ट में पहुँचते थे तो मानो कामदेव भी झूम - झूम उठते थे।

'कामदेव ? ' लगभग चौंकते हुए ओमप्रकाश बोले।

'हाँ ! कामदेव। ' रामानन्द ने बताया।

' वो कैसे ? ' अब ओमप्रकाश इस बारे में कुछ और खुलासा चाह रहे थे।

'वो भाई साहब ऐसे कि जब सोशल मीडिया के नाम पर तमाम संचार और सूचना के साधनों ने अपना मायाजाल फैला रखा है तो आज की नौजवान पीढी वह सब कुछ बैठे बिठाये जान ले रही है जो हमारी तुम्हारी पीढी के लोग अक्सर शादी होने के बाद भी नहीं जान पाते थे।' रामानन्द ने कार की स्पीड बढ़ा दी थी और अब वे अपनी हर शाम की तरह टहलने के लिए उस सरकारी पार्क के गेट पर उतर रहे थे।

लगभग सौ एकड़ में फैला अंग्रेज़ी अफसर हवे के अशुद्ध नाम हुई पार्क के रूप में जाना जा रहा पार्क अपनी हरियाली पर मानो इतरा रहा था। टहलने के लिए करीने से ट्रैक बने हुए थे और बीच - बीच में एक्सरसाइज करने के लिए तमाम ओपन जिम के आधुनिक यंत्र लगे हुए थे। हरी- हरी घास के इर्द- गिर्द लगी बेंचों पर उम्र की संध्या काल के लोग गप्पें हांक रहे थे। उधर अधेड़ और युवा लोग कोई पावरमैक्स फिटनेस पर था तो कोई पुशप्स मशीन पर। लेग प्रेस मशीन, रोईंग मशीन , डबल क्रास वाकर और सिटप्स मशीन पर तो मोटे तगड़े लोग लाइन ही लगा बैठे थे और अपनी - अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। ओमप्रकाश और रामानन्द को इन सबमें दिलचस्पी नहीं हुआ करती थी और वे अपना दो से तीन किलोमीटर की वाक लगा कर तयशुदा बेंच पर जाकर बैठ जाया करते थे।शाम का धुंधलका जब पार्क को पूरी तरह अपनी बाहों में क़ैद कर लिया करता और रात उतरने को होती तो वे दोनों अपने - अपने घर के लिए रवाना हो जाते थे।

उनकी रूटीन वाक अब लगभग समाप्त हो रही थी और वे अपनी तयशुदा बेंच पर बैठने को ही थे कि उनका ध्यान उस युगल की ओर चला गया जो बागीचे की झुरमुटों में अक्सर बैठ कर अपनी शामें रंगीन किया करते थे। आज उनकी किसी बात को लेकर जोर - जोर से तू- तू , मैं - मैं हो रही थी। आस-पास मजमा लग चुका था।ओमप्रकाश ने देर नहीं किया और लगभग घसीटते हुए रामानन्द को उस ओर लेकर चले गए।

'' तूं अपने आप को समझती क्या है ? ' लड़का चीख रहा था।

''कुत्ते कमीने अब तूं मेरी हैसियत जानना चाह रहा है ? जब पूरे- पूरे दिन मेरे साथ मजे ले रहा था तब तो सब ठीक था। आज जब मैंने सवाल पूछ लिया कि अब तूं कौन सी लड़की पटा रहा है तो तेरे को मिर्ची लग गई ? '' लगभग रोते रोते वह लड़की बोले जा रही थी।

''अरे ! यह तो समीरा है !'' लगभग चौक से गए ओमप्रकाश। आगे बढे और लड़के को लगभग धक्के मारते हुए बोल उठे :

''किस खानदान का है रे तूं ? तेरे को लड़की से बात करने की तमीज़ नहीं है ? '' उनकी साँसें इतना बोलते बोलते फूलने लगी थीं।

इस अप्रत्याशित पहल से लड़का लगभग चौंक गया था। उसने वहां से भाग लेने में ही अपनी बलाई समझी। वह फुर्र हो गया।

रास्ते में जब रामानन्द ने ओमप्रकाश से उस लड़की के बारे मने पूछा तो ओमप्रकाश ने उसे बताया कि वह उनके ही मोहल्ले की रहने वाले परिवार की है और उसके माता पिता उस पर बेहद भरोसा भी करते हैं।

