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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Inspirational

ययाति और देवयानी

ययाति और देवयानी

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भाग 33 

कुछ संबंध प्राकृतिक होते हैं जैसे माता - पिता , बन्धु - भगिनी आदि। कुछ संबंध नियति के द्वारा निर्मित होते हैं जैसे सखा , सखी , स्वामी , दास अथवा दासी। यहां तक कि पति और पत्नी का संबंध भी दैव के अधीन ही होता है। किस के भाग्य में क्या लिखा है किसे पता है ? शर्मिष्ठा और देवयानी का संबंध भी नियति की ही देन है। न तो देव - दानवों में युद्ध होता और न ही मृत संजीवनी विद्या की आवश्यकता होती। यदि ऐसा होता तो फिर शुक्राचार्य की वैसी स्थिति नहीं होती जैसी आज है। सर्वोपरि, अपरिहार्य, रक्षक , तारणहार , पूज्य और स्वामी जैसी स्थिति है आज शुक्राचार्य की राज्य में। कहने को तो वृषपर्वा महाराज हैं पर महाराज के भी महाराज है शुक्राचार्य। शुक्राचार्य के सम्मुख महाराज वृषपर्वा एक दास की तरह ही तो हैं। शुक्राचार्य की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है पूरे राज्य में। तो वास्तविक सत्ता शुक्राचार्य के हाथ में ही तो मानी जाएगी ना ?


शुक्राचार्य की इसी स्थिति के कारण देवयानी का चेहरा सदैव अभिमान से चूर रहता है। उसके चेहरे से , शब्दों से , भाव भंगिमा से और उसके अंग प्रत्यंग से अभिमान, मद, दर्प ही परिलक्षित होता है और कुछ नहीं। शर्मिष्ठा राजकुमारी होकर भी कितनी विनीत , सुमधुरभाषिणी, क्षमाशील , धैर्यवान, सरल है और देवयानी अकिंचन होकर भी कितनी जिद्दी , कितनी गुस्सैल , कितनी नकचढ़ी और कितनी खड़ूस है। वह अपने पिता के अतिरिक्त अन्य किसी को कुछ समझती ही नहीं है। यह नियति का क्रूर मजाक नहीं तो और क्या है जिसने दो विपरीत ध्रुवों वाली युवतियों को "अंतरंग सखी" बना दिया था। यदि देवयानी उत्तरी ध्रुव है तो शर्मिष्ठा दक्षिणी ध्रुव है। दोनों को सखी बनाकर क्या संदेश देना चाहती है ये नियति ? क्या यही कि देवयानी को शर्मिष्ठा से थोड़ी विनयशीलता, सुमधुरता, क्षमा करने का गुण सीखना चाहिए और शर्मिष्ठा को भी देवयानी से अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करने की कला सीखनी चाहिए ? क्या नियति के संदेश मनुष्य की समझ में आते हैं ? और यदि आते भी हैं तो क्या मनुष्य उस पथ पर चलने की ओर अग्रसर हो पाता है ? और यदि मनुष्य उस पथ पर चलना प्रारंभ कर भी दे तो क्या वह मंजिल तक पहुंच पाता है ? क्या सब कुछ नियति के ही अधीन है ? संभवत: नहीं। मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता है ? नन्हे से ध्रुव ने नियति को पलटकर रख दिया था। माना कि नियति बहुत बड़ी होती है पर कर्म उससे भी बड़े होते हैं। कर्म नियति कि दिशा को मोड़ने की क्षमता रखते हैं। 


शर्मिष्ठा अब गुड्डे गुड़ियों का खेल खेलने वाली छोटी सी गुड़िया नहीं रह गई थी। अब वह एक षोडशी बनकर जग में अपने सौन्दर्य की किरणें बिखेर रही थी। लावण्य उसके चेहरे से प्रकट होता था। कमनीयता उसकी भाव भंगिमाओं में भरी पड़ी थी और मादकता ? उसके प्रत्येक अंग में परस्पर प्रतिस्पर्धा चल रही थी कि कौन सा अंग अधिक मादक है। उसके कंटीले नयन राह चलते पथिक का हृदय भेदने की शक्ति रखते हैं। उसके घने काले लहराते बाल बादलों को घुटनों पर लाने की क्षमता रखते हैं। उसके लाल सुर्ख अधरों में न जाने कितने गुलाबों का रस मिला हुआ है ? उसकी एक मधुर मुस्कान पर सब कुछ न्यौछावर करने को सभी पुरुषों का मन करता है। और उसका क्षीण कटि प्रदेश देखकर तो ऐसा लगता है जैसे दो भारी भरकम द्वीपों की संधि कर दी गई हो। सुडौल वक्ष ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे दो मेरूतुंग समानांतर खड़े होकर एक दूसरे से अधिक उन्नत होने की प्रतिस्पर्धा कर रहे हों। 


