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सोच बदलेंगे देश बदलेगा

सोच बदलेंगे देश बदलेगा

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समाज में छिपी कुरीतियों से अगर लड़ना है तो पीढ़ी दर पीढ़ी सोच का बदलना बहुत आवश्यक है। बिना अपनी सोच को बदले हम अपने समाज को नहीं बदल सकते हैं, उन्नतिपूर्ण सोच हमारे परिवार को, हमारे समाज को बदलती है और जब हमारा समाज बदलता है तो हमारा देश भी बदलता है और आगे बढ़ता है।

वैसे तो बहुत सारी कुरीतियाँ मौजूद है हमारे देश के अंदर, पर एक कुरीति जो हमारे देश को आगे बढ़ने में रुकावट बन कर वर्षों से खड़ी है और धीरे-धीरे हमारे देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है, वो है, अपनों के बीच जात-पात और ऊँच-नीच का भेदभाव।

हमारे पूर्वज और बड़े समाज सेवी इन जात-पात, छूत-अछूत जैसे कुरीतियों से बहुत दिनों तक लड़े, १९वीं और २०वीं शताब्दी में बहुत समाज सेवियों ने अपना पूरा जीवन इन्हीं कुरीतियों से लड़ने में न्योछावर कर दिया। बहुत हद तक वो सफल भी रहे पर आज भी जाति के नाम पर हमारे देश में शोषण आम बात है और आज २१वीं सदी में भी हम इसी जात-पात जैसी कुरीति से लड़ रहे हैं।

२१वीं सदी में, जहाँ और बड़े देश टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर अपने आप को आर्थिक और सामाजिक तौर पर मज़बूत बना रहे हैं वहीं हम आज भी जात-पात जैसी कुरीति से लड़ने में ही अपना मूल्यवान समय नष्ट कर रहे हैं।

इसी ऊँच-नीच और जात-पात के भेदभाव का एहसास पहली बार मुझे पिछले वर्ष हुआ जब मैं अपनी दादी की तेरहवीं में अपने गाँव गया था। इस घटना से पहले मेरी आँखों ने इंसान का इंसान के द्वारा ऐसा अनादर कभी नहीं देखा था। हुआ यूँ कि जब मैं अपनी दादी की तेरहवीं में शामिल होने के लिए दिल्ली से अपने गाँव पहुँचा, तब घर के बड़े-बुज़ुर्ग सूची बना रहे थे, हर समाज के लोगों को तेरहवीं के भोज में शामिल करने के लिए। सूची में सभी समाज के लोगों का नाम था। सूची बन कर तैयार हो गई थी और उसमें करीब १२००-१३०० तक लोगों के नामों को लिखा गया था। बात हुई कि ऊँची जातियों के यहाँ कार्ड से इश्तिहार भिजवाया जाए और छोटी जातियों के यहाँ मौखिक रूप से बोल दिया जाए।

मैं भी वहीं बैठा हुआ था तो मैंने इस बात पर आपत्ति जताई और कहा कि सभी लोगों के यहाँ कार्ड से ही इश्तिहार भेजा जाए। मैं घर में छोटा था इसलिए मेरे बातों को सुनने के बाद मेरे दादाजी ने मुझसे कहा कि ये वर्षों से चला आ रहा है। हमारे पूर्वज भी यही किया करते थे। बड़ी जातियों के यहाँ कार्ड और छोटी जातियों को मौखिक तरीके से ही इश्तिहार भेजा जाता रहा है। ये बोल कर मुझे वहाँ शांत कर दिया गया, पर ये बात मेरे मन को कचोट रही थी अंदर हीं अंदर।

रात के खाने की भी तैयारी शुरू हो गई थी, हलवाई लोग खाना बना रहे थे। लोगों के खाने का इंतज़ाम घर की छत पर ही किया गया था। छत पर कुछ कुर्सी-टेबल भी लगाए गए थे बड़े लोगों के लिए। शाम के ६ बजने को आए थे और लोगों का आना शुरू हो गया था। गाँव के किसी सामाजिक कार्यक्रम में खाना परोसने के लिए अलग से लोगों को नहीं बुलाया जाता है बल्कि गाँव के कुछ नौजवान लोग ही इस काम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और आए हुए लोगों को खाना परोसते हैं, इसमें एक मैं भी था।

