अजय गुप्ता

Inspirational


4.4  

अजय गुप्ता

Inspirational


उत्सव

उत्सव

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पुरानी हवेली जीवंत हो उठी थी। निष्ठा शनिवार को उधर से निकली तो हारमोनियम और ढोलक की संगत ने उसे आहलादित कर दिया था। उस घर के अंदर, घुंघरू की छम छम के साथ कोई नृत्य कर रहा था। एक बुजुर्ग की सधी आवाज किसी पुराने गीत को तरोताजा कर रही थी। स्वर मद्धिम था पर आलाप ऊंचा।

ओ मेरे माझी, ओ मेरे माझी.....

मेरे साजन हैं उस पार , .........।

निष्ठा उस आवाज की गहराई में डूब सी गई थी। फिर उसने घर के द्वार की ओर देखा, लकड़ी का पुराना दो पट वाला द्वार। उसने दोनों पल्लों के मध्य से झांक कर देखा, एक बड़े से आंगन के दूसरी तरफ एक बरामदा था। बरामदे की छत खपरैल की थी जिसके नीचे कई दीवान करीने से सजाए गए थे। बीच वाले दीवान पर एक बुजुर्ग, ओजस्वी महिला बैठी गीत गा रही थी। निष्ठा ने सोचा, इतनी सुबह, ये सब उठ जाते हैं और गीत-संगीत में रम जाते हैं।

निष्ठा के माता-पिता सरकारी नौकरी में उच्च पद पर आसीन थे। घर में सारी सुख सुविधाएं थी। घर में मात्र तीन सदस्य थे परन्तु साथ बैठ कर बातचीत, कदाचित ही हो पाती थी। माता पिता अत्यंत व्यस्त रहते थे अतः  निष्ठा ज्यादा समय किताबें और टीवी देखने में ही बिताती थी। यद्यपि निष्ठा विज्ञान की छात्रा थी परन्तु उसकी संगीत में भी रुचि थी। उसकी इंटर फाइनल की परीक्षा निकट थी। माता पिता उसको देश के सबसे अच्छे मेडिकल कॉलेज में भेजना चाहते थे - डॉक्टर बनने के लिए। आज निष्ठा का मन संगीत सुनने का था, ऐसा संगीत जो मन को प्रसन्न कर दे। देर शाम जब मां लौटी तो निष्ठा, उनसे जा कर लिपट गई।

" क्या हुआ ? आज तू बहुत खुश है।" मां बोली। 

निष्ठा ने कहा " चलो मां , आज एक हारमोनियम खरीद लाते हैं।"

 निष्ठा! तू पढ़ ले, मन को भटका मत। बस कुछ साल की पढ़ाई है फिर जितना चाहना उतना हारमोनियम बजा लेना।  

और हां! ऑनलाइन, कुछ बढ़िया खाना ऑर्डर कर लेना। आज श्यामू नहीं आएगा। मां, निष्ठा को समझा कर अपने कमरे में चेंज के लिए चली गई।

रविवार की सुबह निष्ठा जॉगिंग के लिए निकली पर उसके कदम हवेली के द्वार पर रुक गए।  द्वार, मधुमालती के लाल और सफेद पुष्पों से आच्छादित था। द्वार के एक तरफ गणेश जी की प्रतिमा थी और उसके सामने एक दीप जल रहा था। उसी के निकट केले के पत्ते पर कुछ पुष्प, कटे हुए फल, मिष्ठान और अनाज को रखा गया था। द्वार के उस पार गीत, संगीत और नृत्य था। निष्ठा ने आज घरवालों से मिलने का मन बना लिया। वह द्वार के करीब कॉल बेल को ढूंढ रही थी। उसकी नजर वहां टंगी एक रेशमी डोरी पर पड़ी, जिस पर लगे कागज पर "कॉलबेल" लिखा हुआ था। डोरी खींचते ही आंगन में लगे तमाम घुंघरू और पीतल की घंटियां बज उठी।

" कोई आया है।" अंदर चल रहा कार्यक्रम अचानक रुक गया। थोड़ी देर बाद जब किवाड खुला तो निष्ठा के सम्मुख एक वृद्ध महिला थी,  उनके चेहरे पर ममतामई ओज था। गौर वर्ण, लाल रंग की बड़ी सी बिंदी, आंखों में काजल, बंगाली साड़ी पहने वो इतनी सुबह पूर्ण श्रृंगार में थी। निष्ठा कुछ कहती उससे पहले वह हंस कर बोली "अरे तुम!" 

 निष्ठा ने हाथ जोड कर, आश्चर्य से कहा "क्या आप मुझे जानती हैं?"

