STORYMIRROR

Kashif Nawaz

Drama

4  

Kashif Nawaz

Drama

हमसफ़र

हमसफ़र

18 mins
263

    “प्रतीक जल्दी चलो, आज मुझे ऑफिस जल्दी पहुँचना है, बॉस ने सुबह-सुबह ही मंथली स्टाफ मीटिंग रखीं है” डाइनिंग रूम में रखे टेबल से अपना पर्स और टिफ़िन उठाते हुए वैशाली ने दफ्तर के लिए लेट होने की बेचैनी दिखाते हुए जोर से आवाज़ लगाई। जिस पर प्रतीक तेज़ कदमो से चलते हुए कमरे से बहार आ कहेने लगा, “ चल रहा हूँ बाबा, क्लाइंट को दिखाने के लिए कुछ ज़रूरी पेपर रखना भूल गया था, वो ही रख रहा था, चलो अब। प्रतीक ने डाइनिंग टेबल पर रखा अपना टिफ़िन उठाया, जो वैशाली ने उसके लिए पहले से ही तैयार कर रखा था और घर से बहार जाते जाते मेन डोर के पीछे लगे चाबियों के हैंगर से अपनी कार की चाबी ली और जल्दी जल्दी कार निकलने चल पढ़ा, वही वैशाली भी हॉल की सभी लाइट बंद कर, घर के मुख्या दरवाजे और गेट को लॉक कर जल्दी से प्रतीक के पास पहुँच, कार में जा बैठी, जहां प्रतीक गाड़ी स्टार्ट कर उसका इंतज़ार कर रहा था। वैशाली के कार में बैठते ही, माहौल को मज़ाकिया और हल्का बनाने के लिए, प्रतीक ने वैशाली से मजाक करते हुए, चहरे पे शरारती भरी मुस्कान लिए कहा, “ देख लो अब तुम्ही ही देर कर रही हो, अब अगर बॉस ने लेट होने पर डाटा तो मुझसे कुछ मत कहना”, जिस पर वैशाली ने मुस्कराते हुए, प्रतीक के कंधे पे प्यार से हाथ मारते हुए और आगे चलने का इशारा कर कहा ”ओके सर, अब चलिए भी, लेट हो रहे है।"

      प्रतीक और वैशाली की शादी को १२ साल हो चुके थे, पर आज भी दोनों के बीच की केमिस्ट्री और प्यार में ज़र्रा बराबर भी फर्क नहीं पढ़ था। बल्कि बिताते हुए समय के साथ साथ दोनों का प्यार , एक दूसरे के लिए इज्ज़त और आपसी समझ बढ़ती ही जा रही थी। दोनों एक दूसरे के साथ कदम से कदम मिला कर ज़िन्दगी के इस सफ़र को, बिना किसी शिकायत के बखूबी निभा रहे थे। दोनों के लिए उनका परिवार ही उन दोनों की पूरी दुनिया थी। वैसे भी इस शहर में उनका कोई अपना था भी नहीं, थोड़ी बहुत दोस्ती और मुंह बोले कुछ रिश्ते बन गए थे, पर आज के ज़माने में रिश्तों का मोल तो जाने ख़त्म सा होने लगा है। आज की दुनिया में ज़रूरत पे रिश्ते बनते है और ज़रूरत न होने पे रिश्ते ख़त्म भी हो जाते है। अब तो रिश्तों की परिभाषा, ज़रूरत पे टिकी है। जिसकी जितनी ज़रूरत, रिश्ता उतना पक्का। 