शर्मिष्ठा सज संवर कर स्वयं को दर्पण में देख रही थी। उसकी नजरें दर्पण से हट ही नहीं रहीं थीं। जब यौवन का पदार्पण होता है तो नजरें आईने पर ही टिकी रहती हैं। हरदम सजना , श्रंगार करना , दर्पण में घंटों तक स्वयं को निहारना और यह सोचकर प्रसन्न होना कि ईश्वर ने उसे जो रूप और सौन्दर्य प्रदान किया है वैसा किसी अन्य को प्रदान नहीं किया है। अपने ही सौन्दर्य पर मुग्ध होना और फिर लजाकर गर्दन और नयन झुका लेना। ये अदाऐं एक षोडशी के जीवन का आवश्यक अंग बन जाती हैं। 


सजने संवरने के प्रति इस आयु में अत्यधिक लगाव होने के कारण एक षोडशी सजने लगती है, संवरने लगती है। पर किसके लिए ? कोई तो होगा जो उसके सपनों का राजकुमार बनेगा। एक दिन वह घोड़े पर सवार होकर सेहरा बांधकर आएगा और उसे डोली में बैठाकर अपने साथ ले जाएगा। इस वय में उसे सपने भी किसी राजकुमार के ही आते हैं। शर्मिष्ठा के स्वप्न में भी अब तक न जाने कितने राजकुमार आ चुके थे। सबके सब कह रहे थे "शर्मिष्ठा, हमारे साथ चलो। शर्मिष्ठा मैं तुम्हें महलों की रानी बनाना चाहता हूं।" अब ये भी कोई बात हुई क्या ? जब मैं एक राजकुमारी हूं तो किसी राजा की रानी ही बनूंगी, किसी की दासी तो बनूंगी नहीं।" कैसी कैसी बातें करते हैं लोग ? और वह भी सपनों में" ? 


"शर्मिष्ठा, वहां क्या कर रही हो पुत्री" ? पीछे से महारानी प्रियंवदा की आवाज सुनाई पड़ी। "पूजन करने नहीं जाना है क्या ? आज तो सावन का पहला सोमवार है और तुमने आज व्रत भी रखा है। तुम सोलह सोमवार कर रही हो ना ? तो शिवजी का पूजन करने नहीं जाना है क्या" ? महारानी के शब्दों में मीठा मीठा उपालंभ था। 


शर्मिष्ठा शीघ्रता से दर्पण के सामने से हट गई किन्तु मां की नजरों ने उसकी चोरी पकड़ ही ली। महारानी प्रियंवदा मुस्कुराते हुए उसकी आंखों में झांककर बोली "आईना देख रही थी ना ? ज्यादा मत देखा कर आईना ? क्योंकि ये आईने भी पागल प्रेमी होते हैं। कहीं ऐसा ना हो कि एक दिन ये आईना ही तुम पर अपना दिल हार जाए और तुम्हें उड़ाकर कहीं ले जाये" ? महारानी प्रियंवदा ने शर्मिष्ठा की ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाते हुए शरारत से कहा। जब कोई भाभी नहीं होती है तो मां ही छेड़छाड़ प्रारंभ कर देती है। 


"आप भी ना माते, जब देखो तब मुझे छेड़ती रहतीं हैं। अभी पूजा के लिए जाना है ना , बस उसी के लिए तैयार हो रही थी। आप ही तो कहती हैं कि युवतियों को घर से बाहर जाते समय अच्छे से तैयार होकर जाना चाहिए। और हम तो राजघराने की महिलाऐं हैं इसलिए जनता की नजरें सदैव हम पर ही लगी रहती हैं। अब आप ही बताऐं माते, कि हम करें तो क्या करें" ? शर्मिष्ठा ने कृत्रिम रोषपूर्ण नेत्रों से देखते हुए कहा। 


