मासूम दोस्ती
मासूम दोस्ती
“मयूर जल्दी बैठो, हमें बस स्टॉप छोड़ने के बाद पापा को ऑफिस भी जाना है”, नंदनी ने हाथ पकड़ते हुए अपने बेटे का मयूर से कहा और जल्दी जल्दी उसे गाड़ी में बैठने लगी। मयूर, नंदनी और मुकेश का बेटा था , उम्र के ११ साल पूरा कर चूका बेहद ही नटखट स्वभाव का था, वो। हर वक़्त अपनी उलटी सीधी हरकतों से लोगों का मनोरंजन किया करता था। उसकी बाते तो बाप रे बाप! नॉन स्टॉप बटन था शायद उसमें, हर चीज़ में प्रश्न चिन्ह, हर एक चीज़ की जानकारी पाने के लिए वो सवाल पे सवाल करते ही रहता जब तक वह जवाब से संतुष्टि नहीं हो जाता था। लेकिन उसकी बातों में एक अलग ही मासूमियत झलकती थी और यही मासूमियत और बात करने का अंदाज़ लोगों को उसकी तरफ आकर्षित किया करता था। जिस वजह से लोग उसके सवाल से परेशान नहीं हुआ करता था। मयूर की हर एक बात, हर एक हरकत, इज्ज़त और सम्मान के दायरे में ही हुआ करती थी। संस्कार जो इतने अच्छे दिए थे, नंदनी और मुकेश ने अपने दोनों बच्चों को। नंदनी और मुकेश की एक बड़ी बेटी भी थी। जिसका नाम प्रिय था और वो १५ साल की थी और अपनी ९ वी कक्षा की पढ़ाई पूरी कर यह साल उसके १० में प्रवेश किया था। प्रिय पढ़ाई में काफी होशियार थी, हर साल क्लास में टॉप किया करती थी। मयूर भी हमेशा अच्छे नम्बरों से पास हुआ करता था। पर अपनी बहन प्रिय की तरह पढ़ाई में उतना तेज़ नहीं था। सालाना इम्तहान खत्म हो चुके थे और स्कूल की गर्मियों की छुट्टी लग चुकी थी। जिस वजह से नंदनी अपने भाई के घर कुछ दिन रहने जा रही थी। प्रिय उनके साथ नहीं आने वाली थी इस साल उसकी दसवीं की पढ़ाई थी जिसके लिए कुछ एक्स्ट्रा क्लास गर्मी की छुट्टियों में स्कूल द्वारा राखी गई थी और मुकेश का भी ऑफिस था। जिस कारण प्रिय और मुकेश घर पर ही रुकने वाले थे। इसलिए नंदनी और मयूर का ही जाना तय हुआ।
नंदनी और मयूर को बस में बैठा, मुकेश वाही से अपने दफ्तर चले गए। मयूर के मामा का घर दूसरे शहर में था। जहां पहुँचने के लिए 6 घंटे का सफ़र करना पढ़ता था। मामाजी के गाँव पहुँचते ही मयूर ने बस से ही, अपने मामा मदन को देख, बस में ही बैठे बैठे, ज़ोर से आवाज़ लगाई। जो पहले से ही बस स्टॉप पे उनका इंतज़ार कर रहे थे। बस आते हुए देख, मयूर की आवाज़ सुन, हवा में हाथ का इशारा कर, बस के पास जा पहुंचा। अपने भांजे और बहन को इतने दिनों बाद देख, मदन बहुत खुश था। अपनी बड़ी बहन नंदनी का आशीर्वाद ले और मयूर को गोद में उठा, उसे दुलारने लगा। मदन ने सामान गाड़ी में रखा और सब घर की तरफ चला पड़े। मदन नंदनी का छोटा भाई था, अभी दो साल पहले ही उसकी शादी हुई थी। मदन को अपने भांजे मयूर से बड़ा स्नेह था। रास्ते भर मदन और मयूर, नंदनी को भूल आपस में ही बाते करते रहे।