      प्रतीक स्वभाव का बेहद शांत और हमेशा लोगों की मुसीबत में खड़ा रहने वाला व्यक्ति था, प्रतिक। दोस्तों की हर ज़रूरत में, जो मुमकिन हो सके, मदद करने में संकोच न किया करता था। रियल एस्टेट के बिज़नेस में था, प्रतिक। जिसे वो खुद ही हैंडल किया करता था। जो काफी अच्छा भी चल रहा था। उसे बिसनेस का तजुर्बा अच्छा था और कई साल से इस काम में था। जिस वजह से लोगों को अपनी बातों से कन्विंस कर डील करने में महारत हासिल हो चुकी थी उसे। वैसे भी लोगों को धोका देना और गलत डील में फ़साना उसकी फितरत में नहीं था। किस्मत भी जोरों पर थी, तो ज्यादा तर डील से उसे अच्छे से अच्छा मुनाफा हो जाया करता था। अपने टाइम और काम की अहमियत के साथ साथ उसकी नज़र में लोगों के पैसो और टाइम की भी अहमियत बिलकुल एक समान थी। उसके द्वारा की गई डील से लोग हमेशा फायदे में ही रहा करते थे । जिस वजह से उसका इस बिसनेस में काफी अच्छा नाम होने लगा था, पर जहां नाम होता है वहा बेवजह जलने वाले लोग भी होते है। कुछ बिसनेस राइवल भी बन जाते है और यही प्रतीक के साथ भी था । 

      बिज़नेस की स्ट्रेटेजी, एक एक दांवपेच, डील में प्रॉफिट-लौस माप-तौल करने का हुनर, उसने अपने पिता से सिखा था। उसके पिता त्रिलोकी लाल जी बेहद सज्जन और ईमानदार स्वभाव के व्यक्ति थे। रियल एस्टेट बिज़नेस में काफी नाम था, उनका। इस बिसनेस के महारथी थे, वो। शहर के बड़े बिसनेस मेन के तौर पर जाना जाता था उन्हें। प्रतीक त्रिलोकी जी का बड़ा बेटा था। कॉलेज ख़त्म करने के बाद प्रतीक ने अपने पिता को उनके बिसनेस में जॉइंट कर लिया था। उसके पिता की ही दी हुई शिक्षा से, आज प्रतीक अपना खुद का बिज़नेस बेहद उम्दा तौर पर चला रहा था। उसका एक छोटा भाई भी था। जो उस वक़्त अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रहा था। 

      वैशाली एक प्राइवेट कंपनी में क्वालिटी कण्ट्रोल विभाग में काम करती थी। जहां उसे ज्वाइन किये हुए अभी 2 साल ही हुए थे। ज़िन्दगी को ऐश ओ आराम से गुजरने के लिए तो प्रतीक का काम ही काफी थी। जो बहुत अच्छा चल रहा था और काफी इनकम थी उससे। पर वैशाली नौकरी पैसे कमाने के लिए नहीं बल्कि शौकिया तौर पर किया करती थी। बच्चों की पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियाँ ठीक चलती देख, वैशाली भी कुछ करने का मन बनाने लगी। प्रतीक ने भी उसकी इस राय में हामी भर दी, बस तो फिर क्या था। प्रतीक ने बच्चों और घर की जिम्मेदारियों में उसकी मदद करने की बात की और वैशाली ने फ़ौरन नौकरी की तलाश शुरू कर दी। किस्मत भी अच्छी थी। जल्दी ही एक अच्छी कंपनी में मौका भी मिल गया। जहां उसे उसके क्वालिफिकेशन के हिसाब से अच्छी पोस्ट मिल गई ।

