वो काँटा थे या गुलाब
वो काँटा थे या गुलाब
नहीं छोड़ेंगे। अब तेरा क्या होगा सूरज? दोस्तों ने कहकहा लगाया। बरसते पानी में भी सूरज को पसीना आने लगा। गेट पर तो कोई नहीं, बच गए बेटा सूरज, जैसे ही अंदर छलांग लगाई टाँगों पर पापा की छड़ी दो बार पड़ी। नालायक मै तेरा नौकर नहीँ जो रात भर रखवाली करूँगा। खाना खा जाकर अंदर वरना कल से ये भी बंद। पापा साथ ही खाना खाने बैठ गये।
मैं ग्रैजुएशन कर रहा था लेकिन पापा ने छोटा बच्चा ही बना रखा था। कोई दोस्त आता दस बार पूंछताछ करते जैसे कोई टेरेरिस्ट हो । सब के घर की पूरी जानकारी लेना उनका परम् कर्तव्य था। रिटायर्ड कर्नल राजवीर सिंह, मेरे पापा ...मम्मी के जाने के बाद हम तीन भाइयों की परवरिश और दो की शादी के बाद सारा ध्यान मुझ पर ही लगाए रखते। सुबह मॉर्निंग वॉक के बाद नौकर से नाश्ता बनवा कर सबको आवाज देना। उनकी एक आवाज़ पर हाज़िर न होना अपने सिर मुसीबत मोल लेना था.....हाँ हाँ मुफ्त का खाओ तुम नालायकों से कुछ न होगा मैं तो मरते समय एक बूंद पानी भी नही लूँगा। सुबह सुबह पापा का एफ एम शुरू हो जाता। भाभियाँ बहुत चिढ़ती पर कुछ न बोलतीं। छोटी भाभी नौकरी करती थीं। सब राइट टाइम रहते थे, मुझे नौकर के होने पर भी नाश्ता साथ बनवाना पड़ता। चाय खुद बनाओ नही तो सौ बात सुनो।
आज सुबह पापा की आवाज़ थोड़ी नरम थी बहुत घबराये थे । आँख खोल कर देखा तो पट्टी मेरे सिर पर रख रहे थे। मुझे भीगने से बुखार हो गया था, डॉक्टर से दवा लेकर मुझे खाने को कहा। भाभियों की आफत कर कुछ न कुछ बनवा कर देते रहे। ठीक होते ही फिर बदल गए। मुझे अगर कुछ हो गया तो तुझे कोई पूछने वाला न होगा। नालायक सुधर जा, मैं भी लापरवाह था।
एक दिन सो कर दस बजे उठा, घर गन्दा भी था शांत भी। पापा कहाँ है, आज देर कैसे हो गयी। भाभियाँ भी आज देर होने का रोना रो रही थीं,जब कि पापा को पीठ पीछे कहने से बाज़ नहीं आती थीं।
शाम को फोन आया रिटायर्ड कर्नल राजवीर के घर से बोल रहे है हाँ सौरभ भईया ने कहा। मैं गवर्मेंट हॉस्पिटल से बोल रहा हूँ, उनकी डेथ हार्ट अटैक से हो गयी है। एक स्लिप में पता व फ़ोन नम्बर मिला है। आ जाइये, सब घबराये शान्त रोये जा रहे थे।पापा जैसे हमारा मज़ाक उड़ा रहे हों कि मैं एक बूँद पानी की न लूँगा।
डॉ मल्होत्रा ने कहा आपने उन्हें निकलने कैसे दिया वो तीन साल से हार्ट पेशेंट थे। ये लीजिये उनकी फ़ाइल... घर लाने के बाद मैं और मेरा कुत्ता ब्रूनो साथ रोये जा रहे थे। कोई किसी को समझाने के लिये नहीं था।
लगभग पन्द्रह दिन बाद उनके वकील वसीयतनामा लेकर आये, जिसमें पापा ने लिखा था कि कोई घर नहीं बेच सकता। घर तीनों भाइयों का है अगर कोई चाहे तो अपना हिस्सा दूसरे भाई को दे सकता है।
