Prabodh Govil

Tragedy


4.3  

Prabodh Govil

Tragedy


सुड़ौली

सुड़ौली

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क्या नाम है तुम्हारा ? मैंने पूछा।

सुडौली ! उसने चहकते हुए कहा। कहते हुए उसके चमकीले पीले मुख पर लाल बिंदी और झिलमिला गई।

वॉट ए लवली नेम ! कितना अच्छा नाम है ! किसने रखा ये नाम ? ज़ाहिर है तुम्हारे देश में तो किसी ने रखा नहीं होगा। क्या वहां भी ऐसे नाम होते हैं ? मैंने आत्मीयता से कहा।

नहीं,मेरे देश में नहीं, ये नाम मुझे भारत में मिला। उसने दृढ़ता से कहा।

किसने रखा ? मैं जैसे उससे बातचीत जारी रखने के लिए बोला।

मैंने खुद ने ! उसने अपार आत्मविश्वास दिखाया।

ओह !

क्यों ? क्या यह अच्छा नहीं है ? अच्छा, वैसे क्या मतलब होता है इसका ? वह मुझसे ही पूछ रही थी।

अरे, तुम्हें इसका अर्थ भी नहीं पता ? फ़िर तुमने कैसे रख लिया ? मैंने आश्चर्य से कहा।

मेरे पति ने पहली बार मुझे यही पुकारा था। कहते हुए उसके चेहरे पर और भी लाली अा गई।

निश्चय ही तुम्हारे हसबैंड ने तुम्हें बेहद प्यारा नाम दिया। इसका मतलब होता है, सुडौल कन्या, अर्थात अच्छे फिगर वाली लड़की। कहते हुए मैंने उड़ती सी नज़र उसके बदन पर डाली।

सच ? बहुत अच्छा है ये। उसने चहकते हुए कहा।

क्या? मैं जैसे कहीं खोया हुआ था।

मेरे नाम का अर्थ ! ये पुकारने में भी अच्छा है। आज से पहले न किसी ने मुझसे पूछा,न मैंने बताया,और न ही किसी और ने मुझे बताया। इसपर बात ही नहीं हुई कभी। वैसे मेरे एक मित्र ने कभी बताया था कि सुडौल का अर्थ होता है, प्यारी गुड़िया। कह कर वह किसी संकोच की परत में छिप गई।

तुम्हारा नाम सतरंगी है। मैंने मानो फ़िर कोई तार छेड़ा।

मुझे केवल इसका एक रंग ही मालूम है कि मेरे पति ने पहली बार मुझसे यही लफ्ज़ कहा था। वह संभल कर बोली।

सुडौल का अर्थ है पर्सन ऑर थिंग ऑफ गुड शेप। अच्छे आकार वाली। तुम हिंदी तो बहुत अच्छी...

मैं अच्छी तरह हिंदी जानती हूं। मैं पिछले अठारह साल से भारत में हूं। उसने बीच में ही कहा।

निस्संदेह, वो तो मैं देख ही रहा हूं कि तुम धाराप्रवाह बोल रही हो। सिर्फ़ भाषा ही नहीं, तुमतो हर तरह से भारतीय ही दिख रही हो। मैं बोला।

-मैं शादी से पहले भी सात साल से भारत में आ रही थी। उसने बताया।

अच्छा... मेरे मुंह से निकला। वह गिफ्टशॉप पर मेरा ख़रीदा हुआ उपहार अब अच्छी तरह से पैक कर चुकी थी और अपेक्षाकृत फुरसत में दिख रही थी। मुझे उसकी कही गई बात याद आने लगी-

... मनुष्य में आत्मा नहीं होती, ब्रह्मांड के हर अन्य जीव की अपनी एक आत्मा होती है जो उसकी अपनी प्रकृति होती है।किन्तु मनुष्य योनि में जन्म देने से पूर्व प्रकृति कोई भी एक आत्मा मनुष्य के जिस्म में डाल देती है।वह आत्मा किसी भी जीव की हो सकती है।वह जिसकी होती है,मनुष्य जीवनभर उस जीव की स्वभावगत गिरफ्त में रहता है। और उसी के अनुसार आचरण करता है।