      वैशाली ने केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री एक बहुत ही अच्छे कॉलेज से की थी। जहां से उसे पढ़ाई पूरी करते ही एक रेपुटेड कंपनी में प्लेसमेंट भी मिल गया था। फ्रेशेर थी तो सैलरी थोड़ी कम थी। पर इस नौकरी की बेहद ज़रूरत थी वैशाली को। वैशाली एक माध्यम वर्ग परिवार से ताल्लुक रखती थी। परिवार में उसके माता, पिता और दो छोटे भाई थे। वैशाली के पिता का मोटर रेविन्डिंग का काम था। घर के पास ही उनकी एक छोटी सी दुकान थी। जो ठीक-ठाक चला करती थी। जिस से घर का खर्च, महीने के आखिर में अटकते अटकते पूरा हो जाया करता था। पर बच्चों को बड़े बड़े कॉलेज में पढ़ने और मोटी-मोटी फीस देने की ताकत नहीं थी परिवार में। पर वैशाली पढ़ाई में काफी होशियार थी। हर साल इम्तहान में अव्वाल आया करती थी। अपनी बेटी की पढ़ाई में रुचि देख वैशाली के पिता ने, हिम्मत बाँध उसे इंजीनियरिंग कराने की ठानी, वैशाली ने भी मेहनत की और उसे एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया। जहां उसे साथो-साथ पढ़ाई के लिए स्कालरशिप भी मिल गई।

      नौकरी पे रहते हुए वैशाली बहुत मेहनत किया करती थी । ताकि अपने घर की स्थिति को सुधर सके, अपने दोनों भाइयो को उनके पैरो पर खड़ा कर सके। वैशाली के दोनों छोटा भाई पढ़ाई में उसकी तरह ही होशियार थे। १२ वी में मार्क अच्छे थे, तो दोनों भाइयों को एडमिशन एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में मिल गया । वैशाली के भाइयों ने भी स्कालरशिप के लिए कोशिश की, पर उन्हें स्कालरशिप मिली नहीं। पर वैशाली ने उन्हें चिंता न करने को कहे, पढ़ाई की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। वैशाली के दिल में एक जज्बा था । अपने परिवार को अच्छी ज़िन्दगी और अपने भाइयों को अच्छा भविष्य देने का, जिसके लिए वो दिन रात मेहनत किया करती थी। एक एक पैसो को जोड़ अपने दोनों भाइयों के कॉलेज की फीस के लिए जमा किया करती थी और परिवार की छोटी बड़ी ज़रुरतो को पूरा करने की हर संभव कोशिश भी किया करती थी। कभी कुछ अपने लिए खरीदने का मन भी करता तो, अगले महीने लेने का ख्याल कर, मन को समझा लिया करती। ये हर महीने की आदत थी उसकी । यह तक की शादी के लिए उसकी उम्र भी अब बढ़ने लगी थी। अरमान तो वैशाली के भी थे। दिल के किसी कोने में अपनी ज़िन्दगी को अपने लिए जीने की चाहती भी थी। किसी के साथ की ज़रूरत भी थी, उसे। जो उसकी फरमाइशों और ख्वाहिश को पूरा करता । पर उसने अपने भाइयों और परिवार के भविष्य के लिए अपने सरे अरमानों को एक पिटारे में बंद कर रखा था। जिसे उसने सही समय आने पर ही खोलने का फैसला किया था। 

       वैशाली की मुलाकात प्रतीक से कॉमन फ्रेंड के बर्थडे पार्टी में हुई थी। पहेली मुलाकात में दोनों के बीच कुछ खास बातचीत तो नहीं हुई। पर वो प्रतीक के मन को पहेली नज़र में ही भा गई। एक दिन ऑफिस से घर जाते हुए, वैशाली बस स्टॉप पर, बस के इंतज़ार मे खडी थी। तो पास से ही गुज़रते हुए प्रतीक की नज़र वैशाली पे पढ़ी, जो इत्तफाक से उसी इलाके में एक क्लाइंट से मिलने आया था। उसने वैशाली को देखते ही गाड़ी बस स्टॉप पर रोक दी। प्रतीक को देख, वैशाली थोड़ी चौक गई, पूछने पे प्रतीक ने बताया की वो क्लाइंट से मिलने आया था। काम खत्म कर वो घर ही जा रहा था, तो उसने वैशाली को घर तक लिफ्ट देने की बात कही, जिस पर वैशाली ने पहले थोड़ा संकोच किया, लेकिन जो की वो उससे पहले से जानती थी और प्रतीक ज्यादा इंसिस्ट कर रहा था, तो वो उसे मन नहीं कर पाई। घर की तरफ जाते हुए, थोड़ी देर तक दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की, पर बाद मे प्रतीक ने ही बात शुरू की, अपने काम के बारे मे बताया, वैशाली से उसके काम के बारे में पूछा। बातों बातों में, रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला। जब गाड़ी वैशाली के घर के पास रुखी तो, उसके पिता को वैशाली का किसी अंजान लड़के के साथ गाड़ी से आना कुछ खास पसंद नहीं आया। जिसको लेकर उन्होंने वैशाली को सचेत भी किया। 