सबसे पहले पंगत में बैठे मेरे और दूसरे गाँव से आए हुए ब्राह्मण लोग। वर्षों से यही रीत चलती आ रही है कि बिन ब्राह्मण को भोग लगाए आपका कार्य सफल नहीं होगा। वैसे ये सब रीत अपने समय के मज़बूत लोगों के द्वारा बनाये गए थे जिसका आज के समय में कोई औचित्य नहीं है। उसी रीती-रिवाज़ के अनुसार ब्राह्मण लोग सबसे पहले पंगत में बैठे, उनके सामने पत्तल रखा गया और उसमें हम नौजवानों ने खाना परोसा। खाना परोस कर हम लोग ब्राह्मणों के खाने का इंतज़ार करने लगे, पर ब्राह्मण लोग चुप-चाप बैठे थे, हम लोगों को आश्चर्य हुआ। तभी एक बुज़ुर्ग ब्राह्मण ने कहा कि क्या आप लोगों को पता नहीं है कि हम लोग पहला भोग घर में रह रही अपनी-अपनी स्त्रियों के लिए ले जाते हैं और दूसरा भोग हम लोग खाते हैं।

ये सुनते ही मेरे मुँह से निकल गया कि अगर स्त्रियों को खाना है तो नीचे और समाज की स्त्रियाँ खाना खा रही हैं उनके साथ बैठ कर खा लें। मेरी बात सुनते ही ब्राह्मण गुस्सा हो गए और उठ कर जाने लगे, तभी मेरे दादाजी और पिताजी ने मुझे डांटा और दूसरे लड़के को दूसरा पत्तल ब्राह्मणों के सामने परोसने को कहा। दूसरा पत्तल परोसा गया और दूसरी बार खाना भी परोसा गया। पहली पत्तल में पड़े खाने को उन ब्राह्मणों ने अपनी गठरी में बाँध कर अलग रख दिया घर ले जाने के लिए।

ब्राह्मणों के खाना खा लेने के बाद दूसरी ऊँची जातियाँ खाना खाने आईं। गाँव में अभी भी सभी समाज के लोग एक साथ बैठकर किसी सामाजिक कार्यक्रम में खाना नहीं खाते हैं। सबसे पहले बड़ी जातियाँ उसके बाद उनसे छोटी, फिर नीची जातियाँ आती हैं खाना खाने। दूसरी ऊँची जातियों को भी खाना परोसा गया, सब लोग छत पर ही खाना खा रहे थे। रात के दस बजने को आए थे और अभी भी लोगों का आना कम नहीं हुआ था। तभी किसी ने मुझसे कहा की छोटी जातियाँ भी आ गई हैं और बाहर गाँव के रास्ते पर अपनी-अपनी प्लेट लिए खड़ी हैं। मैंने कहा अपनी-अपनी प्लेट लिए क्यों खड़े हैं वो लोग, और बाहर रास्ते पे क्यों खड़े हैं, उन लोगों को बोलो अंदर आ कर खड़े होने के लिए।

मेरे बगल में एक ऊँची जाति के मास्टरजी कुर्सी पर बैठे थे, मेरी बातों को सुनने के बाद वो मुस्कुरा कर बोले- बेटा, तुम शहर में रहते हो इसलिए शायद तुम्हें पता नहीं है कि छोटी जातियाँ घर के अंदर नहीं खाती हैं बल्कि घर के बाहर ही रास्ते पर खाती आ रही हैं वर्षों से।

मैं जब तक कुछ बोलता मास्टरजी ने कहा कि तुम लोग पूड़ी और सब्ज़ी का भगोना ले कर मेरे साथ बाहर चलो, उन लोगों को खाना खिला कर आते हैं।

मैंने कहा- मिठाई भी तो है।

मास्टरजी ने कहा- मिठाई की कोई ज़रुरत नहीं हैं, सिर्फ पूड़ी और सब्जी ले कर आओ।

मैं पूड़ी का भगोना ले कर आगे बढ़ा पर मुझे अंदर ही अंदर बहुत ख़राब महसूस हो रहा था कि ऐसा क्यों है हमारा समाज, जहाँ एक जाति को दो-दो बार खाना परोसा जाता है वहीं दूसरी जाति को एक बार भी भरपूर खाना नहीं मिलता है।

सोचते-सोचते मैं उन लोगों की थालियों में वो जितना माँगते धीरे-धीरे मैं उतनी पूड़ियाँ डाल रहा था।