 अरे! क्यों नहीं, तुम हमारी प्रथम आगंतुक हो, जिसने इस डोर को खींचकर हमारे घर आंगन को झंकृत कर दिया।

आओ बेटा ! घर में आओ। स्वागत है तुम्हारा!  बड़ी मां, जैसी दिखने वाली वृद्ध महिला ने कहा।

निष्ठा चौखट को पार कर अंदर आ गई।  

वाह! कितना सुंदर है आंगन है, उसने मन में सोचा। पूरे फर्श पर संगमरमर के रंगीन दानों से सुंदर फूल बने थे।आंगन के केंद्र में एक ऊंचा तुलसी चौरा था , वहां एक दीप जल रहा था।आंगन की दीवारों में पुराने जमाने के आले बने हुए थे, उनमें भी दीप जल रहे थे। उत्तर पूर्व में, श्वेत संगमरमर का मंदिर था, जिसमें कृष्ण जी की प्रतिमा शोभायमान थी। आंगन में न जाने कितने पुष्पों से लदे गमले सजाकर रखे गए थे। निष्ठा मंत्रमुग्ध थी।  

 मेरा नाम निष्ठा है, मैं आपसे संगीत सीखना चाहती हूं। अभी तुरंत नहीं, अपनी परीक्षा समाप्त होने के बाद। निष्ठा ने विनम्रतापूर्वक कहा।

 बड़ी मां, खिलखिला कर हंस पड़ी। वह बोली, बेटा! मैं संगीत की गुरु नहीं हूं और यहां बहुत दिनों तक नहीं रहूंगी। मैं कुछ दिनों में ही चली जाऊंगी। उनके कान्तिमय चेहरे पर एक मधुर मुस्कान थी।

 निष्ठा, तनिक निराश थी। क्या मैं स्कूल जाने से पहले थोड़ी देर के लिए इस आंगन में आ सकती हूं ? मुझे, आप अपनी तरह हंसना, खिलखिलाना और मुस्कुराना सिखा दीजिएगा। निष्ठा ने हंसकर कहा।

 तुम्हारी मुस्कुराहट बहुत सुंदर और निश्छल है। इस घर के द्वार सुबह तुम्हारे लिए खुले रहेंगे। बड़ी मां ने कहा। तुम सोच रही होगी कि हम लोग कौन हैं, यहां क्यों आए हैं।  

 निष्ठा, यह मेरा पैतृक घर है, यहीं मेरा जन्म हुआ था , अस्सी वर्ष पूर्व। इसी आंगन में पली-बढ़ी और खूब खेली। मेरी मां बताती थी कि मेरा जन्मोत्सव बहुत धूमधाम के साथ मनाया गया था। कई दिनों तक परिवारिक नृत्य संगीत और पूजा के कार्यक्रम चले थे इसी आंगन में। यहां मेरे, मां बाबा और भाई बहनों की सुखद यादें हैं। हम सब खुले आसमान के नीचे इस आंगन में सोते थे। रात में टूटते तारों को देख कर कुछ न कुछ मांगते थे। वो तारे, इतने दयालु थे कि उन्होंने मुझे सब कुछ दिया। मैंने पूरा विश्व देखा, हर सागर और हर पर्वतमाला को देखा। संगीत में डूब कर जी भर के नृत्य किया, सुख में भी दुख में भी। सावन की बारिश में, काले बादलों ने मुझे खूब भिगोया है परन्तु अब मैं शिथिल हो गई हूं। मेरे डॉक्टर मित्र ने बताया है कि अब मेरे पास बहुत समय नहीं है, शायद कुछ ही दिन शेष हैं। इसलिए मैं अपने बच्चों के साथ यहां आ गई, जीवन का अंतिम उत्सव मनाने। हम सब, प्रातः उत्सव मनाते हैं और अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हैं। तुम, कल सुबह अवश्य आना।

 निष्ठा, उठने ही वाली थी कि अंदर से तीन महिलाएं आ गई। वो सब लगभग उसकी अपनी मां की उम्र की थी। सबने बड़ी मां की तरह ही श्रृंगार किया हुआ था। बड़ी मां ने कहा "ये तीनों मेरी बेटियां हैं।अलग-अलग देशों में रहती हैं। छुट्टी लेकर आई है, मेरे साथ रहने के लिए।"

