गलतफहमी
गलतफहमी
"माँ, माँ दीदी आ गई" , छत से ही तेज आवाज़ में ख़ुशी से चिल्लाते हुए, सुलोचना का छोटा भाई मोहन, घर के दरवाज़े की तरफ दौड़ा। सुलोचना के गाड़ी से उतरते ही फ़ौरन उसके और अपने जीजाजी के पैर छु उनका आशीर्वाद ले, गाड़ी में रखा उनका सामान निकलने लगा। मोहन की आवाज़ और गाड़ी की आवाज़ सुन सोलोचना की माँ, जो रसोई में काम कर रही थी, हाथ का काम छोड़, बेटी और दामाद जी का सवगत करने बहार की तरफ चल पड़ी। गाड़ी से उतरते ही, सुलोचना और उसके पति रोशन ने सामने बरामदे में ही बैठे सुलोचना के बाबूजी के पैर छु उनका आशीर्वाद लिया। इतने में सुलोचना की माँ भी बाहर बरामदे में आ गई। सुलोचना की माँ, साथ पूजा की थाली भी ले आई ताकी बेटी और दामादजी की आरती कर उनका घर में स्वागत करे। आरती का थाल देखते ही, सुलोचना ने अपनी माँ से कहा, “ माँ इस की क्या ज़रूरत थी, कोई पहेली बार थोड़ी आ रहे है”, सुलोचना को प्यार से डाटते हुए, “हा ज़रूरी है, टू चुपकर, बड़ी मॉडर्न हो गई है”, सुलोचना ने दरवाज़े पे दामाद और बेटी की आरती उतारी और दोनों ने माँ का आशीर्वाद ले, घर में प्रवेश किया। आरती की थाली रख, बेटी से गले मिल सुलोचना की माँ की आंखे नुम हो गई, सुलोचना भी थोड़ी भावुक सी हो गई। दोनों को ऐसा देख, वही पास तखत पे बैठे सुलोचना के बाबूजी ने सुलोचन की माँ को आवाज़ लगाई, “क्या आते ही बेटी को रुलाउंगी, देखो तो कितने शुभ मौके पे दोनों का आना हुआ है , अरे भाई बिटिया और दामादजी के लिए कुछ भोजन-वगैरा का इन्तेजाम भी तो करो” सुलोचना के बाबूजी की बात सुनते ही माँ बेटी दोनों, आंसुओ को पोछते हुए, मुस्कुराने लगी। खाना लगने तक सुलोचना और दामाजी को, मुह हाथ धो और सफ़र की वजह से थक जाने के कारण थोडा आराम करने को कहे, सुलोचना की माँ रसाई की तरफ चल पड़ी ताकी सब के लिए जल्द से जल्द खाने का इन्तेजाम कर सके।
सुलोचना दिखने में माध्यम कद कटी और नटखट मिजाज़ की लड़की थी। वैसे उसका नटखट स्वभाव शादी के पहेले तक ही था। शादी के बाद सांसारिक जीवन में प्रवेश करते ही, एकाएक उसमे सुलझापन और समझदारी आ गई थी। वैसे इसका पूरा श्रेय उसके पति, रोशन को जाता है। जिसने अपनी समझदारी और प्यार से सुलोचना के स्वभाव में वक़्त के साथ बदलाव में काफी मदद की । वर्ना वो तो पगली, अपनी न समझी से कुछ न कुछ गड़बड़ कर ही दिया करती थी। २१ साल की थी सुलोचना जब उसकी शादी हुई थी। रोशन उससे उम्र में छे साल बड़ा था। रोशन सरकारी नौकरी में पेशे से सिविल इंजिनियर था,वेल सेटल और परिवार से काफी संपन था। वैसे सुलोचना भी एक अच्छे खानदानी परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसके पिता गाँव के जमींदार थे। सुलोचन भी ग्रेजुएट थी, ने बी.