सुमित का संघर्ष
सुमित का संघर्ष
घर में कदम रखते ही सुमित पर तानो की बौछार शुरू हो गयी, आज भी उसे कही नौकरी नहीं मिली थी, पर उसके कुछ कहे बिना ही, उसकी चहरे की उदासी और उसके हाव भाव देख, सुमित के दोनों बड़े भाई और उसके पिता उस पे टूट से पढ़े, किसी ने उसकी काबिलीयत पर उँगली उठाई तो किसी ने उसे निकम्मा ही कह दिया। ये सब सुमित क लिए कोई नया ना था। पढ़ाई पूरी करने के दो साल के बाद भी, सुमित को नौकरी ना मिलने की वजह से परिवार के लोग उसे खरी-खोटी सुना दिया करते थे और बहार के दूसरे लोग भी उसकी बेरोज़गारी को लेकर, उसे कुछ ना कुछ कहे, बहते पानी में हाथ धो लिया करते थे। सुमित के दोनों बड़े भाई अपने कड़वे बोल बचन से सुमित के दिल को ठेस पहुँचने में बिलकुल भी कोताही ना बरतते थे और अगर कुछ कमी रह भी जाती तो वो सुमित के पिता के ताने पूरा कर दिया करते थे। सुमित सब कुछ चुप चाप बर्दाश्त करता रहा, उसने कभी भी अपने पिता और बड़े भाइयो को पलट कर जवाब ना दिया। परिवार में एक सुमित की माँ ही थी, जिसे सुमित से हमदर्दी थी, जो उसे हमेशा दिलासा और तसल्ली दे उसे हमेशा हौसला रखने और हिम्मत ना हार, ऊपर वाले पर भरोसा रख, नौकरी की तलाश जारी रखने को कहा करती थी ।
अशोक और सुमन के तीन बेटे थे, जिस में सुमित सब से छोटा था, सुमित २७ साल का खड़े नाक नक़्शे वाला, लम्बा चौड़ा साफ़ रंग वाला, शांत स्वभाव
का लड़का था। सुमित ने M.sc(Science) की पढ़ाई पूरी करने के बाद B.ed. किया था। अपनी दोनों डिग्री सुमित ने distinction में पूरी की थी। सुमित पढ़ने में होशियार तो था पर नौकरी के मामले में उसकी किस्मत उसके दोनों बड़े भाइयों की तरह ना थी। सुमित महत्वाकांक्षी तो था पर तकदीर में उसके अभी काफी चक्कर लिखे थे। सुमित का बड़ा भाई संतोष जो ३१ साल का था, अपनी पढ़ाई एम.बी.ए में पूरी कर एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर काम करता था, जहां उसे काफी अच्छी तनखा और कम्पनी की तरफ से कई सहूलियत मिला करती थी। संतोष की शादी हो चुकी थी और उसे एक बेटी थी। सुमित के मंझले भाई का नाम सुरेश था, जो २९ साल का था, उसने अपनी मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई गवर्मेंट कॉलेज से पूरी की थी और एक बड़ी मोटर कम्पनी में सर्विस इंजीनियर की हैसियत से काम किया करता था जहा उसे अच्छी तनखा मिला करती थी। सुरेश की शादी हुए अभी एक साल ही हुआ था। पूरा परिवार एक साथ, एक ही घर में रहा करता था और आज भी उनके पिता अशोक ही घर के मुखिया थे। सुमित के पिता अशोक अपने दोनों बड़े बेटों की तरक्की से बेहद खुश थे और समाज में दोनों बेटों को लेकर फक्र महसूस करा करते थे। जहां अशोक अपने दोनों बड़े बेटों के भविष्य को लेकर संतुष्ट और निश्चिंत थे, वही सुमित के भविष्य को लेकर काफी फिकरमंद भी रहा करते थे। वैसे तो सुमित के पिता अशोक उसे भी इंजीनियरिंग करना चाहते थे पर सुमित का मन इंजीनियरिंग में ना था। वो तो हमेशा से टीचर बनना चाहता था। पढ़ाई के लिए अपने पिता का विकल्प ना चुनने को लेकर, अशोक सुमित से हमेश नाराज़ ही रहा करते थे । अपने दोनों बड़े बेटों की तरह सुमित को ज़िन्दगी में सेट ना होता देख सुमित के पिता परेशान तो रहते थे पर सुमित द्वारा उनकी इंजीनियरिंग करने की बात ना मानने को ले कर और नौकरी ना मिलने को लेकर, सुमित के पिता उसे अक्सर खरी खोटी सुना दिया करते थे, जिस का फ़ायदा उठा उसके दोनों भाई भी आग में घी डालने का काम किया करते थे।