उस घटना से समीरा पर क्या बीती इसका तो नहीं पता लगा सका लेकिन ओमप्रकाश पूरी रात बेचैन रहे।रात में वे करवटें बदलते रहे।पत्नी से नहीं रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया :

'' क्या बात है शर्मा जी , आज आप बहुत बेचैन लग रहे हैं।''पारो बोल उठीं।

''कुछ समझ में नहीं आ रहा है पारो , आज शाम मिसेज अग्रवाल की लड़की को मैंने एक लड़के के साथ पार्क में लड़ते झगड़ते देखा था और तभी से मन बेचैन है।क्या हो गया है इस जेनरेशन को ?''

''अब छोडिये भी उस मामले को। आजकल के लडके इसी तरह इश्क करते हैं , लड़ते - झगड़ते हैं और फिर एक दूसरे से हिल - मिल जाते हैं !''

''लेकिन लेकिन यह कितना बड़ा विश्वासघात है पारो ! '' उन्हें कुछ अपेक्षा अनुसार उत्तर मिले कि पारो की नांक ने स्पीड पकड़ ली थी।

अगला दिन इतवार का था। सुबह होते ही कुल - संस्कार के धागों में बुरी तरह बंधे ओमप्रकाश से रहा नहीं गया और वे मुहल्ले के अग्रवाल दम्पति के यहाँ पहुँच ही गए। कालबेल बजाई तो वही लड़की बाहर आ गई।

''अंकल आप ? '' लगभग चौंकती सी समीरा बोल उठी।

''हाँ बेटा , क्या मम्मी - पापा हैं ? '' ओमप्रकाश पूछ बैठे।

''हाँ , हैं तो लेकिन अभी तो वे सोये हुए हैं। एक्चुअली कल वे देर रात में एक पार्टी से लौटे हैं और बोले थे कि उन्हें सुबह देर तक सोना है।इसलिए''

वह कुछ आगे बोलती कि ओमप्रकाश अपने क़दम पीछे करने लगे।

''अंकल , एक मिनट।क्या आप कल शाम वाली बात तो बताने के लिए नहीं आये हैं ?''समीरा के इस प्रश्न ने उनको सहज कर दिया।

वे लडखडाते हुए बोलने को तत्पर हुए कि समीरा ने दूसरा प्रश्न दाग दिया ;

''एक्चुअली अंकल यू डोंट वरी एबाउट आल दीज़ लिटिल थिंग्स इट आल हैपेन्स इन लव ! '' समीरा ने लगभग चेतावनी के लहजे में बोला था।

''लेकिन बेटी ''ओमप्रकाश खंखारते हुए बोलने को हुए थे कि एक बार फिर समीरा बोल उठी :

''नो लेकिन - वेकिन अंकल ! इट्ज माय लाइफ ऐट ऑल ! ''

ओमप्रकाश हतप्रभ होकर उसे देखते रहे और निरुत्तरित लौट लेने में ही अपना भला समझे।

उस दिन के सूरज ने अपनी नियमित चाल भरते हुए अब पश्चिम की राह पकड़ ली थी और अब समय हो गया था एक बार फिर रामानन्द के साथ उस पार्क में टहलने जाने का।बुझे मन से ओमप्रकाश रामानन्द के साथ ईवनिंग वाक् पर निकल लिए और अपनी सुबह की पूरी दास्ताँ रामानन्द से शेयर कर डाले।रामानन्द भी उसी पीढी के थे जिसमें विवाह पूर्व लड़कियों का लड़कों से मेलजोल गुनाह हुआ करता था। शारीरिक सम्बन्ध बनाना तो दूर की बात हुआ करती थी। लेकिन आजआज के दौर में खुलेपन से वे भी आहत थे।कुछ बोल नहीं पाए और अनुत्तरित रहे।

उनका टहलना अब पूरा हो गया था और वे अपने निर्धारित स्थान पर बैठे ही थे कि बागीचे के उसी झुरमुट से खिलखिलाती हुई समीरा की आवाज़ ने एक बार फिर उनका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। वे ठगे के ठगे रह गए जब उन्होंने चश्में की कमानी को कान पर चढाते हुए देखा कि समीरा के साथ कोई और नहीं बल्कि वही लौंडा था जिससे कल उसका भयंकर झगड़ा हो रहा था।


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