बहू का त्याग
बहू का त्याग
संपन्न परिवार में जन्मे दीनानाथ, सीधी जिले के ग्राम बिठौली के निवासी थे। माता-पिता की इकलौती संतान,होने के कारण उन्हें हर सुविधा, लाड़-प्यार आदि की कोई कमी नहीं थी। किंतु जैसा नाम वैसा काम।
गरीबों की सेवा करना,वह मानव-धर्म समझते थे। गर्व तो उन्हें छू भी नहीं सका था।वह सदैव दीनों के हित की बात सोचा करते थे।
समय पर उनका विवाह ग्राम बरहट के धनी परिवार की बेटी लक्ष्मी के साथ बड़ी धूम-धाम के साथ संपन्न हुआ।लक्ष्मी का जन्म छ:बेटों के बाद होने के कारण
उसे भाइयों से अधिक लाड़ प्यार मिला। उसकी हर जायज-नाजायज मांगें पूरी होने के कारण,जब कभी उसकी इच्छा, पूरी नहीं होती थी तो वह जिद करके अपनी मांग पूरी करा लेती थी।इस वजह से उसका स्वभाव जिद्दी हो गया था। विवाह होने के बाद ससुराल में सास-बहू से कभी नहीं पटती थी।
दीनानाथ के सम-झाने का कोई असर नहीं हुआ,बल्कि उनके समझाने का लक्ष्मी पर उसका विपरीत ही असर पड़ता था।अंत में सास ने ही हार मानकर चुप रहना उचित समझा। लक्ष्मी के पास- पड़ोस मे रहने वाले हर परिवार से दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी बात पर झगड़ा - लड़ाई हो ही जाया करती थी जिस दिन लक्ष्मी का झगड़ा किसी से नहीं होता था उस रात लक्ष्मी को नींद नहीं आती थी। साल-डेढ़ साल के बाद लक्ष्मी एक बेटे की मां बन गई।अब त़ो वह और भी उद्दंड हो गई। समय बीता, लक्ष्मी एक बेटी की मां भी हो गई। इसके थोड़े दिनों बाद दीनानाथ के माता-पिता भगवान को प्यारे हो गए।अब लक्ष्मी का बेटा सुशील तथा बेटी सुमित्रा भी विवाह योग्य हो गए।दोनों का विवाह एक
साथ ही हुआ। विवाह पश्चात् बेटी सुमित्रा अपने ससुराल चली गई और बहू आगई।
लक्ष्मी की बहू भारती, सांचे में ढली रति की प्रतिमूर्ति के साथ-साथ संस्कारवान, सभ्य,सदैव प्रसन्न चित और सहनशीलता की देवी थी।ऐसी बहू पाकर भी लक्ष्मी कभी उसे बहू का दर्जा नहीं दिया।बहू के हर काम मे खोट निकालना,उससे झगड़ना उसका आम स्वभाव बन गया था।इस झगड़े मे कभी-कभी लक्ष्मी भारती को डंडे से भी पीटा करती थी,किंतु भारती न तो इसका बुरा मानती थी,न कभी सास का निरादर ही करती थी। भारती उनकी सेवा, हर आवश्यकता का ख्याल रखती थी। सास को यदि कभी कुछ कष्टहोता था तो वह बेटी की तरह उसका ध्यान रखती थी।
लक्ष्मी की पड़ोसिनें चाहती थीं कि लक्ष्मी को, उसकी बहू भारती झगड़ा होने पर अच्छी तरह धुलाई कर दे तभी यह सुधरेगी अन्यथा इसकी कोई दवाई नहीं है।कभी अकेले में भारती से भेट होने पर उससे कहतीं, अरे बेटी भारती! यह तेरी सास न,वास्तव में चुड़ैल है चुड़ैल। देखो यह तो पड़ोसियों से तो कभी मिल जुल कर नहीं रही,किंतु तुम्हें भी कभी बहू नहीं माना। हमेशा लड़ना, मार-पीट करना, तुम कैसे सहन करती हो? अरे! किसी दिन दश डंडे लगा दो,देखना कैसै भीगी बिल्ली बन जाती है। फिर तुम जैसा चहोगी वैसा करेगी। भारती का जवाब होता, नहीं अम्मा जी ! मैं ऐसा क्यों करूंगी ? वह तो मेरी मां है। वह जो भी कहती हैं मेरे भले के लिए कहती हैं। उनकी हर बात मेरे लिए किसी देवता के आशीर्वाद से कम नहीं है।
अचानक एक दिन लक्ष्मी का, पड़ोस में मे झगड़ा इतना बढ़ गया कि कई पड़ोसिनों, लक्ष्मी चोटी पकड़कर डंडे,लात,घूंसे से पीटने लगीं। मार पड़ने पर, लक्ष्मी बचाओ , बचाओ ये मुझे मार डालेंगी।किंतु कोई बचाने नहीं आया। क्योंकि लक्ष्मी ने किसी से कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया था। भारती किसी काम से घर के बाहर आई तो उसे चीख-पुकार सुनाई पड़ी और अपनी सासू मां की आवाज पहचान कर उधर दौड़ पड़ी।भारती ने देखा कि आठ-दश औरतें लक्ष्मी की पिटाई कर रही हैैं और भद्दी-भद्दी गालियाँ भी दे रही हैं। भारती,उनसे सासू मां को न मारने की बिनती करने लगी। किंतु उन पर तो मानो मारने के लिए भूत सवार हो गया था। वे रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
मामला न सम्हलते देख भारती सासू मां के ऊपर लोट गई। तब पड़ोसिनें उसे छोड़कर अपने-अपने घर चली गईं।
भारती अवसर का फायदा उठाते हुए लक्ष्मी को सम्हालते हुए घर ले आई। उसकी चोट को साफ किया। फिर पड़ोस के डॉ.को बुलाकर उसकी दवाई करवाई। किंतु भारती
ने लक्ष्मी से एक शब्द नहीं कहा कि आप झगड़ा करने क्यों गई थीं।
यह सब देख-समझ कर लक्ष्मी उठी और भारती को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी और कहने लगी- "बेटी मुझे क्षमा कर दो, मैंने तुम्हारे साथ बहुत अत्याचार किया है।
आज तुमने मेरी जान बचाई। मैं कितनी पापिन हूँ कि तुम्हें कभी अपनी बहू नहीं माना।" यह सुनकर भारती ने कहा-"आप कैसी बात कर रही हैं? आप तो मेरी मां हैं। मैं आपके काम नहीं आऊँगी तो कौन आएगा ?:यह तो मेरा कर्तव्य है।"
इतना सुनते ही लक्ष्मी अपना सारा दर्द भूल गई और भारती को गले लगाकर उसे बहू नहीं,बेटी बना लिया। आज भारती को अपनी तपस्या के फलस्वरूप अपनी मां मिल गई। और परिवार टूटने से बच गया। यह हमारी बेटियों का संस्कार विश्व के लिए अनु-करणीय है।
