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प्यार भी नफरत पैदा करता है

प्यार भी नफरत पैदा करता है

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डुमरा गाँव में दो मज़हब के लोग रहते थे । इनमे ज्यादा तर लोग हिन्दू थे और कुछ कम मुसलमान कौमें रहा करती थीं । सहर से १५० की .मि दूर इस गाँव में बहुत खुशहाली रहती थी । मुख्य तौर पर डुमरा गांव में रहने वाले लोगो के पास खेतीबाड़ी का ही काम था । मुसलामानों के मुक़ाबले हिन्दुओं के पास ज़यादा खेती थी, और ज्यादा तर मुसलमान छोटे-छोटे बिज़नेस किया करते थे । जहाँ कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच कोई विवाद की घटना होती थी, तो वहां के लोगो को डुमरा गांव का प्यार और दो क़ौमो के बीच की भाईचारे का उदहारण दिया जाता था । डुमरा गांव को लोग मीसाल के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे। मिसाल देने लायक भी था डुमरा गांव और वहां के रहने वाले स्थानीय लोग । हिन्दुओ का त्योहार हो या मुसलमानो का त्योहार हो, डुमरा गांव में त्योहारो के समय खुशहाली का माहौल हुआ करता था । हिन्दू लोग जहाँ मुस्लमान भाइयों के यहाँ ईदी खाने जाते, तो वहीँ दिवाली में मुस्लमान लोग हिन्दू भाइयों के यहाँ पूरी-पकवान खाते । देखने में ऐसा प्रतीत होता जैसा, मनो डुमरा गांव में इंसानो का मेला लगा हो । एक-दूसरे के प्रति इज़्ज़त, आपार प्यार सायद हीं अगल-बगल के किसी गांव में हुआ करता था ।

डुमरा गांव के एक मौलवी साहब थे जो वहां के उच्च विद्यालय में शिक्षक के रूप में स्थापित थे पिछले पंद्रह वर्षो से । मौलवी साहब के पड़ोसी थे एक हिन्दू जिनको लोग सरपंच साहब के नाम से जानते थे, क्योंकि उन्होंने सरपंच का चुनाव जीता था । सरपंच साहब को चुनाव जीताने में भी मौलवी साहब का बहुत बड़ा योगदान था । मौलवी साहब ने अपने लोगो से सरपंच साहब के लिए वोट मांगी थी और गुज़ारिश की थी लोगो से सरपंच साहब को वोट देने के लिए । मौलवी साहब एक पढ़े-लिखे और इज़्ज़तदार व्यक्ति थे, इसलिए इनकी बातो को लोग तरजीह दिया करते थे। लोग मौलवी साहब का आदर भी किया करते थे, हिन्दू भी उतना ही मान-सम्मान देता जितना मुस्लमान लोग देते थे । मौलवी साहब का एक हीं दिनचर्या हुआ करता था, वो रोज़ सुबह-सुबह अपने गांव के बगल के छोटे बाज़ार में जाते और वहां चाय पिते और लोगो से बात विचार किया करते । नौ बजे वो स्कूल चले जाते और शाम के पांच बजे तक वहीँ रहते । स्कूल से लौटने के बाद वो गांव के कुछ लोगो के यहाँ कोचिंग पढ़ने भी जाते।उनमे से हीं एक लोग थे सरपंच साहब । सरपंच साहब की एक बेटी थी जिसका नाम था सुरजी। सुरजी एक सुन्दर और सुशिल युवती थी। सरपंच साहब ने सुरजी का नाम तो विद्यालय में लिखवा दिया था पर वो स्कूल नहीं जाती थी जैसी गांव की और लड़कियां भी स्कूल नहीं जाती थी । सुरजी सिर्फ घर में मौलवी साहब से हीं कोचिंग पढ़ा करती थी। मौलवी साहब का भी उम्र बढ़ रहा था, वो अब थक जाते थे। इस वजह से उन्होंने अपने बेटे आशिफ को बोल दिया था की कोचिंग पढ़ने के लिए शाम के ६ः बजे सरपंच साहब के यहाँ आ जाया करे । ऐसा मौलवी साहब ने घर जा कर दुवारा आशिफ को न पढ़ाने की जरुरत पड़े इस वजह से किया था । सरपंच साहब को भी इस से कोई ऐतराज़ नहीं था ।