सुडौली के मुंह से ये सब सुनना अद्भुत था। वह बोलती हुई सलौनी लग रही थी, इसीलिए मैं उसके किसी भी तर्क या सिद्धांत का प्रतिरोध नहीं कर सका। उसकी मुखरता आश्चर्यजनक थी। वस्तुतः वह मेधावी थी।

वैसे जो वह कह रही थी उसमें विवाद की काफ़ी गुंजाइश थी, किंतु उसकी बात पूर्णतः असत्य भी तो नहीं थी,कोई मनुष्य बर्ताव में शेर जैसा भी होता ही है,वह दूसरे के शिकार किए गए प्राणी का मांस नहीं खाता।उसे अपने लिए औरों से सबकुछ ज़्यादा पाने की दरकार होती ही है। कुत्ते से स्वामिभक्त, गीदड़ से डरपोक, लोमड़ी से चालाक होते ही हैं।

सुडौली का वास्तविक नाम जेनिन था। वह ओस्लो से आई थी। वहां वह "मनुष्य में आत्मा नहीं होती" इस सिद्धांत पर शोधरत थी। उसे कहा गया था कि वह ऐसे देशों में जाए जहां विविध संस्कृतियां एक साथ निवास करती हों और तब वह भारत पहली बार आई थी।

उसने पढ़ा था कि सबसे ज्यादा भाषाओं, संस्कृतियों, व्यंजनों और पोशाकों वाले देशों में भारत एक है।

भारत उसे भाया। संयोग ने अपनी भूमिका सही वक़्त पर निभाई और ओस्लो की जेनिन भारत की होकर रह गई।

उसका अपना देश भी छूट गया और पढ़ाई भी। भारत के मरुस्थल कहे जाने वाले राजस्थान के एक छोटे से धार्मिक कस्बे पुष्कर ने जेनिन को सुडौली बना दिया।

यह विचित्र था। पावन और प्यार भरा। जिज्ञासु प्रवृत्ति की वह परदेसी युवती यहां एक युवक के प्रेम में पड़ गई और उससे विवाह कर हमेशा के लिए यहीं बस गई।

संस्कृति, संस्कार और संस्मरण सब सागर की लहरों की तरह किनारों पर टक्कर मार कर लौट गए। नई दुनिया बस गई।

अच्छा सुडौली, ये बताओ कि तुम्हारे विवाह में यहां तुम्हारा और कौन था ? कैसे हुआ सब ? मैंने अपना कौतूहल जारी रखा।

मेरा अपना तो यही मेरा पति था। ये एक छोटी सी दुकान चलाता था। शादी का निर्णय मेरा अपना था। मेरे परिवार ने इस मामले में कोई दख़ल कभी नहीं दिया। हां, विवाह के मौके पर जब मेरे पति के सारे घरवाले मौजूद थे, तब एक बार मेरे मन में भी आया था कि काश, मेरा भी कोई परिजन यहां होता।

मुझे ये बहुत अच्छा लगा था कि यहां भारत में विवाह के अवसर पर सभी घरवाले इकट्ठे होते हैं, मेरे देश में ऐसा नहीं होता। आप एक दो दोस्तों के साथ, या केवल जीवनसाथी के साथ जाकर विवाहबद्ध हो सकते हैं। मेरे देश के लोग आते तो मैं उन्हें यहां की ये अद्भुत परंपरा दिखाती। कहती हुई वो मानो अपने गुज़रे दिनों में खो गई।

तुम्हें इतनी अच्छी हिंदी यहां किसने सिखाई ? मैंने कहा।

यहां सूर्य मंदिर में एक महंत हैं, उनकी बहू ने। वह मेरी सहेली है। वैसे एक बात बताऊं, मेरे पति की हिंदी भी ज़्यादा अच्छी नहीं है, वे तो राजस्थानी बोलते हैं, लोकल लैंग्वेज। वो बोली।

फ़िर तुम्हारे बीच बातचीत किस तरह हुई ? मुझे जिज्ञासा हुई।

मुझे नहीं मालूम, लेकिन इससे मिलने के बाद जल्दी ही मुझे लगने लगा कि इस पराए शहर में यह युवक जो मेरी सहायता करता है, मेरे लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखता है, बहुत अलग है। मुझे लगा कि यह पूरा भी है,एक मुकम्मल इंसान। वह भीग सी गई।