      प्रतीक का वैशाली को ऑफिस के बाद घर तक लिफ्ट देने का सिलसिला अब धीरे धीरे बढ़ने लगा था। पहले तो कभी कभी इत्तफ़ाक़ होता था, पर अब रोज़ प्रतीक वैशाली से मिलने के बहाने धुंध ही लिया करता था। वैशाली को भी प्रतीक का साथ और उसके साथ समय बिताना अब अच्छा लगाने लगा था । जो बाते वो किसी से शेयर नहीं कर सकती थी। वो सारी बाते ,अब वो बाते प्रतीक से साथ साझा करने लगी थी। एक बोन्डिंग सी बन्ने लगी थी दोनों में। फिलहाल इस रिश्ते को वैशाली ने अच्छी दोस्ती का नाम दिया था। लेकिन प्रतीक तो मन ही मन दोस्ती से काफी आगे की सोचने लगा था। जो की वैशाली के पिता को वैशाली का प्रतीक के साथ आना जाना खलता था, तो वैशाली हमेशा बस स्टॉप पर ही उतर वाही से घर पैदल चले जाया करती थी। एक दिन हिचकिचाते- हिचकिचाते, प्रतीक ने वैशाली को लंच के लिए पूछा। वैसे तो पहेले दोनों कई बार घर जाते जाते कॉफ़ी के लिए रास्ते में ही किसी कॉफ़ी शॉप पे रुख जाया करते थे। पर इस बार प्रतीक वैशाली से अपने दिल की बात बोलना चाहता था और जानना चाहता था ही उसके दिल उसको ले कर क्या है, क्या वो भी उसे लेकर उतनी ही सीरियस है, जितना वो, या अभी तक वो उसे एक अच्छा दोस्त ही मानती है। वैशाली ने लंच के लिए, हा कर दी, दोनों के लंच का प्लान, वैशाली के ऑफिस के छुट्टी के दिन तय हुआ। 

      उस दिन घर में ऑफिस के काम को लेकर कोई बहाना कर, वैशाली बस स्टॉप पर प्रतीक का इंतज़ार कर रही थी। प्रतीक ने वैशाली को बस स्टॉप से पिक किया और उसे एक महंगे रेस्तुरांत लंच के लिए ले गया। प्रतीक के लिए ऐसे बड़े रेस्तुरांत में खाना खाना कोई बड़ी बात नहीं थी पर वैशाली इससे कम्फर्ट टेबल नहीं थी। उसने प्रतीक को कही और चलने को कहा, किसी सस्ते रेस्तुरांत में। पर प्रतीक ने उससे जैसे तैसे कर उस ही रेस्तुरांत में चलने के लिए मना लिया। प्रतीक थोड़ा घबराया हुआ था। जो उसके चेहरे से साफ़ नज़र आ रहा था। हर बात पर जबान लड़-लड़खड़ाना, बार बार पसीना पोंछना, वैशाली को आज प्रतीक का बर्ताव कुछ अलग लग रहा था। वैशाली द्वारा इसकी वजह पूछने पर प्रतीक ने एक रिंग आगे करते हुए उसे शादी के लिए प्रोपोस कर दिया। प्रतीक के इस प्रपोजल से वैशाली बिलकुल भौचक्की रह गई। उसे कुछ समझ न आया और बिना कुछ कहे, घबराहट में वो वहाँ से चली गई। वैशाली को जाता देख प्रतीक परेशान हो गया । उसने वैशाली को रोकने की कोशिश की पर वैशाली रुखी नहीं। निराशा मन से प्रतीक भी वहाँ से चला गया। भले ही वैशाली ने उसके प्रपोज़ल को एक्सेप्ट नहीं किया था पर वो वैशाली जैसी अच्छी दोस्त को खोना नहीं चाहता था। 

