Vineeta Pathak

Inspirational

4.3  

Vineeta Pathak

Inspirational

सपने जो सोने न दे

सपने जो सोने न दे

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जून का महीना। दोपहर का समय।आसमान से जैसे आग बरस रही थी। ऊपर से करोना का कहर। सड़कें सुनसान पड़ी थीं। इक्का दुक्का कार की आवाज़ आ जाती बस। मेरे पति सरकारी अधिकारी थे, तो हम लोग भी सरकारी आवास में ही रहते थे। अलग- अलग विभागों के उच्च अधिकारी यहाँ निवास करते थे, आपस का मिलना जुलना कम ही हो पाता था। मैं अपने आप को घर के कार्यों में व्यस्त रखती थी इससे मुझे बहुत से फायदे भी थे, कामवाली बाई की जरूरत नहीं होती थी अपने हिसाब से साफ सफाई करती थी, जिम वगैरह कभी जाने की ज़रूरत नहीं पडी़,समय अच्छे से निकलता था, आस पड़ोस की राजनीति से बची रहती थी। दोपहर के समय जब अकेली होती हूँ तो सिलाई, बुनाई या फिर कुछ लिखने का काम करती हूँ।

आज न जाने किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था। सोचा चलो अपनों से फोन पर बात ही कर लेती हूँ। फोन नंबर खोजने लगी तो मुझे अचानक गायत्री का नंबर मिल गया। मैंने तुरंत उसे फोन लगाया। गायत्री ने फोन उठाया और उलाहना देते हुए बोली, "बड़ी जल्दी याद आ गई मेरी ?"फिर बोली सुन यार अभी ज़रा व्यस्त हूँ आधे घंटे बाद फोन लगाती हूँ फिर बताऊँगी सब, कह कर उसने फोन रख दिया।

 गायत्री मेरी सबसे प्रिय सहेली। सातवीं कक्षा से इंजीनियरिंग तक हम साथ पढ़े। उसके बाद नौकरी के चक्कर में हम अलग अलग हो गए पर फोन और पत्र के माध्यम से हम जुड़े रहे। बस क्या था यादों के झरोखे एक एक कर खुलते चले गए। मैं सातवीं कक्षा में थी।पिताजी का तबादला इस शहर में हुआ था, कक्षा में मैं नई थी। एक कोने में बैठी हुई थी सहमी सी अकेली अपरिचितों की आँखों का निशाना बनी, बहुत ही ज्यादा असहज महसूस कर रही थी तभी खाने की छुट्टी हुई तो यही गायत्री, दुबली सी, गेहुँआ रंग, बडी़ बड़ी आँखें,चेहरे पर आत्मीयता का भाव,मेरे पास आई और बोली, "क्या नाम है तुम्हारा?"मैंने कहा, कविता। उसने पूछा टिफिन लाई हो ? मैंने कहा, हाँ। वह बोली,चलो फिर साथ में खाते हैं। यह थी हमारी पहली मुलाकात।

                 धीरे धीरे हम एक दूसरे के करीब आते गए। एक एक कक्षा उत्तीर्ण करते गए। बात ग्यारहवीं की है, हम दोनों कक्षा में साथ साथ बैठते थे। गणित और भौतिकशास्त्र विषय में वह माहिर थी चुटकियों में कठिन से कठिन सूत्र सुलझा लेती। मैं जीवविज्ञान और रसायन शास्त्र में अच्छी थी। उन दिनों ट्यूशन लेना आसान नहीं था ना ही हम दोनों के परिवार से शाला के बाद कहीं और जाने की अनुमति तो हम दोनों शाला में समय मिलने पर अपनी अपनी कठिनाइयों को एक दूसरे की सहायता से सुलझाते। एक दिन हम दोनों अपनी कक्षा की कुछ और लड़कियों के साथ बैठे थे तभी बात निकली कि कौन कैसे सपने देखता है? किसी ने कहा कि फलाने अभिनेता से उसका विवाह हो जाए, किसी ने कहा कि कलेक्टर की पत्नी बनकर ऐश करूँ तो किसी को दुनिया घूमनी थी। किसी ने कहा मेरा सपना है इस खड़ूस प्रिंसिपल को सबक सिखाऊँ। सब ठहाके मार मार के, हँस हँस कर लोटपोट हो रहे थे,गायत्री चुप बैठी थी, सबने कहा गायत्री तू भी तो बता अपना सपना। बिना किसी हिचकिचाहट के उसने कहा," मैं नहीं देखती तुम लोगों जैसे सपने, मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते। मुझे अपने सपने पूरे करने हैं।" यह कहकर वह वहाँ से चली गई। माहौल एकदम बदल गया। मैं उसके पीछे पीछे गई। उसकी आँखों में आँसू भरे थे, मुझे समझ ही नहीं आया कि अचानक इसे हुआ क्या। मैंने कहा देख अगर तू मुझपर विश्वास करती है तो सच बता। उसने कहा अभी नहीं फिर कभी, पर बताऊँगी ज़रूर।