"हां हां, तो मैं कब मना कर रही हूं तुम्हें ? खूब बनाव श्रंगार करो। ये ही तो दिन हैं सजने संवरने के। इस उम्र में मन सजने संवरने के अतिरिक्त और कुछ करना ही नहीं चाहता है। फिर तुम्हारे लिए कोई राजकुमार भी तो स्वयंवर के लिए स्वयं को तैयार कर रहा होगा ? मुझे तो कभी कभी भय लगता है कि कहीं तुम्हारी सुन्दरता की प्रसिद्धि के कारण सारे राजकुमार आपस में ही लड़कर स्वयं को समाप्त न कर लें" ? महारानी ने शर्मिष्ठा की बलैयां लेते हुए अपनी दाहिनी आंख की कोर से अपनी अनामिका पे थोड़ा सा काजल चुराया और उसे शर्मिष्ठा के ललाट पर लगाने लगीं। "अब जल्दी चलो, पूजा का समय हो गया है।" 


महारानी प्रियंवदा के साथ साथ शर्मिष्ठा पूजा के लिए शिवालय में आ गई। उनके साथ अनेक दासियां भी आ गई थीं। राजपुरोहित ने पूजा करा दी। महारानी और शर्मिष्ठा ने भगवान शिव और राजपुरोहित दोनों से आशीर्वाद लिया और वापस अपने महल की ओर चलने लगीं। 


"शर्मि, भगवान शिव से क्या मांगा तुमने" ? महारानी शर्मिष्ठा को छेड़ते हुए बोली। 

"यही कि हमारे राज्य पर कृपा बनाये रखना। प्रजा को कोई कष्ट नहीं हो। सर्वत्र उन्नति हो। सभी निरोगी बनें और स्वस्थ रहें।" शर्मिष्ठा ने सहज रूप से कह दिया। 


शर्मिष्ठाकी बात सुनकर महारानी बहुत जोर से हंसी। शर्मिष्ठा को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ। "उसने ऐसा क्या बोल दिया था कि माते हंसे जा रही हैं" ? वह सोचने लगी। उसका चेहरा उदास हो गया। उसकी रोनी सूरत देखकर महारानी की हंसी रुक गई। महारानी को अब शर्मिष्ठा की रोनी सूरत देखकर हंसी आ गई। महारानी कहने लगीं 

"जो तुमने भगवान शिव से मांगा है , वह तो महाराज रोज ही मांगते हैं। मैं भी मांगती हूं। राजपुरोहित भी मांगते हैं। पर तुम्हें इस उम्र के दृष्टिकोण से कुछ और मांगना चाहिए था ना" ? महारानी ने शर्मिष्ठा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा। "अब तुम यौवन वन में प्रवेश कर चुकी हो। शीघ्र ही तुम्हारा विवाह कर दिया जाएगा। तो अपने लिए कोई योग्य वर ही मांग लेती शिवजी से" ? महारानी ने उसे सुझाया। 


अब जाकर शर्मिष्ठा को पता चला था कि उसकी मां उस पर क्यों हंस रही हैं। वह बोली "अभी तो मैं छोटी सी बच्ची हूं , अभी से ही अपने लिए कोई योग्य "वर" क्यों मांगू" ? 

"अब तुम छोटी बच्ची नहीं रही हो शर्मि। ये तुम्हारे नयन देखो कितने चंचल हो गये हैं ? तुम्हारे ये बाल वायु से ताल मिलाकर सार्वजनिक घोषणा कर रहे हैं कि "यौवन महाराज" अब तुम पर विशेष कृपा बरसा रहे हैं। तुम्हारे अधरों में रस भरने लगा है और कपोल सेव की भांति फूल कर तुम्हारी आयु का वर्णन कर रहे हैं। अब तो तुम्हारे स्वप्न में कोई राजकुमार आता होगा ना" ? महारानी ने शर्मिष्ठा से पूछ लिया। इससे शर्मिष्ठा लजा गई और उसने नीची गर्दन कर इंकार में उसे हिला दिया। 

"हाय , कितनी भोली भाली हो तुम ? भांति भांति के राजकुमार हैं दुनिया में। अपनी सखियों से उनके बारे में जानकारी करोगी तो वे स्वप्न में आना प्रारंभ कर देंगे। अब तुम श्रंगारिक साहित्य पढ़ना प्रारंभ कर दो। प्रेम के गीत लिखो। प्रकृति के सुन्दर सुन्दर चित्र बनाओ। झरनों के गीत और नदियों का संगीत सुनो , उनसे तुम्हें प्रेम की बोली सुनाई देगी। यौवन धन पूर्ण का आनंद लो पुत्री।" महारानी ने शर्मिष्ठा को खुली छूट प्रदान कर दी थी। 


श्री हरि 



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