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Anand Mishra

Action

4  

Anand Mishra

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विरासत

विरासत

3 mins
11

नासिक
वर्ष 2033

अभिषेक देशमुख एक प्रतिभाशाली सिविल इंजीनियर था।

डिग्री उत्कृष्ट थी।

विदेश में नौकरी के अवसर भी थे।

लेकिन एक समस्या थी।

उसे लगता था कि उसके पिता कभी उसकी महत्वाकांक्षाओं को समझ ही नहीं पाए।

उसके पिता—

शंकर देशमुख—

एक छोटे ठेकेदार थे।

उन्होंने जीवनभर गाँवों में पुल, सड़कें और सिंचाई नहरें बनाईं।

उनका नाम बड़े अख़बारों में कभी नहीं छपा।

लेकिन जिन गाँवों में वे काम करते, वहाँ लोग उन्हें सम्मान से "शंकर भाऊ" कहते।

अभिषेक को यह सब छोटा लगता था।

वह कहा करता—

"आपने पूरी ज़िंदगी छोटे-छोटे काम किए।"

"मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूँ।"

शंकर केवल मुस्कुरा देते।

एक दिन राज्य सरकार ने पहाड़ी क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पुल बनाने का कार्य शंकर की कंपनी को दिया।

यह उनके जीवन का सबसे बड़ा अनुबंध था।

काम शुरू हुआ।

लेकिन बरसात असामान्य थी।

भूस्खलन होने लगे।

लागत बढ़ने लगी।

साझेदार पीछे हट गए।

बैंक ने ऋण रोक दिया।

अभिषेक ने सलाह दी—

"अनुबंध छोड़ दीजिए।"

"नुकसान कम होगा।"

शंकर ने शांत स्वर में कहा—

"नुकसान केवल पैसों का नहीं होता।"

"उस पुल के बिना पाँच गाँव हर बरसात में कट जाते हैं।"

कुछ ही सप्ताह बाद निरीक्षण के दौरान भूस्खलन हुआ।

शंकर गंभीर रूप से घायल हो गए।

अस्पताल में उन्होंने अभिषेक का हाथ पकड़कर कहा—

"यदि पुल पूरा न भी हो सके..."

"...तो कम-से-कम यह सुनिश्चित करना कि किसी ने ईमानदारी से कोशिश की थी।"

कुछ दिनों बाद उनका निधन हो गया।

अभिषेक ने कंपनी बंद करने का निर्णय लिया।

उसे लगा—

अब यह बोझ उठाने का कोई अर्थ नहीं।

उसी समय पाँचों गाँवों के लोग उसके कार्यालय पहुँचे।

वे कोई आर्थिक सहायता माँगने नहीं आए थे।

एक वृद्ध महिला ने एक पुरानी तस्वीर उसके सामने रखी।

तस्वीर में शंकर एक कच्चे पुल पर खड़े थे।

वृद्धा बोली—

"बीस वर्ष पहले मेरी बेटी प्रसव पीड़ा में थी।"

"नदी उफान पर थी।"

"इसी आदमी ने रातभर काम करके अस्थायी पुल बनाया।"

"आज मेरा पोता डॉक्टर है।"

फिर एक शिक्षक आगे आए।

"उन्होंने हमारे स्कूल तक सड़क बनाई।"

एक किसान बोला—

"उन्होंने पहली नहर बनवाई।"

धीरे-धीरे अभिषेक को समझ आया—

उसके पिता पुल नहीं बनाते थे।

वे अवसरों को जोड़ते थे।

अगले दिन उसने विदेश की नौकरी ठुकरा दी।

उसने अधूरे पुल का काम फिर शुरू किया।

लेकिन इस बार उसने आधुनिक तकनीक जोड़ी।

भूस्खलन सेंसर।

ड्रोन सर्वेक्षण।

उच्च शक्ति वाले मिश्रित पदार्थ।

स्थानीय युवाओं का प्रशिक्षण।

एक वर्ष बाद पुल बनकर तैयार हुआ।

उद्घाटन समारोह में मंत्री, अधिकारी और मीडिया सब उपस्थित थे।

अभिषेक को मंच पर बुलाया गया।

उससे पूछा गया—

"यह आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि है?"

उसने सिर हिलाया।

"नहीं।"

"सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मैंने देर से सही..."

"...लेकिन अपने पिता का काम समझ लिया।"

उसने पुल का नाम अपने पिता के नाम पर रखने से मना कर दिया।

उसने कहा—

"यह किसी एक व्यक्ति का नहीं है।"

"इसका नाम होगा—"

'विश्वास सेतु'।

स्थानीय समाचार पत्र से

एक वर्ष बाद

"विश्वास सेतु बनने के बाद पाँचों गाँवों के बच्चे पहली बार पूरे वर्ष विद्यालय जा सके।

क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ा।

आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं का समय आधा रह गया।

जब अभिषेक देशमुख से पूछा गया कि क्या यह पुल उनके पिता की स्मृति है, तो उन्होंने केवल इतना कहा—

'नहीं। यह उनके अधूरे काम का पूरा हुआ वाक्य है।'"



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