दौड़ते वक़्त के साथ नौकरी की डिमांड बढ़ने की वजह से नौकरी के लिए कम्पटीशन भी बहुत बढ़ने लगा था। अब नौकरी मिलना इतना अहसान ना था। एक vacancy के लिए कई कई आवेदन आने लगे थे। जिस वजह से कंपनी और कॉलेज ने अपना सिलेक्शन का लेवल भी बड़ा दिया था। अब पढ़ाई के साथ साथ आवेदक की दूसरी काबिलीयत भी अंकी जाने लगी थी, कई एग्जाम को पास करने के साथ साथ कई सर्टिफिकेशन कोर्सेस को भी चयन करने का एक ज़रिया बनाया जाने लगा था। ताकी कम्पनी अपने लिए अच्छे से अच्छा कर्मचारी का सिलेक्शन कर सके । सुमित बढ़ती हुई डिमांड और कॉलेज द्वारा नौकरी के लिए ज़रूरी एग्जामो में पास होने के बाद ही चयन प्रक्रिया मे बैठने के नियमो को देख, आगे और पढने का मन बनाने लगा। ताकि उसे नौकरी मिलने में आसानी हो सके और बार बार रिजेक्शन का सामना ना करना पड़े। competetive एग्जाम की तैयारी के लिए सुमित को किसी अच्छे इंस्टिट्यूट से tution की ज़रूरत थी, जिसकी फीस भरने के लिए उसे पैसो की ज़रूरत थी। जब उसने अपने घर वालों और अपने पिता को इस बारे में बताया तो उन्होंने पैसे देने से साफ़ मना कर दिया और अपने बलबूते पे ही आगे पढ़ने की सला दे दी। सुमित के दोनों भाइयों ने भी उसकी मदद करने से इंकार कर दिया। सुमित की माँ ने सबको समझाने की बहुत कोशिश की और सुमित को एक और मौका देने की बात कही पर किसी ने भी उसकी बात से सहमति नहीं जताई। सुमित निराश मन से अपने कमरे में चला गया। आज वो बेहद हताश था और अपने आप को अकेला और लाचार महसूस कर रहा था। आगे क्या होगा और वो कैसे अपनी पढ़ाई के लिए पैसो का इन्तजाम करेगा उसे कुछ समझा ना आ रहा था। अपनी हताशाओं में लीन सुमित भूखा प्यासा अपने कमरे में रोते रोते सो गया।
सुबह उठते ही बिना कुछ खाए पीए , बिना किसी से बात करे सुमित अपने दोस्त रोशन के घर चला गया। सुमित की माँ उसे कुछ खा लेने को कहती रही पर वो बिना कुछ कहे घर से निकल गया। सुमित ने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए पैसो की मजबूरी और घर के हालत अपने बचपन के दोस्त रोशन से साझा किए। जिस पर रोशन ने उसे तसल्ली देते हुए, उसे पढ़ाई के साथ साथ कोई छोटा मोटा काम कर पैसे जोड़ने की सला दी। काम करते करते compitetive एग्जाम की तैयारी करना कोई आसान ना था पर सुमित के पास इस के अलावा कोई और रास्ता भी ना था। सुमित ने जब रोशन से ही कुछ रास्ता बताने को और मदद करने को कहा तो रोशन ने सुमित को अपने चाचा के बेटा के बारे में बताया। जो अपने शौकिया तौर पर पढ़ाई के साथ साथ एक कंपनी में प्राइवेट employee के तौर पर पार्ट टाइम डाटा एंट्री का काम किया करता था। जहां उसकी अच्छी खासी आमदनी हो जाया करती थी। जो वो अक्सर रोशन को बात बात में बताया करता था और उसे भी काम दिलवाने की बात किया करता था। रोशन ने अपने चचेरे भाई से बात कर, सुमित को भी पार्ट टाइम जॉब दिलवा दी। लेकिन जॉब सुमित के घर से दूर दूसरे सहर में थी। पहले तो सुमित को कुछ समझ ना आ रहा था की अंजान शहर अंजान लोगों के बीच, अकेला वो कैसे ये सब कर सकेगा, पर घर से पढ़ाई के लिए कोई सपोर्ट ना मिलने की उम्मीद देख सुमित ने नौकरी के लिए हा कह दी और जाने से पहले रोशन के भाई की मदद से सुमित ने वहाँ रहने के लिए कमरे और खाने का बंदोबस्त करवा लिया और साथ साथ competetive एग्जाम के लिए एक अच्छी tution क्लास में अपना एडमिशन्स भी करवा लिया, पर इस दौरान सुमित ने अपने घर में इन सब बातों की जानकारी किसी को नहीं दी और एक दिन अपने माँ पिता जी का आशीर्वाद ले, सब को छोड़ वो घर से चला गया। सुमित के पिता उसके इस फैसले से काफी हैरान और नाराज थे। उन्हें सुमित का ये फैसला बिलकुल समझ ना आ रहा था। सुमित के दोनों भाई चुपचाप सब देख रहे थे। ना सुमित ने उनसे कुछ कहा और ना ही उन दोनों ने सुमित से कुछ कहा। सुमित की माँ ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की पर सुमित अपना फैसला ले चूका था। घर की दहलीज पार करते वक़्त उसे इस बात का पूरा ख्याल था की अब ज़िन्दगी में बिना कुछ किए घर वापस लौटना मुमकिन ना होगा।