                    हम सब बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा की तैयारी में लग गए। हमारे घर पास पास थे। अब हम दोनो को अपने अपने परिवारों से साथ पढ़ने की अनुमति भी मिल गई थी। हम एक दूसरे के घर पढ़ने के लिए जाते रहते थे। अक् र जब भी मैं उसके घर जाती वह घर के किसी न किसी काम में व्यस्त रहती। मैंने उससे कहा अपनी मम्मी को बोल न परीक्षा के समय तुझसे काम न करवाएँ। जवाब में वह बस मुस्कुरा देती।

                घर में उससे बड़े दो भाई और एक छोटी बहन थी। दोनों भाई पढ़ने में ठीक ठीक ही थे। ये तो मेधावी थी ही छोटी बहन भी बहुत होशियार थी। स्वभाव में दोनो बिलकुल अलग। गायत्री जितनी अंतर्मुखी उसकी छोटी बहन सुरभी उतनी ही बहिर्मुखी, चंचल, मस्त। मम्मी डाँटती रहती उसे कोई असर नहीं। बदतमीज़ बिलकुल भी नहीं थी पर गायत्री जैसी संवेदनशील तो बिलकुल नहीं। गायत्री से तो कोई अगर ऊँची आवाज़ में बात करता तो वह सहम सी जाती।

 बोर्ड की परीक्षाएँ समाप्त हुईं, अब हमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी थी। मुझे अहसास हुआ कि गायत्री प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवश्यक पुस्तकें खरीद नहीं पा रही है। पिताजी ने कुछ सेकेंडहेंड कुछ नई पुस्तकों की व्यवस्था मेरे लिए कर दी थी। जब वे किताबें आईं तो मैंने गायत्री को बुलाकर वे पुस्तकें दिखाईं, एक क्षण को उसकी आँखें पुस्तकें देखकर चमकीं और दूसरे ही क्षण चेहरे पर बेबसी की लकीर खिंचते मैंने देखी। मैंने कुछ न समझने का नाटक करते हुए उससे कहा सुन गायत्री मेरे मन में एक योजना है। आधी किताबें तू रख आधी मैं रखती हूँ जब पढ़ लेंगे तो बदल लेंगे। वह स्वाभिमानी सुशने को तैयार नहीं, बड़ी मुश्किल से मैंने उसे समझाया मैं कोई अहसान नहीं कर रही हूँ। मैं एक बार में एक ही किताब पढ़ूँगी न? बड़ी मुश्किल से सही पर वह मान गई। पता नहीं उसके मन में क्या आया वह मेरी पढ़ाई को लेकर भी चिंतित रहती। मैंने कितना पढ़ा क्या नहीं पढ़ा, कुछ समझ में नहीं आता तो मुझे समझाने में जी जान लगा देती। जब हम इंजीनियरिंग की परीक्षा देकर आए तो वह कहने लगी हमरा एडमीशन एक ही काॅलेज में हो तो कितना अच्छा न?मैं हँस दी। मुझे पता था कि इसको तो कोई बहुत अच्छी जगह दाखिला मिलेगा मेरे तो जिस हिसाब से पेपर हुए हैं चयन में भी संशय है। खैर, अब हम बेसब्री से नतीजे की रस्ता देख रहे थे। कहते हैं न कि कभी कभी सरस्वती हमारी किसी इच्छा पर तथास्तु कहती हैं,ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ, हम दोनों को एक ही काॅलेज में प्रवेश मिला। हमको तो जैसे पंख लग गए।