      दूसरी तरफ वैशाली भी रास्ते भर इस ही बात को लेकर काफी परेशान थी। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि उसे कुछ समझ नहीं आया, कि वो कैसे रियेक्ट करे। वैसे मन ही मन वो भी प्रतीक को पसंद करने लगी थी। लेकिन कभी अपने बर्ताव से उसने अपने जज्बात को प्रतीक के सामने जाहिर नहीं होने दिया। क्यों की अपने परिवार के भविष्य के लिए, अपनी ज़िन्दगी से जुड़ा एहम फैसला जो उसने लिया था। उस वजह से वो प्रतीक को हाँ भी नहीं कर सकती थी। इसलिए उसने चुप चाप वहा से चले जाना ही बेहतर समझा। रात पहाड़ की तरह बीती दोनों पर।  

      कुछ दिनों तक वैशाली ने प्रतीक को अवॉयड करना ही बेहतर समझा, ऑफिस आने जाने का रास्ता तक उसने बदल लिया। पर प्रतीक वैशाली से मिल कर इस सिलसिले में बात करना चाहता था। उसे उसके लिए, अपनी फीलिंग समझाना चाहता था, भले ही उसके बात वैशाली का जवाब न हो। कई दिनों तक बस स्टॉप पे वैशाली का इंतज़ार करने के बाद वो एक दिन सीधा उसके ऑफिस जा पंहुचा। पहेले तो वैशाली ने नज़रे चुराते हुए, बात करने से साफ़ मन कर दिया पर प्रतीक के ज़िद करने पर, वो बात करने को मान गई। बात शुरू करते ही, सब से पहेले प्रतीक ने उससे उस दिन के लिए माफ़ी मांगी और उसके प्रपोजल को एक्सेप्ट नहीं करने की वजह जानना चाहा। क्या वो किसी और को पसंद करती है, ये भी प्रतीक जानना चाहता था । वैशाली, प्रतीक को अपनी मजबूरियों के बारे में कुछ बताना नहीं चाहती थी, पर प्रतीक के बार बार, उसके प्रपोज़ल को मन करने की वजह पूछने पर उसने प्रतीक को सब साफ़ साफ़ बता दिया । 

      प्रतीक ने वैशाली की बात सुन, उसकी ज़िम्मेदारी पूरी होने तक उसका इंतज़ार करने की बात कही और उसकी इस ज़िम्मेदारी में हर संभव मदद करने की भी इच्छा जताई। वैशाली ने प्रतीक की मदद लेने से साफ़ मन कर दिया, पर जो कि वो भी उसे पसंद करती थी और प्रतीक उसके इस फैसले में उसके साथ था। तो उसने प्रतीक को समय आने तक रुकने को कहा, प्रतीक ने भी उसकी बात मान ली। दोनों अब दोबारा मिलने लगे थे। पहले से ज्यादा बाते शेयर करने लगे थे। वैशाली के लिए इंतज़ार और उसके हर कदम में साथ देने की बात ने, वैशाली के मन में प्रतीक के लिए प्यार को और अधिक बड़ा दिया था। 