ए. तक अपनी पढाई पूरी की थी। रोशन और सुलोचना का रिश्ता, सुलोचना के चाचा ने लगाया था। वो रोशन के मामा को कई सालो से जानते थे। दोनों व्यापार के सिलसिले में अक्सर मिलते रहते थे। एक दिन, जब रोशन के मामा का काम के सिलसिले में सुलोचना के गाँव आना हुआ, तो सुलोचन के चाचा ने उन्हें, घर खाने पे आमंत्रित किया। वही उन्होंने सुलोचन को पहेली बार देखा था। देखते ही उन्हें सुलोचन, अपने भांजे रोशन के लिए भागई। उस ही दौर में रोशन के लिए भी लड़की ढूंढी जा रही थी। गाँव वापस जाते ही मामाजी ने रोशन के माता पिता से सुलोचन का ज़िक्र किया और अपने जीजाजी की अनुमति से रिश्ते की बात आगे बड़ा दी। दोनों पक्ष को रिश्ता से कोई आपत्ति नहीं थी। सुलोचन और रोशन एक दुसरे के लिए बिलकुल सटीक थे। दोनों परिवारी का इस रिश्ते से संतुष्टि और सहमति होने पर, रोशन और सुलोचना की शादी करा दी गई।
सुलोचना और रोशन की शादी को १० साल हो चुके थे। दोनों के दो बेटे थे। बड़ा बीटा अंकुश और छोटा बेटा अतुल। वो दोनों, सुलोचना के मइके अकेले ही आए थे। क्युकी उनके बच्चे और रोशन के माता पिता दिवाली मनाने रोशन के बड़े भाई के घर गए था। जाने का प्लान तो सब का था, हर साल पूरा परिवार एक साथ अपने पुस्तैनी घर पर ही दिवाली मनाया करता था। लेकिन ऑफिस के अर्जेंट काम की वजह से, रोशन को छुट्टी नहीं मिल सकी। जिस वजह से सुलोचना और रोशन गाँव नहीं जा सके। लेकिन उन्होंने बाकि सब को गाँव भेज दिया। रोशन के ऑफिस का काम दिवाली के दुसरे दिन था। दिवाली के दिन सुलोचना को अकेलापन न लगे, इसलिए वो उसे लेकर दो दिन के लिए उसके मायके चला आया। सुलोचना की माँ का घर, उसके घर से कुछ घंटो के फासले पर ही था। तेवहार भी सब के साथ मानना हो जाता और दुसरे दिन वापस ऑफिस जा, रोशन का काम भी हो जाता। वैसे भी शादी के १० साल बाद पहेली बार उसे दिवाली पे अपने मायके आने का मौका मिला था। जिससे सुलोचना काफी खुश थी।
सुलोचना के आने की खबर पर, उसकी माँ ने उसका पुराना कमरा साफ़ कर वा दिय था। सुलोचना जब भी आती, अपने कमरे में ही ठहेरती। उस कमरे से उसके बचपन की सारी यादे जुडी थी। सुलोचन की शादी के बाद मोहन ने कमरे पे अपना हक़ जताने और उसे हतियाने की बहुत कोशिश की, सुलोचना की खूब चापलूसी की, लेकिन उसकी दाल नहीं गली। सुलोचना ने अपने बाबूजी को शादी से पहेले ही कहे दिया था। वो कमरा हमेशा वैसी ही रहेगा, जैसा वो छोड़ कर जाएगी और वो शादी के बाद जब भी सब से मिलने आया करेगी तो अपने कमरे में ही रहेगी। जिस पर उसके बाबूजी ने मोहर भी लगा दी थी। इस वजह से मोहन का दिल होते हुए भी उसे वो कमरा मिल न सका।
फ्रेश हो, सुलोचना ने अपने पति रोशन को थोडा आराम करने को कहा और खुद रसोई की तरफ चल पड़ी। ताकी खाने की तैयारी में वो रसोई में माँ का थोडा हाथ बटा सके। सुलोचना के रसोई में आते ही उसकी माँ ने उसे किसी भी चीज़ को छुने से साफ़ मना कर दिया और उसे कमरे में जा के आराम करने को कहेने लगी। लेकिन सुलोचना भी कहाँ सुननेवाली थी, उसने तो सोच कर रखना था। जब तक वो यहाँ रहेगी, तब तक वो माँ को रसोई का कोई भी काम करने नहीं देगी, सारा काम वो खुद देखेगी। ताकि की उसके