                    दो दिन की छुट्टियाँ पड़ीं मैं और गायत्री साथ बैठे थे अचानक वह बोली, "तुझे याद है मैं उस दिन स्कूल में क्यों रोई थी? "आज बताती हूँ। मेरे पापा बहुत अच्छे पद पर सरकारी नौकरी कर रहे थे। उस रुतबेदार नौकरी के कारण एक बड़े सरकारी अफ़सर की सुन्दर लड़की से उनका विवाह हुआ। दो बेटे हुए, सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक पापा की आँखों में दिखना बंद हो गया। किस्मत से पापा के बाॅस बहुत अच्छे थे उनको जब ये पता चला तो वे एक दिन घर आए और पापा को समझाकर बोले आॅफिस में किसी को कुछ बताया तो नहीं ? पापा ने कहा नहीं। फिर वे बोले पुराने प्रिस्क्रिप्शन सब हटा दो। मैं मामूली सा चार्ज लगाकर तुमको सस्पेंड कर दूँगा। पापा बोले मैंने ज़िंदगी भर ईमानदारी से काम किया है आप क्या कह रहे हो। वे बोले देखो आदर्शों से पेट नहीं भरता है परिवार है तुम्हारा। उनका पालन पोषण कैसे होगा ? सस्पेंड रहोगे तो आधा वेतन तो मिलेगा वरना मेडिकली अनफिट के चलते हो सकता है नौकरी से हाथ धो बैठो। पापा को भी बात सही लगी और वे मान गए। उनकी मुसीबत यहाँ खत्म नहीं हुई। अंधेपन ने उनको तोड़दिया, चिड़चिड़े हो गए। रोज की चिडचिड़ और आर्थिक बदहाली माँ सहन न कर पाईं, मायके की संपन्नता के आगे पति का प्यार हार गया और वे अपने दोनों बच्चों को लेकर अपने मायके चली गईं। पापा के पड़ोसियों से पापा की दुर्दशा देखी न गई,उन्होंने पापा के लिए सुबह शाम खाना भेजना शुरू किया पापा ने इस शर्त पर कि वे इसका भुगतान करेंगे उनका खाना स्वीकार कर लिया। सह्रदय पड़ोसी की बेटी सरला, जो खाना लेकर आती वो पापा का घर व्यवस्थित कर देती। ये सहानुभूति, सह्रदयता कब प्यार में बदल गई दोनों को ही पता न चला।