तो इस मुकम्मल इंसान के इर्द गिर्द तुम्हारी ज़िन्दगी उसी तरह लहरा कर परवान चढ़ गई, जिस तरह प्राकृतिक रूप से वन में कोई लता पेड़ का आसरा ले लेती है ! मैंने उसे कुरेदा।

मेरे पति कहते हैं,मैंने उन्हें आसरा दिया है। वह कुछ शरमाते हुए बोली।

ओह, दैट्स वंडरफुल। तो तुम बहुत खुश हो ? मैंने कहा।

जो हो, मैं उसी को खुशी मानने की कायल हूं। हमें ये कौन सिखाता है कि क्या दुःख है और क्या ख़ुशी। हम अपने मन से ही तो जानते हैं। और अपने मन पर अपना नियंत्रण हो तो हम उस किसी भी स्थिति में ख़ुश रहने के लिए तैयार कर सकते हैं। उसने किसी दार्शनिक की तरह कहा।

तुम एक बात बताओ, तुम एक स्कॉलर रही हो, और इतने सुन्दर विषय पर रिसर्च कर रही थीं, यह सब छूट जाने का दुख नहीं होता ? मैंने मानो उसे कुछ और कुरेदा।

हर रास्ता किसी न किसी मुकाम पर पहुंचता ही है, गंतव्य बहुत दूर का हो, ये क्या ज़रूरी है ? मार्ग के समीप कभी छायादार पेड़ मिल जाए तो वहां ठहर कर भी पथिक मंज़िल सा ही आनंद पा सकता है। उसका सन्तोष दिप दिपा रहा था।

अब भी जुड़ी हो लिखने पढ़ने से ? मैंने कहा।

मुझे अच्छा लगता है,लेकिन ज़्यादा वक़्त नहीं मिल पाता। पति की ये दुकान अब काफ़ी समय से मैं ही देखती हूं। वे यहां के लिए सामान खरीदने और बनवाने के लिए बाहर आते जाते रहते हैं। वो बोली।

तुम नहीं जाती हो घूमने ? मैं जैसे वार्तालाप खत्म करना भूल सा गया।

वो बोली- ये शहर अजीब फितरत रखता है। यहां इतनी आस्थाओं के लोग आते जाते रहते हैं कि यहां रहते हुए जगह जगह जाते रहने का अहसास हो जाता है। वैसे हम लोग बहुत घूमे हैं, घूमना मुझे भी पसंद है और मेरे पति को भी।

सुडौली की एक एक बात से जीवन के प्रति गहरा अनुराग और तृप्ति झलक रहे थे। मैं पैसे देकर एक हल्के अभिवादन के साथ उससे रुखसत हुआ। किंतु उसने बड़ी गर्मजोशी से मुझे हाथ जोड़ कर प्रत्युत्तर दिया। मेरे निकलने के साथ ही वह किसी दूसरे कस्टमर से मुखातिब हुई।

मैं जब भी उधर उसकी शॉप से गुजरता, उससे दुआ सलाम होता।

वह भी उमंगकर अभिवादन करती।

एक बार ऐसा संयोग हुआ कि मुझे उसका पति ही दुकान पर मिला। मुझे कुछ लेना भी था, मैं एक अदृश्य आकर्षण में बंधा उस तक पहुंच गया।

उसे शायद हैरानी हो रही थी कि मैं उससे इतनी आत्मीयता और परिचय भावना से क्यों पेश आ रहा हूं ! मेरी इकतरफा आत्मीयता ने आख़िर उसे भी मेरी बातों का उत्तर सजगता से देने पर बाध्य कर दिया।

वह गंभीर, आत्म केन्द्रित, निश्चल सा युवक था। उतना ही कहता था जो मेरे किसी भी प्रश्न का संक्षिप्ततम किन्तु पूर्ण उत्तर हो।

मेरा हौसला बढ़ा,और मैंने कुछ प्रश्न उनके पारिवारिक जीवन पर कर डाले। उसे कुछ हैरानी तो हुई लेकिन ये भान भी हो गया कि मैं उसकी पत्नी से परिचित हूं। इस बात को उसने किसी अचरज से कतई नहीं लिया।