घर की तरफ जाते वक़्त मदन ने, आखिरी चौराहे से जब गाड़ी जब घर की ओर मोड़ी तो हल्की हल्की सी एक कुत्ते की भोंकने की आवाज़ आने लगी। जैसे जैसे घर करीब आने लगा आवाज़ तेज होने लगी। सामने देखने पर, मयूर को एक कुत्ता छत पे बैठे बंदरों को देख भोंकता हुआ नज़र आया। पूछने पर मदन ने बताया की कुत्ता पड़ोस वाले अंकल का है। पालतू और एक्सपर्ट ट्रेनर से ट्रेन होने की वजह से वो इंसानों की बहुत सी बाते समझ जाता है और चीजों पे रेस्पोंसे भी किया करता है। आजकल इलाके में चोरी की वारदात बढ़ने की वजह से अंकल उसे बहार छोड़ने लगे है। ताकि अंजान इंसान को, गली में पालतू कुत्ते की मौजूदगी से थोड़ा डर बना रहे। अंकलजी उसे रात में भी घर के बहार, चैन से बांध कर रखने लगे है। ताकि रात के समय किसी अंजान इंसान की किसी भी तरह की बेवजह की हरकत को देख भोंकने से गली के लोग भी सतर्क हो जाये और चोरों को भी डर बना रहे।
मदन, नंदनी और मयूर को घर छोड़ने के बाद ऑफिस के लिए निकलने लगा। उसके पीछे पीछे मयूर भी उसे गेट तक छोड़ने चला आया। मयूर ने अपने मामा को बाय किया और गेट बंद कर घर के अन्दर जाने को मुड़ा ही था, की वही कुत्ता गेट के पास आ के मयूर को देख भोंकने लगा। उसके भोंकने की इस आवाज़ में उस आवाज़ की तुलना में काफी फर्क था, जो वो बन्दर को देख कर घुर्रा रहा था। लग रहा था जैसे वो मयूर से बात कर रहा हो। उसकी आवाज़ सुन पहले तो मयूर थोड़ा डर सा गया और पीछे होने लगा, लेकिन पल भर बाद मयूर भी समाज गया था की वो उसे डराना नहीं चाहता है।
मयूर थोड़ा आगे बड़ा और उसे पुचकारने लगा, कुत्ता भी रेस्पोंसे करते हुए, अपनी पूछ हिलाने लगा। बड़ी हिम्मत दिखाते हुए मयूर ने उसके सर पर हाथ लगा, उसे सहलाने की कोशिश की, लेकिन एकदम से कुत्ता थोड़ा हिचकिचाते हुए थोड़ा पीछे हटा, जिसपर मयूर ने भी हाथ पीछे खींच लिया। मयूर घर में जा, मामी से कुत्ते को देने के लिए एक रोटी लेकर आया। मयूर के वापस बहार आने तक, कुत्ता वही खड़ा रहा, गया नहीं, मानो उसे मालूम हो की मयूर उसके लिए कुछ लेन गया है। रोटी देने का इशारा कर वो दोबारा कुत्ते को अपनी तरफ बुलाने लगा। रोटी देख कुत्ता पूछ हिलाते हुए मयूर की ओर बढ़ गया। मयूर उसके सर पे हाथ सहलाते हुए उसे रोटी खिलने लगा। यही और इसी पल से एक अनजाने से रिश्ते की शुरुवात होने लगी थी, दोनों के बीच । अब तो जब भी वहाँ कुत्ता घर से बहार निकलता वो मयूर के गेट के पास अह खड़े हो जाता और गेट की तरफ देख भोंकने लगाता। मयूर उसका इशारा समझ जाता और उसके लिए रोटी लेकर बहार आ जाता।
कुछ ही दिनों में दोनों एक दूसरे के इशारे को समझने लगे थे। एक दुआरे के साथ ज्यादा समाया बिताने लगे थे। कुछ दिन पहले एक दूसरे के लिए बिलकुल अजनबी। अचानक से एक अपनापन सा बनने लगा था दोनों के बीच । साथ खेलना गली में घूमना, दौड़ लगना, रोज का माहौल बन चूका था, दोनों का। दोनों एक दूसरे के साथ काफी कम्फरटेबल नज़र आया करते थे। मयूर को अपने मामाजी के घर एक अच्छा साथी मिल गया था। जिस के साथ उसका ज्यादा तर समय गुज़रता था।