होने की वजह से, माँ को काम से थोडा आराम मिल सके। माँ को सुलोचना की आदत पता थी, इसलिए सुबह से ही लगी थी काम में, ज्यादा तर काम तो निपट गया था, बस थोडा बहुत ही बचा था। सुलोचना के भाई का रिश्ता लग चूका था। लेकिन किन्ही कारणों से, उसकी शादी अगले साल तक टल गई थी। जिस वजह से सुलोचना की माँ को ही घर का सब काम अकेले देखन पड़ता था। खाना हो जाने के बाद सब अपने अपने कमरे में आराम करने चले गए। सुलोचना रसाई में बचा हुआ काम निपटने में माँ की मदद करने चली गई।
इधर उधर की बात करते ही, सुलोचना की माँ ने उसे हिचकिचाते हुए स्वर में बोला,” सुना है नाजिया भी इस साल दिवाली में, अपने परिवार के साथ गाँव आई है ”,
नाजिया का नाम सुनते ही सुलोचना बिलकुल स्थाम्ब सी हो गई। कुछ विचार में घूम सुलोचना ने अपनी माँ से पूछा,” तुम्हे कैसे पता”,
“पलक बता रही थी, वो मिली थी, उससे, बस स्टॉप पे”, सुलोचना की माँ ने कहा,
माँ को बिच में ही रोकते हुए,” हमें क्या करना, छोड़ कोई और बात करो, सुलोचना ने कहा।
“आखिर क्या हुआ है तुम दोनों के बिच, जो तुम दोनों एक दुसरे से बात नहीं करते” सुलोचना की माँ ने बेचैने में पूछा।
“कुछ नहीं, कहा न छोड़ो कुछ और बात करो”, सुलोचना ने चिडचिडाहट में कहे, कमरे की ओर चल पड़ी।
कमरे में रोशन आराम कर रहा था। सुलोचना भी पलंग पे बैठ गई। उसकी आंखे नम थी, मानो किसी ने पुराने जख्मो को छेड दिया हो।
नाजिया और सुलोचना दोनों बचपन से ही दोस्त थी। दोनों की शुरुवाती स्कूल की शिक्षा, गाँव के ही प्रथिमिक शाला से हुई थी। एक दुसरे से पहेली बार दोनों स्कूल में ही मिले थे । दोनों एक ही कक्षा में थे और पड़ने में बिलकुल एक बाराबर होसियार। साथ पड़ना, साथ खेलना, स्कूल से घर तक साथ आना जाना, यही दोनों का दिनचर्या बन चूका था। स्कूल की सब से होनहार लड़किया थी दोनों। पढाई में एक दुसरे को ही टक्कर दिया करती थी। पर इससे दोनों की दोस्ती पर ज़रा भी फर्क नहीं पड़ाता था। बल्कि साथ पड़, एक दुसरे को पढाई में पूरी मादा किया करती थी और मोटीवेट भी करती थी। भले ही कक्षा में, दोनों में से कोई भी अव्वाल आए, ख़ुशी और उत्साह दोनों साथ मनाया करती। धीरे धीरे उम्र बड़ती गई और दोनों की दोस्ती और पक्की हो गई। एक दुसरे के घर आना जाना, खाना पीना सब आम सा होने लगा। एक दुसरे को अपनी मन की हर बात बताया करती। कुछ नहीं छुपाती। एक दुसरे के तेव्हारो में एक दुसरे के घर जाना। एक दुसरे के परिवार को बिलकुल अपने परिवार के जैसा समझा करती थी दोनों। दोनों के परिवार वाले भी उन दोनों के साथ बिलकुल एक सा बर्ताव किया करते थे।