       जिस दिन का वैशाली और प्रतीक को बेसब्री से इंतज़ार था। वो दिन भी आ गया, जब वैशाली के भाइयों की पढ़ाई पूरी हो गई और उन दोनों को एक अच्छी कंपनी में नौकरी का ऑफर भी मिल गया। आज वैशाली का संकल्प पूरा हो चूका था। भाइयों के लिए उसकी जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी थी। तब वैशाली और प्रतीक ने तैय किया की वो दोनों अब अपने अपने घर में अपने रिश्ते को लेकर बात करेंगे, अपनी ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करेंगे। जब प्रतीक ने वैशाली के बारे में अपने घर में बात की और उससे शादी करने की इच्छा ज़ाहिर की, तो सब ने उसकी बात से सहेमती जाता दी। वही दूसरे तरफ जब वैशाली ने अपने पिता को प्रतीक के बारे में बताया तो उन्होंने, न-नुकुर करते हुए, बिना कोई ठोस वजह बताए, रिश्ते के लिए मना कर दिया । प्रतीक एक अच्छे परिवार का वेल-सेत्तेल लड़का था । जिस कारण रिश्ते के लिए उसके पिता द्वारा मना करने की वजह वैशाली को कुछ समाज नहीं आई। 

      वैशाली के पिता का रिश्ते के लिए मना करने की बात, जब प्रतीक ने अपने घर वालों को बताई, तो उसके पिता ने खुद जा वैशाली के पिता से बात करने का फैसला किया। वैशाली के पिता ने त्रिलोकी जी को रिश्ते के लिए मना तो किया ही, पर साथ साथ प्रतीक द्वारा उनकी बेटी को प्यार के जाल में फ़साने की बात कर उन्हें बहुत खरी खोटी भी सुनाई और उनकी काफी बेज्ज़ती कर घर से जाने को कहे दिया, वैशाली अपने पिता के इस बर्ताव की वजह समझ नहीं पा रही थी। वैशाली के पिता के बर्ताव से प्रतीक के परिवार ने भी इस रिश्ते के लिए प्रतीक को मन कर दिया और वैशाली और उसके परिवार से दूर रहने को सचेत भी कर दिया। घर वालो का साथ न मिलता देख, वैशाली और प्रतीक ने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जा कर शादी करने का फैसला लिया और बिना किस को बताए शादी कर ली। दोनों के इस फैसले से दोनों के परिवार में काफी नाराज़ की थी और सब ने उनसे अपना रिश्ता ख़त्म कर दिया।

      प्रतीक और वैशाली ने दूसरे शहर जा, वही अपनी ज़िन्दगी की नई शुरुआत करने का फैसला किया, वहाँ प्रतीक के कुछ कॉलेज फ्रेंड थे, जिन्होंने ने शुरुवाती महीनो मे दोनों को नए शहर में बसने में काफी मदद की। प्रतीक ने यह अपना पुराना काम दुबारा, नए सिरे से शुरू कर दिया। दोनों की अपनी अपनी थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी । जिसकी मदद से उन्होंने एक घर किराये से लिए और बाकि पैसा प्रतीक के बिसनेस मे इन्वेस्ट कर दिए। बिज़नेस चल गया और दोनों ने कुछ सालो बाद अपना खुद का घर खरीद लिया। प्रतीक और वैशाली को दो बेटे हुए। 

      इस दरमियाँन १२ साल का वक़्त कैसे कट गया, पता ही नहीं चला । अब तो बच्चे भी बड़े हो गए थे । प्रतीक और वैशाली का बड़ा बेटा ११ साल का और छोटा बेटा ९ साल का था । प्रतीक और वैशाली ने कई सालो तक अपने परिवार को मनाने की बहुत कोशिश की पर किसी ने भी उनके रिश्ते को कभी एक्सेप्ट नहीं किया और न ही उनसे कोई तालुकात रखा । वक़्त अपनी गति से बीतते जा रहा था और हर बिताता हुआ वक़्त उनके रिश्ते को और मजबूत कर रहा था। प्रतीक और वैशाली भी अहिस्ता-अहिस्ता अपनी पुरानी यादों को भूलने लगे थे। ज़िन्दगी में आगे बढ़ने लगे थे। उनका छोटा सा परिवार ही अब उनकी दुनिया थी, और वो लोग इसमें ही खुश रहा करते थे।

