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Pradeep Pokhriyal

Abstract

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Pradeep Pokhriyal

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जिन्दा हूँ मैं

जिन्दा हूँ मैं

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जब तक मरा हुआ था ,

सबको मुझ से प्यार था।

सारी शुभकामनाएँ मेरी थी,

मेरा सब संसार था।।

     सारे उत्सव, सारे वैभव,

     मुझ से ही तो पूरे थे। 

     बिन मेरे तो दुनिया भर के, 

     रिश्ते सब अधूरे थे ।।

मेरे जिन्दा होते ही ,

सच में कुछ चमत्कार हुआ।

दुनिया भर के लोगों को,

दुनिया से ही प्यार हुआ ।।

     आशीष सारे बैरी हो गए,

     बैरी हो गयी माया।

     किसी को मेरा ढंग न भाया,

     किसी को मेरी काया ।।

जिन्दा होना गुनाह है मेरा,

या कहो मजबूरी है।

अब में समझा क्यूँ कर मेरी,

सपनों से ही दूरी है ।।


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