नाजिया को दिवाली बेहद पसंद थी। हर साल दिवाली के मौके पर, दिवाली की तैयारियों और घर को सजाने में सुलोचन की पूरी मदद किया करती। बल्कि दिवाली के मौके पे, सुलोचना के घर को सजाने की पूरी ज़िम्मेदारी नाजिया और सुलोचना की ही हुआ करती। अपने हाथो से दोनों एक से बडकर एक खुबसूरत कंदील, झालर, रंगोली, रंग बिरंगे कजाग के बने हुए गुलदस्ते बना, घर को पुरे गाँव में सब से सुन्दर सजाने में लगी रहती। जिसकी तैयारिया वो लोग हफ्त से किया करती थी। नाजिया तो सुलोचना के घर पे दिवाली के मौके पे चुडा, चकरी और दुसरे फर्संद बनाने में भी मदद दिया करती थी। रसाई का पूरा काम तो दोनों सहेलियों को सुलोचना की माँ ने ही सिखाया था। नाजिया और सुलोचना का परिवार दोनों में बिलकुल भी फर्क नहीं किए करता था। बिलकुल यही अपनापन सुलोचना को भी नाजिया के घर से मिला करता था। दोनों बिलकुल सगी बहेनो की तरह रहती थी । एक दुसरे के बिना कही नहीं जाया करती थी और ना ही एक दुसरे को बिना बताए कोई काम किया करती थी।
उम्र बडने के साथ साथ दोनों की दोस्ती और भी गेहरी होती जा रही थी। दोनों ने १२ वी की पढाई पूरी होने के बाद साथ ग्रेजुएशन करने का तैय किया। उस दौर में लड़कियों ज्यादा पड़ा लिखा नहीं करती थी। कुछ की शादी जल्दी हो जाती तो कुछ घर के काम में लग जाती। कॉलेज गाँव से बहार था, दोनों की पढाई में रूचि देख। सुलोचना और नाजिया के घर वालो ने उनका दाखला कॉलेज में करवा दिया। कॉलेज जाने के लिए दोनों लड़कियों को एक दुसरे का साथ था। जिससे दोनों के परिवार को भी हिम्मत थी। सुलोचना और नाजिया की साथ की किसी भी लड़की ने १२ वी के बाद पढाई नहीं की। वे दोनों कॉलेज में पढ़ने वाली गाँव की शुरुवाती लड़कियों में से थी। दोनों को एडमिशन में बिलकुल भी दिक्कत नहीं गई, दोनों के १२ वी में नंबर अच्छे थे, जिस वजह से एडमिशन आसानी से हो गया।
कॉलेज में दोनों की मुलाकात और भी कई लड़कियों से हुई, उन्ही में से एक थी पलक और दूसरी थी राधिका, वो भी उनके साथ एक ही बैच में थी। पलक और राधिका का घर कॉलेज के पास ही था। पहेले दो साल तो काफी अच्छे गुज़ारे, दोनों को कुछ और सहेलिय मिल गई थी जिस वजह से पढाई भी जम के होती और मस्ती तो उससे दोगुनी हुआ करती। लेकिन कॉलेज में अव्वाल आने की टक्कर आज भी सुलोचना और नाजिया में ही थी। दोनों अपनी सभी सहेलियों को पढाई में मदद किया करती थी, ज्यादा तर तो सब पलक के घर मिल कर ग्रुप में पड़ा करती। पलक का घर कॉलेज से बिलकुल करीब था। जिस वजह से सभी सहेलिया अक्सर लेक्चर फ्री होने का फैयदा उठा, कभी साथ कुछ पड़ लिया करती, तो कभी कुछ खेल हो जाया करता, सब का। अपनी कॉलेज की ज़िन्दगी को, पढाई के साथ पूरा एन्जॉय कर रही था वे लोग।
कॉलेज के दो साल पढाई और मस्ती में कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। अब बस कॉलेज का आखिरी साल था, सब का। मिड टर्म के एग्जाम होने के बाद, दिवाली की छुट्टी लगनी थी। आखिरी इम्तेहान दिवाली के दो दिन पहेले तक था। जिस वजह से नाजिया और सुलोचना को, इस साल दिवाली पे घर को मन मुताबिक सजाने का मौका नहीं मिल पाया था। दोनों ने तैय किया, एग्जाम ख़त्म होते ही, कॉलेज से जल्दी घर वापस आ, दोनों, दीवली की तैयारियों में लग जाएगी। ताकि कोई कसर न बच जाये उनके घर सजाने