STORYMIRROR

Kalpesh Patel

Comedy Drama

4  

Kalpesh Patel

Comedy Drama

वकील और असील-(व्यंग्य कथा)

वकील और असील-(व्यंग्य कथा)

1 min
0

वकील और असील-(व्यंग्य कथा)
अहमदाबाद की अदालत में मुक़दमा चल रहा था।
कटघरे में खड़ा था गुलाम अली—
चेहरे पर घबराहट, आँखों में बेगुनाही की उम्मीद।
उसने अपने वकील अवसर अली की ओर देखा और धीमी आवाज़ में बोला—
गुलाम अली:
“अवसर अली साहब, मेरी बेगुनाही साबित कर दीजिए।
बस फीस ऐसी रखिए
कि मैं बेगुनाह होकर भी
गुनहगार न बन जाऊँ।”
अवसर अली
(हल्की मुस्कान के साथ):
“गुलाम अली,
अगर घोड़ा घास से दोस्ती निभाए,
तो बताए—खाएगा क्या?
मैं तुम्हारा वकील हूँ,
हमदर्द भी हूँ,
लेकिन मेरी रोज़ी-रोटी
तुम्हारी फीस से ही चलती है।
बेगुनाही अदालत तय करेगी,
मगर मेरी कमाई
यहाँ और अभी तय होती है।”
अदालत का दृश्य
गवाह काँपते हुए कहता है—
“मैंने देखा…
पर चोरी करते नहीं देखा।”
जज भौंहें चढ़ाते हैं—
“यानि आपने सब देखा,
लेकिन कुछ भी नहीं।”
दर्शक आपस में फुसफुसाते हैं—
“वकील बहस ज़ोरदार कर रहा है,
पर नज़र बार-बार
फीस की पर्ची पर जा रही है।”
फैसला
ठक!
जज हथौड़ा बजाते हैं—
“सबूत अधूरे हैं।
अदालत के पास शक है,
यक़ीन नहीं।
इसलिए गुलाम अली को
रिहा किया जाता है।”
गुलाम अली राहत की साँस लेता है।
वह श्रद्धा से अपने वकील की ओर देखता है—
गुलाम अली:
“साहब, आपने
मेरी ज़िंदगी बचा ली।”
अवसर अली
(फाइल बंद करते हुए, शांत स्वर में):
“गुलाम अली,
तुम्हें बचाना मेरा पेशा था,
और मेरी फीस बचाना
मेरा उसूल।”
अदालत खाली होने लगती है।
न्याय अपनी फाइलों में लौट जाता है।
व्यंग्य चुपचाप मुस्कुराता है।


मुवक्किल हँसे या रोए,
अदालत कुछ भी कहे,
कहानी वहीं खत्म होती है
जहाँ वकील की फीस शुरू होती है।
यही है वकील–मुवक्किल का रिश्ता।



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Comedy