        जीवन इतना आसान थोड़ी होता है जितना हम समझते हैं। पापा ने उस लड़की की सहमति से जब उसके पिता से बात की वे क्रोधित हो उठे, भला कौन अपनी लड़की की शादी अंधे व्यक्ति से करता। सरला का आना बंद, खाना भेजना बंद। सरला पूरे समय रोती रहती। एकदिन पापा लड़की के दरवाजेपर जाकर बैठ गए। शादी नहीं करोगे तो मैं यहीं जान दे दूँगा। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि सरला के पिता ने शादी के लिए हामी भर दी, शादी भी हो गई। कहते हैं न खुशी मन में होती है, जो घर एक के लिए नरक था वही दूसरी के लिए स्वर्ग बन गया। उस नवविवाहिता ने आते ही घर को खुशियों से भर दिया। उसके सुघड़ हाथों ने घर का पुराना वैभव वापस लाना शुरू कर दिया। आस पड़ोस के छोटे छोटे बच्चों की ट्यूशन करना, साड़ी में फाल लगाना जैसे काम करके आर्थिक हालात सम्हाल लिए। शादी के दो वर्ष बाद बेटी हुई उसका नाम उन्होंने रखा गायत्री ......यानि मैं। मैं तब चार माह की थी तभी अचानक ही एक चमत्कार हुआ पापा को अचानक दिखने लगा। मम्मी बताती हैं कि पापा बस मुझे और मम्मी को ही देखा करते। समय अच्छा था सस्पेंशन का कारण हल हो गया पापा फिर नौकरी में बाइज्जत बहाल हो गए। जब ये बात पापा की पहली पत्नी को पता चली तो उन्होंने वापस आने की ज़िद की। पापा ने मना कर दिया, तो बोलीं तुम्हारे लड़कों की पढ़ाई का खर्च भेजो। पापा ये बात मान गए। हर महीने उनको पैसा जाने लगा। फिर मेरी छोटी बहन हुई। अचानक एक दिन मेरी मम्मी, यानि सरला को दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसीं। तब मैं चौथी में थी। पापा तो जैसे टूट ही गए। एक दिन पापा की पहली पत्नी की खबर आई कि मैं वापस आना चाहती हूँ, बच्चों को खाना तो समय पर मिलेगा और तुम्हारी बेटियों को भी मैं अपना लूँगी। पापा भी थक गए थे जीवन से। वे मान गए। दो तीन महीने तो सब ठीक चला बाद में पता चला कि भाभियों के आने से स्थितियाँ बदल गई थीं। इसलिए वे यहाँ आई थीं। समझौता था। वे कभी हमें नहीं अपना पाईं। पापा की अनुपस्थिति में अक्सर ही हमें कोप का सामना करना पड़ता था। बहुत तक़लीफें देखीं मैंने और मेरी बहन ने। कहते कहते उसकी आँखें भर आईं। उफ्फ कितना सहती रही तुम और कभी किसी से कुछ कहा भी नहीं? मैंने कहा। क्या कहती? कह भी देती तो क्या ही बदलने वाला था? उसने जवाब दिया।

                  अब तक हम एक दूसरे के और करीब आ गए थे। गायत्री और हम एक दूसरे से सारी बातें साझा करते थे। गायत्री के पिता की उम्र ज्यादा तो नहीं थी पर जीवन के उतार चढ़ाव से वे थक चुके थे ऊपर से दोनों बेटियों की चिंता कि अगर उनको कुछ हो गया तो? वह चिंता इस बार सामने आ ही गई। इस बार छुट्टियों से जब गायत्री लौट कर आई तो बोली पापा कह रहे हैं कि मैंने एक एक लाख रूपए तुम्हारे और सुरभि के नाम से जमा करवा दिए हैं तुम लोग अपनी पसंद से शादी कर लो अब मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा, हो सके तो जल्दी कर लेना जिससे मैं सुकून से जा सकूँ। कितना दर्द भरा होगा उस पिता के मन में कितनी असहाय स्थिति रही होगी ये तो वे ही जानते होंगे। क्या पता बेटों और पत्नी का दबाव भी रहा होगा। इस बीच छोटी बहन का भी मेडिकल में चयन हो गया। गायत्री छुट्टियों में अपने घर कम ही जाती थी। क्या करती? कोई सुख तो था नहीं परिवार का।

         एक दिन गायत्री बोली मैंने अखबार में इश्तहार देखकर एक लड़का फाइनल किया है आज वो मुझसे मिलने आ रहा है तू भी चल न प्लीज़। मैं क्या कभी उसे मना कर सकती थी। नियत समय पर हम उस जगह पहुँचे जहाँ वह आनेवाला था। देखा महाशय वहाँ पहले से ही हाजिर थे। मैंने गायत्री को कुहनी मारी और कहा इतना उतावलापन।खैर हमारा परिचय हुआ। बातों से पता चला कि उसका चार साल का बेटा है और पहली पत्नी का दो वर्ष पहले देहावसान हो चुका है। मैं हतप्रभ रह गई। मैंने सोचा अब मुझे चलना चाहिए ताकि ये दोनों खुल कर बात कर सकें। मैं चली आई पर पूरे समय यही सोचती रही इस रूप संपन्न, मेधावी, सर्वगुणी को ऐसी क्या मजबूरी थी जो इस दुहाजू को चुन रही है। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैं बेसब्री से गायत्री का इंतज़ार करने लगी। रात आठ बजे वह लौटी, मैंने इंतज़ार नहीं किया उससे पूछा कि तुमने ऐसा लड़का क्यों चुना जो एक बच्चे का पिता है? एक से एक अच्छे लड़के मिलेंगे तुमको। वह मुस्कुराई और वहाँ से चली गई। मेरे मन में एक प्रश्न छोड़ कर।