इस दौरान एक महीना कैसे बीत गया पता ही नहीं चला और मयूर का अपने घर वापस लौटने का समय आ गया। कुत्ते से लगाव के कारण, घर जाने वाले दिन मयूर उदास था। रोज़ की तरह आज भी कुत्ता गेट के पास आ मयूर को अपने ही अंदाज़ में बुलाने लगा। उसकी आवाज़ सुनते ही मयूर रोटी ले घर से बहार चला आया। कुत्ते को रोटी खिला वो उसे पुचकारने लगा। मामाजी भी सामान गाड़ी में रखने लगे, इतने में मयूर की माँ नंदनी और उसकी मामी भी बहार आ गए और माँ ने मयूर को गाड़ी में बैठने को कहा। आज मयूर के वापस घर जाने का दिन था। अपने दोस्त को अलविदा कहने का दिन था।
मयूर की आंखें नम थी। उसने कुत्ते को गले लगाया और हाथ फेरते हुए, उसे अगली छुट्टियों में दोबारा मिलने की बात कर गाड़ी को ओर बढ़ने लगा। कुत्ते को पहले तो समझ नहीं आया की आज मयूर उसके साथ खेल क्यों नहीं रहा है। लेकिन जब उसने मयूर को गाड़ी में बैठते देखा, तो मानो वो समझ गाय, की मयूर कही जा रहा है क्यों की इस ही गाड़ी से, अपनी गली ,आते हुए देखा था उसने पहेली बार उसने मयूर को। वो फ़ौरन मयूर की ओर बढ़ , गाड़ी के दरवाजे के सामने आ खड़ा, हो गया और मयूर के पैरो पे अपने जिस्म को सहलाने लगा, जैसे वो उसे जाने से रोख रहा हो। मयूर उसके पास बैठ उसे गले लगा रोने लगा, क्यों की वो भी उस से बिछड़ने से दुखी था। दोनों के बीच एक अंजान सा दोस्ती का रिश्ता जो बन गया था। वहाँ खड़े सभी दोनों को देख भावुक हो गए।
मयूर की माँ ने मयूर के सर पर हाथ रख उसे शांत होने और गाड़ी में बैठने को कहा। दुखी मन से माँ की बात मानते हुए मयूर गाड़ी में बैठ गया। मयूर को गाड़ी में बैठा देख कुत्ता इधर उधर, गाड़ी के आगे पीछे दौड़ने लगा। अपने पंजों से गाड़ी के दरवाज़े को मरने लगा, हड़बड़ाने लगा। मानो वो मयूर को जाने नहीं देना चाहता हो, अपने दोस्त को रोकना चाहता हो। मयूर के घर वाले कुत्ते की यह सब हरकत समझ नहीं पा रहे थे पर मयूर सब बखूबी समझ रहा था। वो भी तो अलग नहीं होना चाहत था अपने दोस्त से। लेकिन वो भी बेचारा लाचार था। कुछ कर भी तो नहीं सकता था।
कुत्ते के बार-बार गाड़ी के सामना आने के कारण मदन गाड़ी आगे नहीं बड़ा पा रहा था। गाड़ी से उतर मदन ने कुत्ते को हटाने की बहुत कोशिश की, कोई हल न निकलता देख और बस का समय भी होता देख, मदन ने पड़ोस वाले अंकल जी को आवाज़ लगा उन्हें कुत्ते को पकड़ने को कहा। अंकल जी, अपने कुत्ते के बारे में मदन से उसकी हरकतों की बात सुन पहेले तो थोड़ा हैरान हो गए क्यों इससे पहले तो उसने कभी किसी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया था। लेकिन मयूर के आँखों की नमी और उसकी एकटक उनके कुत्ते से ना हटती हुई नज़र और कुत्ते का बार बार मयूर की ओर इशारे ने, दोनों की दोस्ती की दस्ता उन्हें समझा दिया।
अंकल जी ने अपने चेहरे पे हल्की सी मुस्कान लिए, कुत्ते को पकड़, उसके पास बैठ, मयूर की तरफ देखते हुए अपने कुत्ते को पैर से, मयूर को अलविदा करने का इशारा किया। जिस पर दोनों दोस्तों ने, दोबारा मिलने की उम्मीद में, ना चाहते हुए भी एक दूसरे को, दुखी मन से, अलविदा कहा दिया। मोड़ के आखिरी छोड़ तक दोनों एक दूसरे को ही देखते रहे। आंखें तो दोनों की नम थी। एक मासूम सी दोस्ती का रिश्ता दोनों ओर से जो बन चूका था।