मुझे धीरे-धीरे पूड़ी परोसते देख मास्टरजी ने मुझसे पूड़ी का भगोना ले लिया और बोले- ऐसे धीरे-धीरे नहीं बाँटा जाता है और उन्होंने कुछ दूरी से हीं सब की थालियों में पूड़ियाँ फेंकना शुरू कर दिया। कुछ पूड़ियाँ थाली में जाती कुछ ज़मीन पर मिट्टी में गिर जाती।

उनको भी वो लोग उठा कर अपनी-अपनी थालियों में डाल लेते। ये दृश्य देख मैं बिलकुल स्तब्ध हो गया था, मेरे मन को हज़ार सवालों ने जकड़ लिया था। मैं ये देख कर हैरान था की आज़ादी के ७० साल बाद भी हमारे देश में छूत-अछूत, जात-पात का भेद-भाव अभी भी अलग-अलग गाँवो में उसी अवस्था में बरक़रार है जैसे हमारे पूर्वजों के दिनों में था। मैंने किताबों में समानता, बराबरी के अधिकार के बारे में जो भी पढ़ा था वो सब मुझे अब किताबी बातें ही लग रहे थे।

समानता जैसे शब्द किताबों में मानों छोटी जातियों को चिढ़ाने के लिए लिखे गए हों। मुझसे इंसान का इंसान पर ऐसा अत्याचार और अपमान देखा नहीं गया और मैं दु:खी मन से वहाँ से अपने घर चला गया। मैं चुपचाप बिना खाना खाए अपने बिस्तर पे जा कर सो गया। अगले दिन सुबह जब घर के बड़े-बुज़ुर्ग बैठे हुए थे वहाँ मैंने रोटी फेंकने वाली बात का ज़िक्र किया और बोला की ये अच्छा नहीं है, हम ऐसे किसी मनुष्य को अपमानित नहीं कर सकते हैं, अपने घर बुला कर।

मेरे दादाजी फिर से मुझे पुरानी प्रथाओं का हवाला देने लगे और बोले- कि गाँव के समाज में ऐसे ही नीच जातियों को खाना दिया जाता है, वर्षों से लोग ऐसे ही खिला रहे हैं और वो लोग खा रहे हैं। मुझे दादाजी की बात पर गुस्सा आया, मैंने बोला जो होता आ रहा था अब उसे बदलना होगा और आगे के किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में छोटी जातियों को भी और जातियों की तरह ही खाना खिलाया जाएगा।

मेरी बात को मेरे पिताजी ने समझा और तीन वर्ष बाद मेरी चचेरी बहन की शादी में हम लोगों ने छोटी जातियों को अपने घर के आँगन में बैठा कर खाना खिलाया और वर्षों से चली आ रही प्रथा को तोड़ा। हमारी इस पहल से सभी समाज के लोग खुश नहीं थे, पर बहुत लोग थे जिन्होंने हमारी इस सोच का सम्मान किया। गाँव के दूसरे लोगों ने भी हमारी सोच से प्रेरित होकर अपने कार्यक्रमों में छोटी जातियों को अपने घर में बैठा कर खाना खिलाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इस सोच को पूरी पंचायत ने अपना लिया।

मैं बहुत खुश था कि मेरी एक सोच ने समाज की सोच को बदल दिया। जात-पात, छूत-अछूत का भेदभाव हमारे देश से कब का खत्म हो जाना चाहिए था पर दुर्भाग्यवश ये अभी भी हमारे देश में मौजूद है। भगवान ने तो सिर्फ इंसान बनाया और कुछ समृद्ध लोगों ने अपने फायदे और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अलग-अलग जाति में इंसानो को बाँट दिया। अलग-अलग जातियों में बाँट कर समृद्ध लोगों ने खुद को ऊँचा बना दिया और दूसरे इंसानों को नीच बना दिया।

नीच बनाकर उन इंसानों पर वर्षों अत्याचार किया, उनको अपमानित किया और समाज से अलग कर दिया। जो समाज से अलग कर दिए गए हैं उन लोगों को अपने साथ लाना होगा और उनका साथ लेकर अपने समाज को आगे बढ़ाना होगा। अलग-अलग होकर हम अपने देश को कभी भी आगे नहीं बढ़ा पाएँगे, हमें एकजुट होकर सभी लोगों का साथ लेकर आगे बढ़ना होगा और अपने देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाना होगा। इसके लिए हम युवाओं को अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा, हम युवाओं को वर्षों से चली आ रही प्रथाओं को तोड़कर अपने समाज को बदलना होगा और एक नए भारत का निर्माण करना होगा।

हमने गाँव में वर्षों से चली आ रही प्रथाओं को तोड़ दिया।


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