में। वही कॉलेज में सभी सहेलियों के इम्तेहान तो पुरे हो गए। लेकिन राधिका का एक असाइनमेंट, उसकी लापरवाही की वजह से रहे गया था। जिसे उसके शिक्षक ने दिवाली की छुट्टियों से पहेले जमा करने को कहा था। राधिका ने अपना कॉलेज का काम नाजिया पे टालने की कोशिश की और कुछ बहाना बना अपना असाइनमेंट नाजिया को पूरा करने को कहा। जिस पर सुलोचना और नाजिया ने उसे अपनी दिवाली की तयारी की बात बताई। नाजिया ने राधिका को अपनी असाइनमेंट की रखी हुई एक्स्ट्रा कॉपी दे दी। ताकि उससे मदद ले, वो अपना असाइनमेंट पूरा कर ले। राधिका ने नाजिया की कॉपी रख तो लि, लेकिन उसकी मदद न करते हुए, सुलोचना की घर सजाने में मदद करने की बात उसे कही न कही खटक सी गई। इतनी ज़रा सी बात को उसने दिल पे लगा लिया। नाजिया से अपनी नाराज़गी उसने पलक से शेयर की, जिस पर पलक ने उसे थोडा बहुत समझा कर बात टाल दिया।
इधर नाजिया और सुलोचना कॉलेज से वापस घर आ, खाना खा, अपने काम में लग गई। उधर नाजिया की दी हुई असाइनमेंट कॉपी की मदद से असाइनमेंट पूरा करते हुए, राधिका, नाजिया को लेकर काफी नाराज़ थी। उसकी सोच थी की नाजिया उसके असाइनमेंट के लिए उसके साथ नहीं रुखी। दिवाली का दिन आ गया, हर साल की तरह दोनों इस साल भी खूब एन्जॉय कर रही थी । आने वाले वक़्त से बेखबर दोनों लगी थी फटाके फोड़ने और लोगो को मिठाई खिलाने में। दिवाली की छुट्टी खत्म होते ही कॉलेज दोबारा शुरू हो गया। यह आखिरी टर्म था दोनों का। कॉलेज के पहेले दिन सभी सहेलिया, एक दुसरे से काफी उत्साह से मिल रही थी, बात कर रही थी। पर राधिका का बर्ताव नाजिया के लिए पहेले जैसा नहीं था। वो उससे बात करने से कट रही थी। सुलोचना से बात करते हुए वो नाजिया से नज़र चुरा रही थी, अंजान बन रही थी। जिसे नाजिया ने तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन पलक ने भाप लिया। पर उस वक़्त कुछ कहेने से परहेज किया। नाजिया खुद आगे बड़ा कर राधिका से बात करने लगी।
राधिका को अब नाजिया और सुलोचना की दोस्ती खटकने लगी थी। उन दोनों का हमेशा एक साथ रहना एक दुसरे को हर चीज़ में सपोर्ट करना, अब उसे चुबने लगा था । जिस वजह से वो दोनों की बिच कई बार बातो का हेरफेर करने लगी थी। दोनों की बातो को घुमा फिरा कर और तोड़मोड़ कर एक दुसरे को बताने लगी थी। पहेले तो दोनों, राधिका की बातो को नज़रअंदाज़ करने लगी। लेकिन धीरे धीरे उसकी बाते उनपे कही ना कही असर भी कर रही थी। नाजिया और सुलोचन की गलती इतनी थी, की इतनी पुरानी और गहेरी दोस्ती होने के बावजूद भी दोनों ने एक दुसरे से बातो को साफ़ नहीं किया और दुसरे की बात में आ रही थी। कॉलेज में सभी को अपने आखिरी टर्म में असाइनमेंट जमा करना था। सुलोचना को घर पे रोशन और उसके घरवाले देखने आने वाले थे। जिस वजह से उसका कॉलेज असाइनमेंट, जमा करने जाना मुश्किल था। कॉपी जमा करने की अंतिम तिथि होने की वजह से सुलोचना ने अपना असाइनमेंट नाजिया को जमा करने के लिए