दोनों बच्चे सुरजी और आशिफ एक हीं क्लास में पढ़ते थे । दोनों १२ वीं की परीक्षा देने वाले थे । साथ में पढ़ने के दौरान सुरजी और आशिफ एक-दूसरे से आकर्षित होने लगे । दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद आने लगा। आशिफ और सुरजी ने एक दिन गांव से बहार मिलने की योजना बनाई । अगले दिन सुबह सुरजी अपने पिताजी से बोल कर बाहर जाने में कामयाब हो गयी अपने सहेलियों के साथ, और आशिफ भी वहां समय से पहुँच गया था । सुरजी की सहेलिया, सुरजी और आशिफ को अकेले छोड़ कर बाज़ार घूमने चली गयीं । उधर सुरजी और आशिफ जाकर एक दूकान में बैठ गए और आपस में बाते करने लगे। शाम हुई और दोनों अपने-अपने घरो की ओर रवाना हो गए । दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था। आशिफ भी रात-दिन सुरजी के बारे में सोचता रहता और सुरजी भी आशिफ से अकेले में मिलने के बहाने ढूंढते रहती । छुप-छुपकर दोनों मिलते रहे कुछ दिनों तक। थोड़े दिन में उनकी १२ वीं का इम्तिहान आ गया, दोनों ने अपने-अपने इम्तिहान दिए । जब इम्तिहान का रिजल्ट आया तो आशिफ पास हो गया था और सुरजी फेल। सुरजी के फेल होने पर सरपंच साहब ने सुरजी को डांटा और उसका बाहर घूमना-फिरना भी बंद कर दिया। सुरजी परेशान रहने लगी, उसी बीच एक दिन जब घर में बाते हो रही थी तो सुरजी ने सरपंच साहब को शादी की बात करते सुना। सरपंच साहब सुरजी की शादी करने की योजना बना रहे थे। सुरजी बहुत डर गयी थी। सुरजी ने अपने सहेली से आशिफ तक ये बात पहुंचाई । आशिफ भी शादी की बात सुन कर परेशान होने लगा। उधर मौलवी साहब आशिफ को सहर भेजने की योजना बना रहे थे उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए। १०-१५ दिन बाद सुरजी की सहेली ने आशिफ और सुरजी का मुलाक़ात करवाया। बहुत दिनों के बाद मिलने की वजह से सुरजी की आंखें नम हो गयीं थी और आशिफ के होंठो पर एक छोटी सी मुस्कान थी। दोनों ने बहुत देर तक एक-दूसरे को जकड़े रखा अपनी बाँहों में, चुप-चाप। दोनों दुनिया, समाज से अन्ज़ान प्यार के समंदर में डूबे हुए थे। थोड़े देर बाद सुरजी ने आशिफ को अपने साथ सहर ले जाने की बात कही, थोड़ा अश्मंजस में आने के बाद आशिफ तैयार हो गया और दोनों ने गांव छोड़ कर सहर जाने का योजना बना लिया। इसकी खबर किसी को नहीं थी सिवाय सुरजी के सहेली के।

दोनों एक दिन गांव से सहर भागने में कामयाब हो गए। जब ये बाते सरपंच साहब को पता चली की उनकी बेटी सुरजी मौलवी साहब के बेटे आशिफ के साथ भाग गयी है, तो उनका खून खौल गया । यही हाल मौलवी साहब का भी था। सुरजी और आशिफ को ढूंढने के बजाये सरपंच साहब और मौलवी साहब दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए । बहुत लड़ाई-झगडे हुए, दोनों तरफ से गोलियां चली, दोनों तरफ के लोगो की जाने गयी, बहुत लोग जख्मी हुए, बहुत खून-खराबा हुआ। डुमरा गांव जो जाना जाता था दो मज़हबों के बीच के प्यार, भाईचारे और मोहब्बत के नाम से, वो पल भर में हीं नफरत के चुंगल में फंस गया और डुमरा गांव खण्डर हो गया । अब न वहां लोग मिलकर ईद मानते हैं न ही मिलकर दिवाली। जो आपसी प्यार था वो नफरत में बदल गया।

इन सब फ़सादो से दूर सुरजी और आशिफ अपने प्यार भरे जीवन को जी रहे थे। न किसी ने उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश की, न हीं उन दोनों ने कभी अपने गांव आने की कोशिश की । इस तरह एक गाँव जो कभी दो मज़हबो की बीच प्यार, भाईचारे का प्रतिक हुआ करता था, वो अपने हीं बच्चों की वजह से नफरत में बदल गया।


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