अपनी ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करने के लिए, सुमित ने ट्रेन पकड़ ली थी। जो उसे एक अनजान जगह, अजनबियों के बीच ले जाने के लिए निकल चुकी थी। अपनों के बीच अजनबियों सी ज़िन्दगी जीने से बेहतर सुमित को गैरों के बीच रहे अपने पैरो पे खड़े होने का फैसला बेहतर लगा। शहर पहुँचते ही सुमित ने अपना काम और पढ़ाई दोनों शुरू कर दी। वक़्त बीता रहा था, इस दौरान सुमित का अपने परिवार से नाता बिलकुल टूट सा गया था। कभी रोशन के ज़रिये सुमित के माँ पिता उसकी खबर ले लिया करते तो कभी सुमित रोशन से उनका हाल जान लिया करता। लेकिन ना सुमित ने कभी उन्हें फ़ोन किया और ना ही सुमित के घर वालों ने कभी उससे बात करने की कोशिश की। सुमित के पिता ने उसकी माँ को भी सुमित से फ़ोन पर बात करने से मना कर रखा था। सुमित दिन रात कड़ी मेहनत कर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। दिन में वो पढ़ाई करता और रात के ज्यादा तर समय में डाटा एंट्री का काम किया करता था ताकि उसका रहने, खाने और पढ़ाई का खर्च पूरा हो सके। इस दौरान रोशन उसे पैसे क लिए अक्सर पूछा लिया करता और कभी कभी अपने चाचा के घर आने पर सुमित से भी मिलने आ जाया करता था। पर सुमित ने कभी भी रोशन से पैसो की मदद ना ली, जितना वो कमाता था उस ही में अपना पूरा करने की कोशिश किया करता था।
वक़्त बीत रहा था और इस ही दौरान सुमित ने अपनी कड़ी मेहनत से competetive एग्जाम पास कर लिया। जो की काम करते करते कर पाना सुमित क लिए आसान ना था। रिजल्ट आते ही सुमित ने एक बार फिर अपनी किस्मत आज़माने, नौकरी के लिए एक बड़े साइंस कॉलेज में अस्सिस्टें प्रोफ्फेसर की पोस्ट के लिए आवेदन कर दिया। जहां कॉलेज द्वारा चयन हेतु लिए जाने वाले एग्जाम और इंटरव्यू को पास करने के बाद सुमित का सिलेक्शन हो गया। इस चयन प्रक्रिया में उसके द्वारा टीचिंग जॉब के लिए दिया गए competetive एग्जाम ने, नौकरी मिलने में, उसके सिलेक्शन में एक एहम रोल निभाया। सुमित की मेहनत आज रंग ला चुकी थी। आज उसको उसकी मेहनत का फल मिल चूका था। जिस मकसद से उसने अपना घर छोड़ा था आज उसका वो मकसद पूरा हो चूका था। आज उसके पास एक नौकरी थी। जहां उसकी अच्छी तनख्वाह थी। सुमित ने नौकरी ज्वाइन कर ली। सुमित के पढ़ाई के तरीके से कॉलेज का प्रशासन और उसके स्टुडेंट सब खुश थे, कुछ ही वक़्त में सुमित का नाम कॉलेज के बेहतरीन प्रोफेसरों में लिया जाने लगा।
वक़्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और इस दौरान सुमित का उसके घरवालों से संबंध बिलकुल ख़त्म सा हो चूका था। अब तो सुमित के घर वाले उसकी खबर भी लेना बंद कर चुके थे। पर आज भी सुमित रोशन से अपने परिवार की और खास तौर पर अपनी माँ की खैरियत, पता करते रहता था। किस्मत किस की कब पलट जाए ये बताना बेहद मुश्किल है। वक़्त ना किसी का एक सा रहा है और ना कभी रहेगा। सुमित का बड़ा भाई संतोष अपनी पत्नी के भाई अपने साले के दाखिले के लिए आज वही कॉलेज आ पहुंचा था। जहां सुमित पढ़ाया करता था। जब स्टूडेंट के सिलेक्शन प्रक्रिया के लिए इंटरव्यू हेतु अभिभावकों को सिलेक्शन समिति के पास बुलाया गया, तो, संतोष सुमित को उस चयन समिति में बैठा देख बिलकुल हक्का बक्का सा रह गया। संतोष और सुमित की नज़ारे मिलते ही संतोष ने शर्मिंदगी में अपनी नज़ारे निचे झुका ली। आज संतोष को सुमित को बोली हुई अपनी हर बात पे, सुमित को दिए हुए अपने हर ताने से शर्मिंदगी हो रही थी, जो उसकी आँखों से साफ़ झलक रही थी, जब वो बीच बीच में सुमित की ओर देख रहा था।