परदेसी पत्नी का वह निपट स्थानीय पति मन से गहरा और मानसिकता से फ़ैला हुआ इंसान था। लेकिन अपनी पत्नी से प्रथम परिचय से संबंधित प्रश्न को वह किसी संकोची किशोर लड़के की भांति टाल गया।

उसे ये शायद याद भी नहीं था कि उसकी विदेशी पत्नी का नाम सुडौली उसने रखा था।

दिन बीतते रहे। मेरा कौतूहल भी तिरोहित होता गया। सब सामान्य लगने लगा। धीरे धीरे ये भी आम बात हो गई कि पुष्कर में विदेशी युवक युवतियों की बसावट सहज रूप से होने लगी।

एक शाम, गोधूलि का समय।

खासा झुटपुटा हो चला था। मैं अपने स्कूटर से पास के एक गांव से लौट रहा था। बूढ़े पुष्कर के पास, मैंने देखा, एक छोटी सी बच्ची, उम्र रही होगी कोई आठ नौ साल। बार बार ज़मीन से उठा कर एक दिशा में पत्थर फ़ेंक रही थी। उसकी आंखों में आंसू थे।

हाथ पैरों पर मिट्टी लगी हुई थी।आसपास कोई न था। ऐसा लगता था जैसे कोई जंगली जानवर इधर से गुज़र कर वहां उसके पास से निकला हो। वह डरी हुई थी। बार बार अपनी छाती के पास दबा दबा कर अंगुलियों से छूकर अपने फ्रॉक के उस हिस्से को सहला रही थी जो थोड़ा फट गया था।

मैंने स्कूटर रोक कर बहुत पूछा, पर उसने कुछ न बताया। केवल मैं इतना जान पाया कि उससे तीन चार साल बड़ा एक देहाती किशोर लड़का उसे तंग कर रहा था। बार बार उसके गले के पास से उसके कपड़े को खींचता उसे अपने से सटाने की कोशिश कर रहा था। स्कूटर दूर से आता देख कर वह अपनी सायकिल चलाता सरपट भाग लिया।

वह क्या कह रहा था, इस प्रश्न का उत्तर अनेक बार पूछने पर भी लड़की ने नहीं दिया। केवल इतना पता लगा कि वह देहाती लड़का उससे परिचित नहीं था।

इतनी सी उम्र में सड़क छाप शोहदों सा लंपट वह लड़का उमर के साथ समाज के जंगल में खतरनाक झाड़ बनकर उग रहा था।

मैंने ज़्यादा कुछ पूछ कर लड़की के ज़मीर को आहत करना उचित नहीं समझा, और उसे उसके बताए स्थान पर स्कूटर से छोड़ कर मैं घर की ओर चल दिया।

घर पहुंचने से पहले कल के एक समारोह के लिए सुडौली की दुकान से एक गिफ्ट भी मैंने ख़रीदा। वही भीगी फुहार सी आत्मीय दुआ सलाम भी हुई।

घर पहुंचा तो बाहर ही एक अजीब सा नज़ारा देखा।

पड़ौस में काम करने वाली एक औरत अपने चौदह पंद्रह साल के लड़के को लकड़ी की संटी से मार रही थी।

लड़का पूरी ढिठाई से दोनों कोहनियां सिर के दोनों ओर कर के वार सह रहा था। उसकी मां कुछ बुदबुदा रही थी। शायद उसे किसी से लड़के की कोई शिकायत मिली थी।

वह दोहरा दोहरा कर वार पर वार करते हुए कहती जा रही थी नीच, हरामी,जानवर... अत्ती सी छोरी ने कह रियो छै...मेर्अ साग्अ सोवली ?

(... इतनी सी लड़की से कह रहा है... मेरे साथ सोयेगी )

मुझे जैसे कोई करेंट सा लगा... मैं मन ही मन ये सोचता हुआ स्कूटर अहाते में खड़ा करने लगा कि गिफ्ट शॉप के उस मालिक को याद तक नहीं कि उसने अपनी विदेशी पत्नी का नाम कब रख दिया !


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