दे दिया। सुलोचन को नाजिया के साथ ना दिखने पे राधिका ने नाजिया से उसके कॉलेज न आने का कारण पूछा। जिस पर नाजिया ने उसे सुलोचना को देखने आने वाले लडके के बारे में बताया और उसके असाइनमेंट जमा करने की बात भी बताई। राधिका, भले ही नाजिया से बात करती हो, लेकिन वो सब उपरी दिल से हुआ करता था। नाजिया को लेकर उसका घुसा आज भी बरकर्रा था। राधिका ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थी। जिससे वो सुलोचना और नाजिया के दोस्ती में दरार ला सके। जब सब स्टूडेंट अपना अपना असाइनमेंट जमा कर रहे थे। तब राधिका ने नाजिया की नज़र से बचते हुए सुलोचना का असाइनमेंट, जो नाजिया ने टीचर के टेबल पर जमा किया था, वो हटा दिया । जिसे पलक ने देख लिया, राधिका से पूछने पे, उसने उसे देख कर रख देने की बात कही। दोस्तों में ये सब चीज़े नार्मल होने की वजह से, पलक को उसके मंसूबो पर बिलकुल भी शक नहीं हुआ। क्युकी वो सभी सहेलिया थी और एक दुसरे का असाइनमेंट देखना बिलकुल आम बात थी उनके बिच। लेकिन राधिका ने सुलोचना का असाइनमेंट वापस जमा नहीं किया बल्कि उसे अपने पास ही रख लिया।
कॉलेज के एग्जाम हो गए और सब का फाइनल इयर ख़त्म हो गया। सभी सहेलिया, कॉलेज के आखिरी दिन, एक दुसरे से आखिरी बार मिल रही थी। ना जाने अब किस्से कब मुलाकात होगी। सुलोचना की शादी तैय कर दी गई। नाजिया, अपनी सहेली की शादी की तैयारियों के हर एक मौके पे उसके साथ थी। शादी के दो दिन पहेले, उनके इम्तेहान का रिजल्ट आ गया। नाजिया तो अव्वाल आई लेकिन सुलोचना को असाइनमेंट के नंबर नहीं मिलने की वजह से उसे कुछ अंक कम मिले । असाइनमेंट के मार्क नहीं मिलने की वजह से उसके परसेंटेज पे काफी असर हुआ था। सुलोचना अपने रिजल्ट से उदास हो गई। उसने नाजिया से असाइनमेंट के बारे में पूछा, जिस पर नाजिया ने उसे असाइनमेंट जमा करने की बात कही। दुसरे दिन नाजिया ने फ़ौरन कॉलेज जा, सुलोचना के असाइनमेंट की तप्तिस की और असाइनमेंट खुद जमा करने की बात भी बताई। जिस पर उसे पता चला की, सुलोचना का असाइनमेंट कॉलेज को मिला ही नहीं।
सुलोचना की शादी के एक हफ्ते बाद राधिका की शादी भी होनी थी। जिस वजह से वो सुलोचना से एक दिन पहेले ही मिलने और शादी की बधाई देने चली आई। वहा सुलोचना के रिजल्ट और कम मिले हुए उसके अंक को जान, उसे नाजिया के खिलाफ बहेकाने लगी, जानभुझ कर नाजिया द्वारा असाइनमेंट जमा नहीं करने की बात कर, उसके कान भरने लगी। नाजिया ने कॉलेज से वापस जा सुलोचना को सारी बात बताई, और कोई गलती न होने पर भी उससे माफ़ी मांगी। पर अब तक, भले ही अनजाने और किसी के बहकावे में सही, लेकिन सुलोचना पे राधिका की बातो का असर हो चूका था। वो नाजिया पे बरस पड़ी और बिना कुछ सोचे समझे उसे उसका असाइनमेंट ठीक से जमा न करने पर उल्टा सीधा सुना दिया। नाजिया चुपचाप अपनी गलती मानते हुए वहा से चली गई। सुलोचना की माँ ने कमरे के पास से गुज़रते हुए, दोनों के बिच पेपर को