      सब अच्छा चल रहा था। प्रतीक का बिसनेस, वैशाली का जॉब, बच्चो की अच्छी से अच्छी परवरिश हो रही थी, जो दोनों मिल कर कर रहे थे और बड़े स्कूल में बच्चों की पढ़ाई हो रही थी, एक अच्छा घर था, सब कुछ ठीक था। प्रतीक अपने बिसनेस में उचाई की तरफ ही बदता जा रहा था । लेकिन इस तरक्की का उस में रत्ती बराबर भी घमंड न था। जहां तरक्की होती है, वहाँ जलने वाले लोग भी होते है। यही प्रतीक के साथ भी था, उसके बिसनेस के प्रतिद्वंद्वी, उसकी तरक्की से जलने लगे थे। मार्केट में उसका नाम बनता देख, उससे हसद करने लगे थे । बिसनेस में प्रतीक को पीछे करने और मार्किट में उसका नाम ख़राब करने के लिए, उसके कुछ प्रतिद्वंदियों ने मिलकर, उसे फ्रॉड डील में फ़साने का मंसोबा तैयार किया। जिसके लिए उन्होंने प्लानिंग के साथ कुछ ज़मीनों के जाली दस्तावेज बनवाये, अपने लोगो के ज़रिये, प्रतीक को एक डील में फ़साने का फूलप्रूफ प्लान तैयार किया। उन लोगों का प्लान इतना पुख्ता था और सब कुछ इतना बराबर और सही लग रहा था, कि प्रतीक इस जालसाज़ी को समझ न पाया । यह डील उसे उसके कैरियर की टर्निंग पॉइंट लग रही थी। जिसमें उसे काफी मुनाफा नज़र आ रहा था।

     सब चीज़ें अचानक इतनी तेज़ी से हो रही थी और सब इतना सटीक लग रहा था कि प्रतीक उसके साथ हो रहे धोके को भाप भी न पाया । इस डील के लिए प्रतीक को भी इन्वेस्टमेंट करना था, ज्यादा मुनाफा था तो इन्वेस्टमेंट थोड़ा ज्यादा था। एक दाव खेलना था उसे, जिस में रिस्क काफी था। बिना वैशाली, यह अपने किसी दोस्त से विचार-विनिमय किये उसने रिस्क लिया और अपनी सेविंग इसमें लगा दी। पर हुआ वो जिसकी उसे बिलकुल भी उम्मीद न थी, जाली पेपर के चक्कर में प्रतीक फ्रॉड केस में फंस गया। उसके प्रतिद्वंद्वी अपने मनसूबे में कामियाब हो गए। प्रतीक को बहुत ज़बरदस्त नुकसान तो हुआ ही, साथ ही साथ मार्किट में उसका नाम भी ख़राब हो गया। प्रतीक ने लोगो को और पुलिस को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन सारी चीज़ें उसके खिलाफ थी । जैसे तैसे कर अपने दोस्तों की मदद से वो फ्रॉड केस से बहार तो निकल गया। लेकिन उसके साथ हुए इस धोके ने उसे अन्दर से हिला कर रख दिया। वो बिलकुल टूट गया। 