 उनकी बड़ी बेटी ने , निष्ठा को चंदन का टीका लगाया।  मझली बेटी ने कटोरी में मीठा दही दिया। सबसे छोटी बेटी ने गुड़ खिलाकर, उसे पुष्पमाला से उसे अलंकृत किया और आशीष दिया। निष्ठा ने ऐसा स्वागत, कभी मन में सोचा भी नहीं था। इस धरा पर इतनी आत्मीयता वो भी एक अपरिचित आगंतुक के लिए। निष्ठा उनसे विदा ले कर, घर वापस तो आ गई परंतु पूरी घटना उसे एक स्वप्न की तरह लग रही थी।

 सोमवार की सुबह, निष्ठा सूर्योदय के पूर्व ही, उस चौखट पर आ गई। उनकी बड़ी बेटी स्नान ध्यान करके, बाहर गणेश जी की मूर्ति सामने दीप प्रज्वलित कर रही थी। उनके साथ निष्ठा अंदर गई, वहां सभी को प्रणाम कर वह बड़ी मां के पास बैठ गई। मझली बेटी उनका श्रृंगार कर रही थी।  मां की खुशी के लिए, वह उनके बालों में मोगरे की वेनी गूँथ रही थी।  सबसे छोटी बेटी , कुछ गुनगुनाते हुए, मंदिर को सजा रही थी।  सूरज का प्रकाश फैल चुका था। निष्ठा ने पूछा "क्या यह दीप बुझा दूं?"  

बडी मां ने कहा "रहने दो, इसे या तो हवा बुझा देगी या तेल खत्म होने पर खुद ही बुझ जाएगा। इसको, जी भर के जी लेने दो।"

 देवी गीत पर मझली बेटी ने नृत्य शुरू किया, बड़ी बेटी मृदंग और छोटी सितार बजा रही थी। बड़ी मां के पास हारमोनियम था। गीत बहुत ही भावपूर्ण था। मृदंग की थाप बढ़ती जा रही थी। घुंघरू की छमक, थिरकते पैरों की गति के साथ बढ़ रही थी। उनके खुले केश, हवा में नृत्य कर रहे थे। अश्रु और स्वेद की बूंदे, हवा में कण कण बन बिखर रही थी। कुछ घुंघरू तेज गति के नृत्य में साथ न दे सके और टूट कर के फर्श पर बिखर गए परन्तु नृत्य की निरंतरता बनी रही। संगीत भी  हवा में रस घोलता रहा। निष्ठा ने ऐसा उत्सव नहीं देखा था।

 कई गीत और नृत्य के बाद बड़ी बेटी ने मां से पूछा " मां, अब कौन सा गीत गाऊँ?"

बंदिनी का ..."ओरे माझी ...."  मुझे गाना है और फिर उन्होंने हारमोनियम पर सुर देना शुरू किया।

ओ मेरे माझी..., ओ मेरे माझी ....

मेरे साजन है उस पार...

मैं मन मार हूं इस पार...

ओ मेरे माझी अबकी बार... 

ले चल पार ले चल पार...

 मेरे साजन है उस पार....

 ओ मेरे माझी, ओ मेरे माझी.....

 मन की किताब से तुम ,

मेरा नाम ही मिटा देना 

गुण तो ना था कोई भी, 

अवगुण मेरे भुला देना.....

 इस गाने के बाद मां कुछ थक सी गई थी। उन्होंने कहा "बड़की, थोड़ा सा गुड खिला दे और पानी भी दे दे।" बड़ी बेटी ने मां को बड़े प्रेम से अपने हाथों से गुड़ और पानी दिया और उनसे आलिंगनबद्ध बैठी रही। मां फिर बोली, "जब मैं विदा होऊं तो शोक नहीं करना। मेरा ऐसा ही श्रृंगार करना, गीत गाना और नृत्य करना। मेरी मां ने इस आंगन में मेरा जन्मोत्सव मनाया था तुम सब मेरा विदाई उत्सव मनाना। खुश रहना, यह जीवन चक्र है, मेरा चक्र पूर्ण हो रहा है।"

 तीनों बेटियों ने मां को अपनी बाहों में भर लिया। निष्ठा भी करीब आ गई उन्होंने निष्ठा के सिर पर भी हाथ रखा और इस लोक से मुस्कुराते हुए विदा ली।

 दस वर्षों बाद...., निष्ठा एक बड़े अस्पताल में डॉक्टर है। अपने मरीजों का इलाज प्रेम से करती है। खूब हंसती है, खिलखिलाती है और घर लौट कर के हारमोनियम बजाती है। सुख- दुःख  से भरा जीवन, सहजता से जीती है। जन्म और मृत्यु के मध्य की यात्रा ही तो जीवन है। वह यात्रा के हर पड़ाव पर उत्सव मनाती है। अपनी जीवन की गुरु " बड़ी मां" की तरह सावन की बारिश में जी भर भीगती है और नृत्य करती है। 


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