सुरूर
सुरूर
सुबह के नौ बज रहे थे, मैं अपने आफिस में काम कर रहा था। एक जरूरी फाइल निकाल कर उसकी स्टडि कर ही रहा था कि रिसेप्शनिस्ट ने मुझे इंटरकॉम पर बताया कि कोई लड़की मुझ से मिलना चाहती है, " ठीक है," कह कर मैंने फ़ोन रख दिया। अचानक उसे देखा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, यक़ीन ही नहीं हुआ कि यह वही लड़की है। उसका नाम साफिया था। आठ साल पहले जब मैंने उसे देखा था तो वह कमसिन थी और बला की खूबसूरत भी। बड़ी - बड़ी आंखें, गोल चेहरा और छरहरा बदन। हाफिज ने मुझे उस लड़की से मिलाया था। वह मेरे आफिस के पास एक किराय के कमरे में फोटो स्टेट और आनलाइन की दुकान चलाता था। खाली समय में मैं काफी शाप जाता तो वह वहीं मुझे मिल जाता था। धीरे - धीरे उसके साथ मेरी दोस्ती हो गई। रोज वह मुझ से उस लड़की के बारे में बात करता था और उसकी बातों से लगता था कि वह उस लड़की से रोमांस करता है।
कई महीने गुजर गये। एक दिन मैंने हाफिज से कह दिया, " देखो, वह एक अच्छी लड़की है! तुम उसके साथ कुछ ऐसा-वैसा मत करना।" यह सुनकर उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा लेकिन कहा कुछ नहीं।
कुछ दिनों के बाद मुझे एहसास हो गया था कि हाफिज उस लड़की को पाकर रहेगा। साफिया का पिता एक दर्जी था और उस से मेरी अच्छी दोस्ती थी। मैं चाहता तो उस से कह सकता था कि अपनी बेटी को बचा लो लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया क्योंकि हाफिज से मेरी गहरी दोस्ती हो गई थी और मैं नहीं चाहता था कि साफिया का पिता उस के साथ दुर्व्यवहार करे।
कई साल गुजर गये। एक दिन मुझे मालूम हुआ कि हाफिज मुंबई चला गया है। उसके मुंबई जाने के बाद मैं अपने काम में बहुत व्यस्त हो गया। फ़ोन पर उस से बहुत कम बात होती थी।
आज साफिया मेरे सामने बैठी थी और रो रही थी। उसकी यह हालत देखकर मैंने रिसेप्शनिस्ट को बोल दिया कि वह किसी को भी मेरे कैबिन में न आने दें।
" अब रोना बंद करो साफिया!" मैंने कुछ देर के बाद कहा। " यह बताओ कि हुआ क्या है?" मैंने गहरी सांस लेते हुए पूछा। वह चुप हो गई। उसने जो कहना शुरू किया तो सुनकर मेरे पैरों के तले जमीन खिसक गई। हाफिज ने उसका तीन बार गर्भपात करवाया था। साफिया के मना करने के बावजूद उसने जबरदस्ती उसके साथ संभोग किया था। हाफिज ने उसका कई आपत्तिजनक वीडियो बना लिया था। वह जब तब उसके बदन के साथ खेलता था। जब भी साफिया मना करती तो वह विडियो वायरल करने की धमकी दे देता था। " जब मुझ से उसका दिल भर गया तो मुझे बिना बताए वह मुंबई चला गया और आज तक उसने मेरी कोई ख़बर नहीं ली है," इतना कह कर वह फफक-फफक कर फिर रोने लगी। मैंने उसे रोका नहीं, उसे रोने दिया।
"पानी पीयोगी!" वह चुप हुई तो मैंने कहा। उसने सर हां में हिलाया तो मैंने चपरासी को पानी के साथ कुछ खाने की चीजें भी लाने कह दिया।
" क्या आप के पास हाफिज का नंबर है?" साफिया ने मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा। " हां एक नंबर तो है," कहते हुए मैंने एक कागज के टुकड़े पर वह नंबर लिख कर उसको दे दिया।
" पता नहीं, वह मुझ से बात करेंगे या नहीं.......जिंदगी अब तो बोझ लगने लगी है, " उसने नंबर लेते हुए कहा और मेरे कैबिन से बाहर चली गई ।
उस के जाने के बाद मैं सोचने लगा कि आज तक जो कुछ भी साफिया के साथ हुआ है, कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार मैं भी हूं...…..अगर समय रहते साफिया के पिता को बता दिया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती।
प्रत्येक व्यक्ति का यह फर्ज होना चाहिए कि अपने आस-पास जो भी अप्रिय घटना घटने की संभावना का उन्हें आभास हो तो सम्बंधित व्यक्ति को आगाह करे।