              हमने ग्रेजुएशन कर लिया। नौकरी कर ली। हम अलग हो गए। इस बीच उसकी उसी लड़के से शादी हो गई जिससे मिलाने के लिए वह मुझे ले गई थी जो एक बच्चे का पिता था। उसकी शादी के लगभग छह वर्ष बाद मेरा कानपुर जाना हुआ पता चला गायत्री भी वहीं है। मैं आफिस का काम निपटाकर उसके घर गई। रात का खाना खाया। तभी उसके पति बोले तुम लोग बहुत दिनों बाद मिली हो जाओ छत में जाकर अच्छे से मेरी बुराई कर लो और हँस पड़े। मैं और गायत्री छत पर गए। मैंने उससे कहा तुझसे मुझे दो प्रश्न पूछने हैं और आज कोई बहाना नहीं चलेगा। वह हँसी और बोली पूछ, अपनी प्रिय सखी की इतनी इच्छा तो पूरी कर ही सकती हूँ। मैंने कहा कि सपने वाली बात जो तूने स्कूल में कही थी कि मेरा सपना मुझे सोने नहीं देता क्या था वह सपना? पूरा हुआ क्या? वह बोली हाँ, वह सपना था जीवन में कुछ कर दिखाने का, मुझे अपने को उस नरक से निकलकर आत्मनिर्भर बनना था। अब दूसरा प्रश्न भी पूछ ले, मैंने कहा तूने एक बच्चे के बाप को क्यों चुना? वह बोली, मैं दिखाना चाहती थी कि सौतेली माँ भी माँ ही होती है। मैं दुनिया को यशोदा माँ बनकर दिखाना चाहती थी। मैंने कहा वो तो तूने कर दिखाया। उसका चेहरा बुझ सा गया। बोली नहीं रे यहाँ मैं असफल हो गई। अंकित (उसके पति का बेटा )मुझे नहीं अपना पा रहा। उसकी नानी मौसी ने पता नहीं क्या कह दिया है वह मुझसे दूर दूर ही रहता है। क्या करूँ? कभी लगता है कि मेरा निर्णय शायद गलत था और वह फफक फफक कर रोने लगी। मैंने उसे समझाया देख सब अच्छा होगा। हिम्मत भर मत हारना। अभी वह छोटा है। समझदार हो जाएगा तो सब समझ जाएगा। मन छोटा मत करना। दूसरे दिन मैं वापस आ गई। पता नहीं अब क्या चल रहा होगा उसकी जिंदगी में? तभी फोन की घंटी बज उठी। देखा गायत्री का फोन था। बोली हाँ बोल कैसी है ? मैंने कहा अच्छी हूँ तू सुना, कहाँ व्यस्त है। वह बोली अरे मुंबई में अंकित ने घर खरीदा है बोल रहा है उद्घाटन तुम ही करोगी माँ। मान ही नहीं रहा। मैंने कहा अरे इतना बड़ा हो गया? वह बोली हाँ हाँ एक प्राइवेट कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट है भाई। बहुत समय निकल गया कविता अब हम बूढ़े हो गए। मैंने कहा अब तो तू खूब सोती होगी। वह बोली मतलब ? मैंने कहा, तेरे अधूरे सपने ही तो तेरे को सोने नहीं देते थे न ? आज उसकी हँसी की खनक सुनकर मन तृप्त हो गया। सपने जो पूरे हो गए मेरी उस प्यारी सी बालसखा के....सच ही तो कहा था उस मृगनयनी ने,"सपने ऐसे देखो जो सोने न दें।"


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