लेकर बात होती हुई सुनी, जिसे अनदेखा कर वो भी अपने काम में लग गई। नाजिया, सुलोचना की शादी में नहीं पहुची और ना ही सुलोचना ने उसे किसी के जरिये बुलावा भेजा। शादी के दिन नाजिया की मौजूदगी ना होने पर, सुलोचना की माँ ने सुलोचना से नाजिया के बारे में पूछा, लेकिन उसने उन्हें ठीक से जवाब नहीं दिया। सुलोचना की माँ द्वारा नाजिया के बारे में बार बार पूछने पर, सुलोचना उन पर बिगड़ गई और उसका नाम दुबारा नहीं लेने को कह दिया। सुलोचना की माँ थोड़ी चौक तो गई, लेकिन शादी की गड़बड़ के कारण उन्होंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। नाजिया ने भी अपने घर तबियत ठीक न होने की बात कर, शादी में जाने की बात को टाल दिया। बचपन की दोस्ती, किसी की जलन का शिकार हो चुकी थी। दोनों के बिच अब गलतफ़हमी की दिवार बन चुकी थी।
कुछ ही महीनो के बाद नाजिया की भी शादी हो गई। नाजिया और सुलोचना की सहेली, पलक की शादी, उनके ही गाँव के लडके से हुई। सभी सहेलिया अपने अपने ग्रहस्त जीवन में इतनी उलझी की परिवार और घर शम्भालने के चक्कर में एक दुसरे से बिलकुल कट सी गई। शादी के बाद कभी नाजिया और सुलोचना की मुलाकात नहीं हुई, दोनों का गाँव आना जाना काफी कम हो चूका था। नाजिया और सुलोचना की दोस्ती के बिच आई दरार के बारे में किसी को भी भनक नहीं थी। यहाँ तक पलक को भी इसकी जानकरी नहीं थी। शादी के बाद उन सब की कभी एक साथ मुलाकात भी नहीं हुई। पलक को कभी कभी बाज़ार में सुलोचना की माँ मिल जाया करती।उन्ही से उसे सुलोचना के बारे में पता चल जाया करता। सुलोचना और नाजिया की दोस्ती में आए बदलाव को परक, सुलोचना की माँ ने, सुलोचना से इस बारे में जानने की बहुत कोशिश की लेकिन सुलोचना ने उन्हें कभी कुछ नहीं बताया और हमेश बात को टाल दिया करती। कई साल ऐसे ही बीत गए, गाँव आने पर न नाजिया कभी सुलोचना के घर उनलोगों से मिलने जाती और ना ही सुलोचना कभी नाजिया के घर गई। सुलोचना की माँ जानती थी की पलक, सुलोचना और नाजिया की दोस्त है। वह उनके साथ एक ही कॉलेज में पड़ी है। एक दिन सुलोचना की माँ ने पलक से बातो बातो में नाजिया और सुलोचना के बिच की अनबन के बारे में पूछा, उन्हें शक तो था की कॉलेज के ही किसी बात को लेकर दोनों में नाराज़गी है। लेकिन वो पक्के तौर पे पूरी तरह बात नहीं जानती थी। सुलोचना की माँ की बात सुन, पलक भी चौक गई। दो इतनी पक्की सहेलियों के बिच आई खटास की, उसे भी भनक नहीं थी। बहुत सोचने के बाद पलक का शक राधिका पे गया, क्यों की उसे नाजिया को लेकर राधिका की नाराज़गी की जानकारी थी। उसे शक हुआ की कही, इन सब में राधिका का कुछ हाथ तो नहीं ।