      प्रतीक ने अपने करियर में पहेली बार इतना बड़ा नुकसान देखा था। नुकसान से ज्यादा तो उसे अपना नाम ख़राब होने का गम था। ऐसा ख़राब वक़्त उसने अपनी ज़िन्दगी में पहेली बार देखा था। उसकी अब तक की जमा पूंजी का ज्यादातर पैसा इस डील में डूब गया था । वो अब अक्सर निराश और उदास रहने लगा था। कई दिनों तक उसने अपना काम बंद कर दिया और ज्यादा तर समय अकेले बैठे अफ़सोस में ही बिताया करता था। उसके इस बुरे वक़्त में वैशाली उसके साथ खड़ी रही, उसे हर कदम हिम्मत और सहारा दे, उसका मनोबल बढ़ाने की पुरजोर कोशिश किया करती थी। आज कल थोड़ा कम बात करने लगा था प्रतिक, खाना पीना, बच्चों और वैशाली के साथ बात करना, समय बिताना, हँसी मजाक सब कम कर दिया था उसने। पर वैशाली ने हिम्मत नहीं हारी और ठान राखी थी की प्रतीक को वो पहेले जैसा बना कर ही दम लेगी। वैशाली बिसनेस को दुबारा शुरू करने के लिए रोज़ प्रतीक को हिम्मत दिलाया करती, उसे अपनी बातों से मोटीवेट किया करती, लेकिन हर बार प्रतीक अपनी पिछली डील को याद कर निराशा हो जाया करता । वैशाली ने प्रतीक को खूब समझाया की फिकर न करे और हिम्मत हारने के बजाये, दुबारा शुरुआत करने के लिए हौसला दिया । दिन बीतने लगे, भले ही प्रतीक हिम्मत हर चूका था, पर वैशाली ने हिम्मत नहीं हारी, प्रतीक को दुबारा अपने पैरो पे खड़ा करने के लिए उसका मनोबल बढ़ाती ही रहती। लोगों के लाइफ के स्ट्रगल, उनसे सफलतापूर्वक उभरने की बाते कर, प्रतीक में नई ऊर्जा भरने की कोशिश किया करती थी । वैशाली की मेहनत रंग लाई और प्रतीक ने दोबारा बिसनेस शुरू करने का फैसला लिया।     

      वैशाली ने 2 साल से अपनी पूरी सैलरी जमा कर रखी थी। इस्तेमाल करने की कभी ज़रूरत भी नहीं पढ़ी, क्यों की घर-गृहस्थी और उसकी और बच्चों की सभी ज़रूरतें प्रतीक पूरी कर दिया करता था। वैशाली ने वो सारे पैसे प्रतीक को बिसनेस को दुबारा शुरू करने के लिए दे दिए । प्रतीक फिर से बिलकुल नए सिरे से शुरुआत करना चाहता था। पुरानी डील से मिले हुए धोके को याद रख, हर एक कदम अब फूँक फूँक कर रखना चाहता था । शुरुआत में प्रतीक हर इन्वेस्टमेंट को कम ही रखा करता, जिस वजह से प्रॉफिट भी कम हुआ करता था, पर हर डील के साथ साथ प्रतीक का मनोबल बढ़ने लगा था। उसमें अपने काम को लेकर कांफिदेंस लौटने लगा था। धीरे धीरे अब सब ठीक हो रहा था। ज़िन्दगी दोबारा पटरी पर आने लगी थी। प्रतीक दोबारा अपनी पुरानी ज़िन्दगी जीने लगा था। जिस का पूरा श्रेय वो वैशाली को ही दिया करता था। आखिर उसके ज़िन्दगी के हमसफ़र ने, मुस्किल भरे इस वक़्त में बखूबी उसका साथ जो निभाया था। 

      रिश्ते में प्यार के साथ सम्मान भी बेहद ज़रूरी है। प्रतीक के मन में वैशाली के लिए सम्मान ने, प्यार से भी ऊंचा मुकाम बना लिया था और इस ही सम्मान ने दोनों की ज़िन्दगी में एक अलग ही निखर ला दिया । हमसफ़र का फ़र्ज़ तो प्रतीक ने भी निभाया था। जब वैशाली अपने परिवार के लिए अपना कर्तव्य निभा रही थी। तब प्रतीक उसकी हिम्मत बन उसके साथ खड़ा था। आज के दौर में जब रिश्तों की परिभाषा बदलने लगी है। वही प्रतीक और वैशाली ने ज़िन्दगी के इस सफ़र में एक दूसरे का साथ निभा, सही मायने में हमसफ़र का मतलब समझाया था।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Drama