महीन चावल
महीन चावल
"आ गये आप! कहाँ गये थे ?" अमर रावत घर में प्रवेश किया तो उसकी पत्नी बोली। वह खामोश और असहाय दृष्टि से उसे देखा लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। शाम के चार बज रहे थे, वह सुबह ही घर से निकला था। "पापा! पापा!" कहते हुए दो साल के एक बच्चे ने उसके पैरों से लिपट गया और अपनी तुतली जुबान से कहा, " चॉकेट (चॉकलेट) चॉकेट !" उसने अपने शर्ट को उतार कर स्टैंड पर रख कर बच्चे को गोद में लेते हुए कहा, "चॉकलेट चाहिए!" हाँ कहते हुए बच्चे ने अपना सिर हिलाया। " अच्छा ठीक है, अभी ला दूंगा!" उसे भूख लगी थी, "खाने के लिए कुछ है तो लाओ," उसने पत्नी से कहा। "अभी तक आपने खाना भी नहीं खाया है, पूछा तो कुछ बोले नहीं।" "हर बात को बोलना जरूरी है क्या....... काम से गया था," उसने झल्लाते हुए कहा। " अच्छा ठीक है, आप मुंह हाथ धो लीजिए, मैं खाना लगाती हूं।" अमर रावत खाना खाने के बाद आराम कर रहा था। आज वह जिस आदमी से मिलने गया था, वह उसके गांव से दूर रहता था, वहां जाने के लिए उसके पास किराया तक नहीं था। एक दोस्त की बाइक लेना पड़ा था उसे। घर के पास एक दुकान से वह अपनी जरूरत का सामान लेता था लेकिन उस दुकान की मालिक ने महीनों पहले उधार देने से मना कर दिया था, क्योंकि समय पर उसने उधारी नहीं चुकाया था। अमर रावत अभी आराम ही कर रहा था कि बच्चे ने उसकी पैंट की जेब में अपना मासूम हाथ डालते हुए दुकान चलने की जिद की, " पैसे नहीं हैं बेटे, तुम अपनी मां के पास बैठो.....मैं अभी आया," कहते हुए वह कमरे से बाहर निकल गया। " दो चॉकलेट देना भाई, " अमर रावत ने दुकानदार से कहा। " इसके पैसे दिजियेगा ना?" " नहीं, अभी है नहीं पैसे, बाद में दे दूंगा।" " आपके ऊपर पहले का बकाया भी है लेकिन पैसे अभी तक नहीं मिले।" " दे दूंगा अली भाई, आप निश्चिंत रहें," कहते हुए वह चॉकलेट लेकर घर आ गया। अमर रावत पिछले 18 साल से जीवन से संघर्ष कर रहा था। पिता सुनील रावत का सपना था कि उसका बेटा अफसर ही बने, इसलिए वह अमर रावत को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजा था। हालांकि वह मामूली तनख्वाह पाने वाला एक सरकारी मुलाजिम था लेकिन उसके ठाठ बाट रईसों जैसे थे, घर का खानपान उच्चस्तरीय का था।
कई मुश्किलों का सामना करते हुए अमर रावत ने बी०ए० तो कर लिया लेकिन प्रतियोगिता परीक्षाओं में वह लगातार असफल होता रहा था। उसने हार नहीं मानी, पहले से वह अधिक मेहनत करने लगा लेकिन तीसरे प्रयास में जब वह असफल हुआ तो उसकी कमर ही टूट गई। दिल्ली में उसके 13 साल गुजर गए थे, आखिरकार निराश होकर वह घर लौट आया।
पिता ने अमर रावत की शादी करा दी। वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगा। 2 साल गुजर गए। अपने पिता के सपने को पूरा करने की ललक ने अमर रावत को फिर से मजबूर किया और वह पूरे जोश के साथ पीसीएस की तैयारी करने लगा। स्कूल से महीने के ₹5000 मिलते थे उसे, इतने कम पैसों में परिवार का पेट पालना उसे मुश्किल हो रहा था। आजतक वह अपने पिता के हाथ में एक रुपया भी नहीं रख पाया था। दोपहर का समय था, घर में एक दिन मोटा चावल पका था लेकिन सुनील रावत खाने बैठा तो उससे खाया न गया और थाली छोड़कर उठने लगा, " थोड़ा सा खा लीजिए," उसकी पत्नी ने कहा। ऐसा खाना मैंने कभी खाया है, पच्चीस किलोग्राम चावल का एक पैकेट खरीदता हूं तो सिर्फ बीस - पच्चीस दिन में ही खत्म हो जाता है..... आखिर कब तक अमर और उसके परिवार का बोझ मुझे उठाना पड़ेगा," कहते हुए पत्नी के सामने वह रो दिया। अपने कमरे से अमर रावत ने पिता की आवाज को सुन लिया था। " मैं कल बाहर जा रहा हूं," रात में अमर रावत ने अपनी पत्नी से कहा। " बाहर कहां?" उसने आश्चर्य से पूछा। " चंडीगढ़ ! आज मैं शिकारपुर गांव के एक मजदूर के पास गया था.... उसी के साथ जा रहा हूं।" " लेकिन आजकल तो आप परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।" " अब बहुत देर हो चुकी है शोभा ! मैं पिता पर बोझ बनकर अब नहीं रहना चाहता।" अमर रावत चंडीगढ़ में भवन निर्माण में काम करने लगा। रेत, सीमेंट, ईंट और लोहे के बीच उसकी जिंदगी दब कर रह गई। एक साइट इंजिनियर ने उसकी काबिलियत से प्रभावित होकर एक दिन उसे अपने साथ कंस्ट्रक्शन कंपनी के आफिस में ले गया और अपने प्रोजेक्ट मैनेजर से किसी उपयुक्त पद के लिए उसकी सिफारिश की। अमर रावत अब सुपरवाइजर बन चुका था। जब उसे वेतन मिला तो पिता को फोन किया, " आपके खाते में कुछ रुपए जमा कर दिया हूं, " उसने कहा। " " तुम अचानक घर छोड़कर क्यों चले गए अमर ?" पिता ने पुछा। " यह जरूरी था पिताजी..... मुझे माफ़ कर दीजियेगा, मैं आप का सपना पूरा नहीं कर सका।" " ग़लती मेरी थी बेटे, तुम तो एक पत्रकार बनना चाहते थे।" "ठीक है पिताजी, ड्यूटी का समय हो रहा है," कहते हुए उसने फोन काट दिया।