राधिका आज भी पलक के कांटेक्ट में थी। एक बार मायके जाने पर पलक का राधिका से मिलना हुआ। उसने, उससे सुलोचना और नाजिया की दोस्ती में आई दरार और इतने सालो से एक दुसरे से बात न करने की बात बताई। पलक ने सीधा सीधा राधिका से उसका इस मामले में कितना हाथ है, होने की बात पूछी। उसने राधिका को समझाया की भले ही नाजिया उस दिन किन्ही कारणों वश उसकी मदद के लिए नहीं रुक पाई थी। लेकिन वो ये न भूले की उसकी असाइनमेंट की कॉपी की मदद से ही उसका अपना असाइनमेंट उस दिन समय पे पूरा हो पाया था। पलक की बात सुन राधिका अपने आप को दोषी महसूस करने लगी। उसके लड़कपन की वजह से दोनों की दोस्ती में आई दरार और दोनों के इतने सालो तक एक दुसरे से बात नहीं करने की बात सुन वो अन्दर तक हिल गई। उसने पलक को सारी बात बता दी और फुट फुट कर अपनी की हुई गलती पे रोने लगी। उसने सुलोचना और नाजिया की गलतफहेमी को दूर करने के लिए पलक की मदद मांगी। सुलोचना और नाजिया के गाँव आने पर उसे बता, दो सहेलियों को दोबारा मिलवाने में उसकी मदद करने को कहा। ताकि वो उन्हें सब सचसच बता, उनके बिच की गलतफहेमी दूर कर सके। यह दिन तब आया, जब पलक ने बस स्टॉप पे नाजिया को देखा। उस ही दिन सुलोचना की माँ से बाज़ार में मुलाकात होने पे उसे सुलोचना के दिवाली पे घर आने की बात भी पता चली। वही उसने उन्हें नाजिया के गाँव आने की बात भी बताई थी। लेकिन उसने अभी सुलोचना की माँ को कुछ और बात बताने से परहेज़ किया। वो चाहती थी की राधिका खुद दोनों के बिच की गलत फ़हमी दूर करे।
पलक ने राधिका को दोनों के गाँव में होने की खबर दे दी और उसे तुरंत किसी भी तरह जल्द से जल्द गाँव आने को कहा। पलक ने सुलोचना और नाजिया से मिल उन्हें अपने घर दिवाले पे आमंत्रित किया, उसने उन्हें राधिका के आने की भी बात कही। लेकिन एक दुसरे के निमंत्रण के बारे में दोनों को कुछ नहीं बताया। सुलोचना पलक के घर सब से पहेले पहुच गई, दोनों की कॉलेज की पुरानी बात चल ही रही थी की उतने में नाजिया भी वहा आ गई। १० साल बाद एक दुसरे को देख सुलोचना और नाजिया मन ही मन काफी खुश थी, जो उनकी आँखों खुद बया कर रही थी। लेकिन दुसरे ही पल एक दुसरे से नज़र चुराती हुई, पलक के घर से जाने लगी। इतनी देर में राधिका भी वहा पहुच गई और उसने सुलोचना की तरफ उसका असाइनमेंट कर दिया, जो उसने उस दिन कॉलेज से उठा लिया था, जो इतेफाक से अभी तक उसके माँ के घर उसके कुमरे में उसकी पेटी में ही रखा हुआ था। पहेले तो सुलोचना को कुछ समझ नहीं आया लेकिन राधिका के अपना गुन्हा कुबूल करने और सब सचसच बताने पे वो बिलकुल हक्काबक्का रहा गई। राधिका से सच जान सुलोचना नाजिया से माफ़ी मांगने लगी और दोनों दोस्त एक दुसरे से गले लग खूब रोने लगे।
आज आंसुओ के साथ साथ, दोनों के बिच की इतने सालो की गलतफहमी साफ़ हो रही थी। राधिका ने दोनों से अपने किये की माफ़ी मांगी और साथ पलक का शुक्रियाअदा भी किए। सुलोचना और नाजिया ने राधिका को माफ़ कर दिया। इतने सालो बाद, आज दिवाली के दिन दोनों दोस्त फिर एक साथ थी। दिवाली के प्रकाश से आज दोनों के बिच आए कई सालो पुराना गलतफहमी का अन्धकार मिट चूका था। आज दोनों सहेली दिवाली की अपनी पुरानी यादो को दियो की रौशनी से फिर रोशन करने को बेताब थी।