मेरी अचानक मृत्यु होने की स्थिति में नकद रकम और बीमे का पैसा सूरज को दिया जाए। दोनों बड़े बेटों की पढ़ाई व शादी मैं कर चुका हूँ।
भाभियों ने मुझे साथ रखने से मना कर दिया। नौकर भी जिससे पैसे लेता उसी का काम करता। दोनों ने अपनी रसोई अलग बना ली थी। कल तक का दुलारा, आज बेचारा था। अगर खाना है तो पैसे देने ही होंगे।
आज पापा बहुत याद आ रहे थे....ये जोरुओं के गुलाम, तुझे भूखे मार डालेंगे। जब से पापा फोटो में समा गए थे। उनका प्यार और दुनिया का दिखावा समझ आने लगा था।
रसोई में ब्रेड थी मैंने और ब्रूनो ने खा ली, आज पापा का सूरज भूख और दुःख दोनों में जल रहा था।
उनकी अलमारी खोल कर उनके पहने हुए सूट को पकड़ कर मैं ज़ोर से रोने लगा ।...आप मुझे क्यूं छोड़ गए पापा, अचानक उनकी जेब से कुछ आवाज लगी देखा तो उनकी पेंशन ज्यों की त्यों उनकी जेब में पड़ी थी। आप को मेरा अब भी ख्याल है पापा, पास के स्टोर से कुछ खाने के लिये लाकर मैं और ब्रूनो दोनों सो गए।
पास के कॉल सेंटर में नौकरी मुझे खाने लायक पैसे देने लगी थी। लेकिन अभी भी कुछ बाकी था। आओ सूरज, नाश्ता करो मैं हैरान था...क्या बात है?
गौरव भईया ने कहा, मैं अगले महीने अब्रॉड शिफ्ट हो रहा हूँ। सौरभ रतन अपार्टमेंट में फ्लैट एक साल पहले ही खरीद चुका है। घर का क्या करना है?
अब पापा तो हैं नहीं घर बेंच कर अपना अपना हिस्सा ले लेते है। नहीँ आप दोनों पैसे मुझसे ले लो घर मैं नहीं बेचूँगा। जो कम पड़ेगा, कुछ न कुछ करके दे दूंगा।
दोनों भाई अपने रास्ते चले गए। आज समझ आ रहा था कि पापा सख़्त नहीं थे, वो मुझे आने वाले कल के लिए तैयार कर थे। अब दोस्त मुझसे बचते थे कि मैं किसी के घर एक वक्त का खाना खाने न चला आऊं।
रिश्तेदारों ने अपनी बढ़ती लड़कियों का हवाला दे कर पल्ला झाड़ लिया था ।आज दुनिया के रंग भी दिख रहे थे और पापा की एक एक बात भी सच लग रही थी।
गए तो सिर्फ पापा ही थे पर बेरंग पूरी दुनिया ही हो गयी थी।
भाई भी छोड़कर जा चुके थे, मैं और ब्रूनो घण्टों उनकी तस्वीर से बातें करते। अब तो पापा तसवीर में मुस्कुराने भी लगे थे। इसी तरह एक महीना और गुज़र गया रिजल्ट लेने गया तो अच्छे नम्बर देखकर फूट फूट कर रो पड़ा। ख़ुशी बांटने वाला तो जा चुका था।
मेरी प्रिंसिपल ने मुझे शांत कराया, मुझे समझाया कि तुम घर पर लोन ले कर एक प्ले स्कूल खोलो। स्कूल खोलने में मदद मैं करूँगी।
आज राजवीर एजूकेशन एकेडमी को एक साल हो चुका है। पापा आपका सूरज चमकना सीख गया है, घर छोटे बच्चों की हँसी से भरा रहता है। मैं अभी भी बड़ा नहीं हुआ, आप को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। पापा मुस्कुरा रहे थे कि उनका नालायक बेटा सुधर गया।
